BJP from central politics भाजपा को कैसे हटाएंगे केंद्र से?
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भाजपा को कैसे हटाएंगे केंद्र से?

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सबसे पहले यह स्पष्ट करना जरूरी है कि केंद्र का मतलब केंद्र सरकार नहीं है। केंद्र का मतलब राजनीति के केंद्र से या राजनीति की केंद्रीय ताकत से है। कुछ समय पहले चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने खुद ही कहा था कि भाजपा भारतीय राजनीति की केंद्रीय ताकत है और वह लंबे समय तक कहीं नहीं जाने वाली है। यह गहरे राजनीतिक मायने वाली बात है। कोई भी पार्टी जब राजनीति की केंद्रीय ताकत बन जाती है तो उसे वहां से हटाना आसान नहीं होता है। कांग्रेस आजादी के बाद से भारतीय राजनीति के केंद्र में थी। हालांकि राज्यों में उसके हारने का सिलसिला साठ के दशक के आखिर में शुरू हो गया था। नब्बे के दशक में तो वह काफी कमजोर हो गई थी। इसके बावजूद राजनीति के केंद्र से उसे अभी तक पूरी तरह से नहीं हटाया जा सका है। वह अब भी दूसरी सबसे बड़ी ताकत है।

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कांग्रेस 1977 के चुनाव में हार कर राजनीति की केंद्रीय ताकत से नहीं हटी थी, बल्कि 1991 में जीतने के बाद से उसके राजनीति के केंद्र से दूर हटते जाने का सिलसिला शुरू हुआ। ऐसा तीन बड़ी ऐतिहासिक घटनाओं की वजह से हुआ। पहले बोफोर्स तोप घोटाला कांग्रेस की बदनामी का नंबर एक मुद्दा बना। उसके बाद वीपी सिंह ने मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू कर दी थी, जिससे पिछड़ी जातियों के अंदर राजनीतिक पहचान बनाने की भावना प्रबल हुई। कांग्रेस पुरानी राजनीतिक सोच की वजह से इस घटनाक्रम को पहचान नहीं पाई और मौका गंवा दिया। तीसरी  घटना मंदिर आंदोलन की थी। वीपी सिंह के मंडल के मुकाबले लालकृष्ण आडवाणी ने मंदिर का आंदोलन शुरू किया और भाजपा के लिए वह आधार तैयार किया, जिससे उसने आगे चल कर कांग्रेस को रिप्लेस किया। इन तीन बड़ी घटनाओं के अलावा छोटी छोटी कई बातें थीं, जैसे भ्रष्टाचार के आरोप, मुस्लिमपरस्ती के आरोप आदि, जिसने कांग्रेस को कमजोर बनाया और वह राजनीति के केंद्र से दूर हुई।

तभी सवाल है कि ऐसा क्या है, जिससे भाजपा को राजनीति के केंद्र से हटाया जा सके? अभी देश में क्या मंडल आंदोलन के जैसा या मंदिर आंदोलन जैसा कोई बड़ा मुद्दा है, जिसमें देश की राजनीति को बुनियादी रूप से प्रभावित करने की क्षमता हो? यह सही है कि राहुल गांधी केंद्र सरकार के मुकाबले सीना तान कर खड़े हैं। ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल राज्यों में भाजपा को चुनौती दे रहे हैं। लेकिन इन नेताओं के पास कोर मुद्दा क्या है? क्या कोई ऐसा मुद्दा है, जो राजनीति में भूचाल ला दे या छोटा-मोटा भूकंप ही ला दे? भारतीय जनता पार्टी जितनी ताकत और जिस बल के दम पर राजनीति के केंद्र में स्थापित हुई है क्या विपक्षी पार्टियों के पास उससे ज्यादा बड़ा बल है? या राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ, भाजपा और हाल के दिनों में नरेंद्र मोदी व अमित शाह ने जिस विचार या विमर्श के दम पर खुद को आम जनमानस में स्थापित किया है उसके विकल्प के तौर पर कोई विचार या नैरेटिव विपक्ष के पास है? अगर मोदी और शाह आक्रामक हिंदुत्व की ही राजनीति कर रहे हैं या ध्रुवीकरण को ही चुनाव जीतने का अचूक अस्त्र बनाया है तो उसकी काट में विपक्ष के पास क्या है?

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क्या इसका प्रशांत किशोर या ममता बनर्जी के पास जवाब है?

इसमें कोई दो राय नहीं है कि देश की अर्थव्यवस्था नरेंद्र मोदी के राज में चौपट हैं। बेरोजगारी पिछले साढ़े चार दशक में सबसे ज्यादा है। महंगाई की मार हर आम और खास आदमी पर पड़ रही है। पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस की कीमतें अपने सर्वोच्च स्तर पर हैं। आर्थिक रूप से देश खोखला हो रहा है, नई संपत्तियों का निर्माण नहीं हो रहा है, उलटे पुरानी सारी संपत्तियां बेची जा रही हैं। देश की राष्ट्रीय सुरक्षा पर भी खतरा मंडरा रहा है। चीन भारत की सीमा में घुस कर बैठा है। पूर्वी लद्दाख में कई जगहों पर चीनी सेना भारत की सीमा में घुसी है और उधर अरुणाचल प्रदेश से लगती सीमा पर भी चीन ने अतिक्रमण किया है। चीन ने न केवल भारत के ऊपर सामरिक दबाव बढ़ाया है, बल्कि आर्थिक  रूप से भी भारत को अपने ऊपर निर्भर बनाता जा रहा है। उधर अफगानिस्तान में तालिबान का राज स्थापित होने से पाकिस्तान को ताकत मिली है। भारत के खिलाफ दशकों से चल रहे छद्म युद्ध में तालिबानी दमखम है।  

यह भी सही है कि सरकार के ऊपर भ्रष्टाचार के भारी आरोप हैं। राफेल लड़ाकू विमान खरीद में गड़बड़ी के मुद्दे की फ्रांस में जांच चल रही है और हाल में कई नए खुलासे हुए हैं। पेगासस जासूसी मामले में भी सरकार घिरी है और सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में एक विशेषज्ञ समिति इसकी जांच कर रही है। दुनिया के दूसरे देशों में भी जांच हो रही है। सरकार चुनिंदा कारोबारियों की मदद कर रही है, इसका हल्ला भी पहले दिन से है। केंद्र सरकार अंबानी-अडानी की सरकार है, यह आरोप नया नहीं है। ध्यान रहे राहुल गांधी और विपक्षी पार्टियां सूट-बूट की सरकार और चौकीदार चोर है के नारे पर चुनाव लड़ चुकी हैं। तभी सवाल है कि इन सब मुद्दों में से कौन का मुद्दा कोर होगा, जिसे लेकर विपक्ष का कोई भी नेता 2024 में मोदी को चुनौती देगा या जिसके ईर्द-गिर्द ऐसी राजनीति होगी कि भाजपा को राजनीति के केंद्र से शिफ्ट किया जा सके? किसान आंदोलन में जरूर संभावना थी कि उससे एक लहर पैदा की जा सके। लेकिन इसके खतरे को भांप कर नरेंद्र मोदी पीछे हटे और कानून वापस ले लिया। कोरोना प्रबंधन में विफलता बड़ा मुद्दा है लेकिन वैक्सीनेशन अभियान की आड़ में उसे ढक दिया गया है। जातीय जनगणना तीसरा और अहम मुद्दा है, जिससे मोदी-शाह के हिंदुत्व का ताना-बाना बिखर सकता है, लेकिन यह मुद्दा विपक्ष एकजुट होकर नहीं उठा सकता।  

विपक्ष के मुद्दों के बरक्स भाजपा और नरेंद्र मोदी-अमित शाह की तैयारी देखें तो फर्क साफ दिखेगा। मोदी-शाह ने जम्मू कश्मीर में अनुच्छेद 370 खत्म कर दिया है। हालांकि इससे जमीनी स्तर पर कोई फर्क पड़ा हो या नहीं लेकिन देश के जनमानस में यह मैसेज है कि कमाल हो गया। उधर अयोध्या में भव्य राम मंदिर का निर्माण हो रहा है। काशी में विश्वनाथ मंदिर का पुनरूद्धार हो रहा है। भाजपा के नेता मथुरा में भव्य मंदिर के निर्माण की बात करने लगे हैं। तीन तलाक को अपराध बनाने का कानून बन चुका है। दुनिया भर के हिंदुओं को भारत की नागरिकता देने के प्रावधान वाला नागरिकता संशोधन कानून भी बन गया है, बस उसे लागू करना बाकी है। राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर के जरिए अल्पसंख्यकों की पहचान और प्रोफाइलिंग का काम कभी भी किया जा सकता है। और समान नागरिक संहिता की ओर भी कदम बढ़ाया जा सकता है। अब यह सब तो सोचें, इनकी काट में विपक्ष में पास क्या मुद्दा है?

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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