nayaindia How are humans civilized कैसे हो मनुष्य सभ्य?
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बिना सभ्य हुए ज्ञानी!

कैसे हो मनुष्य सभ्य? जबकि मनुष्य और समाज के बिना सभ्य और सुसंस्कृत हुए पृथ्वी की समस्याओं का समाधान संभव ही नहीं है। …पर यह काम हो कैसे? सभ्यता के इतिहास में कभी भी, किसी भी स्तर पर मनुष्य को सभ्य बनाने की वैज्ञानिक, तर्कसंगत कोशिश नहीं हुई। सत्य अनुसंधान के वैज्ञानिक तरीकों से समाज और उसके विकास का रास्ता नहीं बनाया गया। मनुष्य जीवन और समाज दोनों का धार्मिक और राजनीतिक टेकओवर इस कदर था कि सभ्य मनुष्य निर्माण में ज्ञान-विज्ञान और तार्किकता का हस्तक्षेप संभव ही नहीं हुआ।

प्रलय का मुहाना -33: बिना सभ्य हुए ज्ञानी! मनुष्य खोपड़ी में ज्ञानात्मक (कॉग्निटिव) क्रांति हुई। ज्ञानोदय (एन्लाइटेंमेन्ट) हुआ। इनसे ज्ञान-विज्ञान और प्रगति संभव हुई। बावजूद इस सबके मनुष्य दिमाग में समझदारी (विजडम) की बत्ती नहीं जली। मनुष्य सभ्य नहीं हुआ। पिछले तीन सौ वर्षों में मनुष्य जिज्ञासा ने प्रकृति के कई अभेद सत्य जाने लेकिन खुद का सत्य नहीं जाना! अपने और अपने समाज जीवन के आदिम स्वभाव को नहीं बदला। विज्ञान-तकनीक की बदौलत आस्मां फाड़ विकास हुआ लेकिन मनुष्य को सभ्य बनाने का विज्ञान नहीं बना। वह पशुगत प्रवृत्तियों और जैविक भिन्नताओं से मुक्त नहीं हुआ। मनुष्य दिमाग चेतन, रेशनल नहीं हुआ। विज्ञान ने मनुष्य का नॉलेज, उसकी क्षमताएं, उसकी ताकत व उपभोग को बढ़ाया लेकिन स्वभाव की आदिमताओं के साथ। ज्ञानात्मक (कॉग्निटिव) क्रांति से पहिए की खोज बैलगाड़ी-मोटरगाड़ी-हवाईजहाज में रूपांतरित हुई और अब स्पेसक्राफ्ट का मुकाम है मगर मनुष्य का दिल-दिमाग आदिम गुफाई जीवन की भूख, भय और हिंसा की प्रवृत्तियों में जस का तस जकड़ा हुआ है। अंधविश्वासों, कल्पनाओं, मिथकों और अज्ञानताओं में अटका हुआ। दिमाग न विवेक, रैशनालिटी, तर्कसंगतता की प्रोसेसिंग को अपना पाया और न स्वभाव में वह समझदार और सभ्य हुआ।

नॉलेज बनाम विजडम

तभी पहेली है कि नॉलेज, जानकारी, ज्ञान-विज्ञान की परम प्राप्तियों के बावजूद मनुष्य का वैयक्तिक, सामाजिक जीवन कैसे समझदारी में सूखा और जड़ बना हुआ है। है। मानों नॉलेज और विजडम में नाता नहीं हो! तभी विज्ञान-तकनीक के विकास को मनुष्य जितना भोगता है उससे अधिक उसका दुरूपयोग करता है। वह सभ्य होने के बजाय जंगली, जिहादी और कट्टर हुआ। दार्शनिक बर्ट्रेंड रसेल ने सत्तर साल पहले लिखा था कि ‘संदेह नहीं कि हमारे वक्त में नॉलेज विस्तार पिछले सभी युगों को मात देते हुए है लेकिन इसके अनुपात में विजडम बढ़ता हुआ नहीं है।… विजडम का अर्थ है मुक्ति, तमाम तरह के उत्पीडनों (tyranny) से’।

असल में तमाम तरह की जहालतों, काहिली, अंधविश्वासों, मूर्खताओं से दिमाग की मुक्ति तभी संभव है जब लोगों के निजी जीवन में सही-गलत को बूझने की प्रवृत्ति बने। दिमाग रेशनल हो। ज्ञान-जानकारी को व्यापक दृष्टि में, जिंदगी के मायनों में दिमाग समझता-बूझता हो।

सभ्य और समझदार होना एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। हिसाब से प्रगति और गतिविधियों के बढ़ते नॉलेज से मनुष्य जीवन में समझदारी बढ़नी चाहिए थी। होमो सेपियन जब खानबदोश जिंदगी याकि सीमित दायरे की जिंदगी जी रहा था तो नॉलेज और विजडम दोनों का मामूली होना स्वाभाविक था। लेकिन सभ्यता निर्माण के बाद स्थितियां बदलीं। मनुष्य की गतिविधियों और नॉलेज का विस्तार हुआ। दार्शनिकों, विचारकों, समाजशास्त्रियों ने जो सोचा और जो आइडिया दिए उनकी प्राथिमकता में मनुष्य जीवन था। पिछले पांच-छह सौ सालों में पुनर्जागरण, ज्ञानोदय (एन्लाइटेंमेन्ट) और देवर्षि वैज्ञानिकों की खोजों और ज्ञानात्मक क्रांतियों ने नॉलेज की वह जमीन बनाई, जिससे बहुतों को लगा था कि मनुष्य दिमाग का परिष्कार होना अब सुनिश्चित। लेकिन उलटा हुआ। ज्ञान की हर क्रांति मनुष्य के शोषण को, अमानवीय जीवन को तथा दिमाग की आदिम प्रवृत्तियों को बढ़ाने वाली साबित हुई। इसलिए क्योंकि कुल मिलाकर मनुष्य खोपड़ी आदिम मनोवृत्तियों में धड़कती हुई है।

होमो सेपियन के सभ्य और ज्ञानी होने का कोई कितना ही हिसाब लगाए असलियत है कि बीसवीं सदी में मनुष्य दिल-दिमाग में जैसे बेरहम ख्याल पैदा हुए है, जैसा जो नरसंहार हुआ और तानाशाहियों में जो प्रयोग हुए है उसका निचोड़ है कि ज्ञान-विज्ञान की प्रगति भले आस्मां फाड़ हो मगर मनुष्य उत्तरोत्तर दिमागी तौर पर असमान और असभ्य होता हुआ है। बहुत कम अनुपात में, मामूली संख्या में वे लोग हैं, जो सभ्य दिमाग से सभ्यता के विकास का अपूर्व संतोषी जीवन जीते हुए हैं। अन्यथा बीसवीं सदी में मनुष्य के जंगली, बर्बर, असभ्य, नासमझ होने के जितने प्रमाण हैं वैसे सभ्यता के पूरे पांच हजार वर्षों में पहले कभी नहीं हुए।

कई मायनों में नॉलेज की सुनामी ने मनुष्य को भस्मासुर बनाया है। पुनर्जागरण और ज्ञानोदय याकि एन्लाइटमेन्ट के बाद कहने को कई विचारकों जैसे वोल्टेयर, दीदरो, कोंडोरसेट आदि ने वैज्ञानिक प्रगति के साथ सामाजिक प्रगति, मनुष्य दिमाग को ज्ञान की और प्रेरित करने के आइडिया दिए। अंधविश्वासों, तानाशाही, अन्याय, असहिष्णुता को दिमाग से निकलवाने की कोशिश की। उदारता, खुलेपन, तर्क और बुद्धि पर जोर देते हुए व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में तर्कसंगतता को बढ़ाने के उपाय सुझाए। सर्वाधिक अहम सुझाव यह था कि लोगों का ज्ञानोदय तब संभव है जब नेचुरल साइंस की तरह सोशल साइंस का विकास हो। फ्रांसिस बेकन का आग्रह था कि सामाजिक प्रगति के लिए प्राकृतिक दुनिया के ज्ञान में सुधार पर काम हो।

समाजशास्त्र में विज्ञान

जटिल आइडिया है। मोटा-मोटी सुझाव यह कि मनुष्य को सभ्य बना कर सभ्य दुनिया बनानी है तो सामाजिक प्रगति और उनके विषयों को विज्ञान के तौर-तरीके अपनाने चाहिए। सामाजिक विषयों में भी लक्ष्य-केंद्रित मिशन में काम हो। समाज कैसे विकसित हुआ, इसके ज्ञान के बजाय समाज कैसे प्रगति करे, इसका वैज्ञानिक मिशन बने। समाज विज्ञान में पढ़ने-पढ़ाने-समझाने में ‘वैज्ञानिक तर्कसंगतता’ को बढ़वाया जाए। अकादमिक दुनिया न केवल नॉलेज, ज्ञान की खोज को प्राथमिकता बनाए, बल्कि वह सभ्यता और मनुष्यों में विजडम बढ़ाने पर फोकस करे। जिंदगी की समस्याओं में तर्कसंगतता से नॉलेज का कामनसेंस भाव दिमाग में उतरे। यह जरूरी इसलिए है क्योंकि ज्ञान-विज्ञान ने मनुष्य की शक्तियों को बेइंतहां बढ़ाया है। इससे मानवता को नष्ट करने की शक्तियां अभूतपूर्व और भयानक हैं। तभी मनुष्यों को समझदार और सभ्य बनाना वैश्विक ज्ञान की प्राथमिक आवश्यकता है।

पर क्या ऐसी सोच कही दिखती है? हर व्यक्ति, हर समाज अपने को सभ्य-समझदार ही नहीं मानता, बल्कि विश्व गुरू के बोध से लेकर अपने जैसे ही बाकी दुनिया को बना देने का जंगलीपना भी लिए हुए है। इस प्रवृत्ति के आगे विज्ञान की भौतिक उपलब्धियां, कथित बुद्धिमान दुनिया और नॉलेज की सुनामी बेमतलब है।

ज्ञान-विज्ञान, भौतिक प्रगति का उपयोग एक बात है। उत्पादकता, अमीरी, तकनीक को भोगना एक बात है लेकिन सभ्य, समझदार मनुष्य और सामाजिक जीवन का विकास अलग बात है। परमाणु ऊर्जा के ज्ञान और उपयोग पर गौरवान्वित होना एक बात है लेकिन यदि समझदारी के सभ्य-सम्यक मनुष्य व्यवहार में उसका उपयोग नहीं हुआ तो वह ज्ञान कितना अनर्थकारी होगा? विज्ञान-नॉलेज से हर आदमी के हाथ में स्मार्टफोन, सोशल मीडिया है मगर दिमाग क्योंकि जहालत-काहिली में भरा हुआ है तो नए नॉलेज-तकनीक और विकास से भी वह धर्मयुद्ध लड़ा जा रहा है, जिसके मूल में कल्पनाओं की कथा-कहानियां हैं।

प्रगति एक सच्चाई है। ज्ञान-विज्ञान की सैद्धांतिक प्रगति अंतरिक्ष में मनुष्य को उड़ाते हुए है। ऐसे ही सृजनात्मक, सौंदर्य व कलात्मक विकास भी अभूतपूर्व है।

कई बही-खाते

रोम की सभ्यता के समय मनुष्य का औसत जीवन पच्चीस साल का हुआ करता था। अब जीवन प्रत्याशा देशों की खुशहाली अनुसार 60 से 90 साल के बीच है। पृथ्वी का अमीर और कुलीन मनुष्य वह ऐश्वर्य, भोग, मजा, आनंद, सुख लेते हुए है, जिसके आगे स्वर्गीय कल्पनाएं भी कम होंगी। पिछले पांच हजार वर्षों का यह निचोड़ है कि पृथ्वी पर जिंदगी जी चुके सौ अरब लोगों में जो भी कुलीन प्रतिनिधि मनुष्य थे उन्होंने जीवन भरपूर जीया और आज भी जीते हुए हैं। उस नाते उनका बही-खाता अलग है। इसलिए सभ्यता का बही-खाता एक नहीं है। कई हैं। एक खाता कुलीनों, गड़ेरियों का है। दूसरा गुलाम, पालतू, भेड़-बकरियों की कैटल क्लास का है तो कुबरों का एक अलग खाता है। मनुष्यों के ये भिन्न-विभिन्न बही-खाते भी सभ्यता की देन हैं। इस पर जितना सोचेंगे समझ नहीं आएगा कि सभ्यता सभी मानवों के लिए है या वह कहीं मनुष्यों को बांटने, जात-पात, नस्ल, चारदिवारियों आदि के अलग-अलग अनुभव बनवाने का प्रकल्प तो नहीं है।

कुल मिलाकर सभ्य कैसे हो मनुष्य? जबकि मनुष्य और समाज के सभ्य और सुसंस्कृत बने बिना पृथ्वी की समस्याओं का समाधान संभव ही नहीं है।

पर यह काम हो कैसे? खासकर जब सभ्यता में ही कई सभ्यतागत बाड़े बन गए हैं। सभ्यताओं के संघर्ष की बाते है। धर्मयुद्ध है, नस्ली झगड़े हैं। मनुष्यों की अलग-अलग पहचान के झगड़े हैं तो यह कैसे संभव है जो पृथ्वी की हर मनुष्य खोपड़ी को समझदार-सभ्य बनाने का प्रोजेक्ट बने? ऐसा क्या हो, जिससे दुनिया भर के लोग दिमाग में तार्किकता से अच्छे-बुरे का भेद करके सत्य जानने की आदत में जिंदगी जीना शुरू करें?

कोई माने या न माने, लेकिन सभ्यता ने मनुष्य को पालतू लंगूर बनाया है। वह खुद उसके हाथ का वह उस्तरा है, जिससे अपने को और मानवता दोनों को घायल करते जाना है।

दरअसल सभ्यता के इतिहास में कभी भी, किसी भी स्तर पर मनुष्य को सभ्य बनाने की वैज्ञानिक, तर्कसंगत कोशिश नहीं हुई। सत्य अनुसंधान के वैज्ञानिक तरीकों से समाज और उसके विकास को प्रगति के पथ पर नहीं ले जाया गया। मनुष्य जीवन और समाज दोनों का धार्मिक और राजनीतिक टेकओवर इस कदर था कि उसमें ज्ञान-विज्ञान-तार्किकता का हस्तक्षेप संभव ही नहीं हुआ। मनुष्य स्वभाव की जन्मजात खोट के निराकरण का मौका ही नहीं बना। धर्म और राजनीति ने उसकी जरूरत इसलिए नहीं समझी क्योंकि उसका हित इसी में है कि मनुष्य दिमाग जैसे है वैसे रहे तभी तो धर्म-राजनीति और कुलीन सभ्यता को मौका है।

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By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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