अस्मिता की राजनीति कैसे करेगी भाजपा?

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अजीत द्विवेदीhttp://www.nayaindia.com
पत्रकारिता का 25 साल का सफर सिर्फ पढ़ने और लिखने में गुजरा। खबर के हर माध्यम का अनुभव। ‘जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से शुरू करके श्री हरिशंकर व्यास के संसर्ग में उनके हर प्रयोग का साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और अब ‘नया इंडिया’ के साथ। बीच में थोड़े समय ‘दैनिक भास्कर’ में सहायक संपादक और हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ शुरू करने वाली टीम में सहभागी।

पश्चिम बंगाल के चुनाव नतीजों ने भारतीय जनता पार्टी की राजनीति की एक बड़ी फॉल्टलाइन जाहिर की है। यह फॉल्टलाइन भाजपा के साथ साथ राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ द्वारा पिछले कई दशकों से किए जा रहे प्रयासों की विफलता भी दिखाती है। वह विफलता यह है कि भाजपा के पास पश्चिम बंगाल में मतदाताओं के सामने पेश करने के लिए एक मजबूत और साख वाला चेहरा नहीं था। यही कहानी केरल की भी है, जहां संघ पिछले कई दशकों से पैर जमाने की कोशिश कर रहा है। असल में यह समूचे दक्षिण और पूर्वी भारत की कहानी है। इसके एकाध अपवाद होंगे लेकिन वास्तविकता यह है कि दक्षिण और पूर्वी भारत के ज्यादातर राज्यों में भाजपा के पास नेतृत्व की कमी है। इसी वजह से भाषायी अस्मिता की राजनीति वाले राज्यों में भाजपा को मुश्किलें आती रहेंगी।

ऐसा नहीं है कि भाजपा ने पश्चिम बंगाल में मुख्यमंत्री पद का दावेदार पेश नहीं किया, इसलिए यह माना जाएगा कि उसके पास चेहरा नहीं है। मुख्यमंत्री का दावेदार तो उसने कई राज्यों में पेश नहीं किया, लेकिन उन राज्यों में भाजपा यह कहने की स्थिति में थी कि उसके पास एक से ज्यादा मजबूत चेहरे हैं, मुख्यमंत्री बनने के लिए। यह बात वो पश्चिम बंगाल में नहीं कह सकती थी। तभी भाजपा के सारे नेता कहते रहे कि कोई धरती पुत्र ही मुख्यमंत्री बनेगा। चुनाव में भाजपा ने जो सबसे मजबूत चेहरा दिखाया था वह शुभेंदु अधिकारी का था, जो चुनाव से थोड़े दिन पहले ही तृणमूल कांग्रेस छोड़ कर भाजपा में शामिल हुए थे। ध्यान रहे कोई कितना भी बड़ा नेता हो वह दूसरी पार्टी में जाने के बाद उसके काडर में जान फूंकने या उत्साह भरने का काम नहीं कर सकता है। सो, चाहे शुभेंदु अधिकारी हों या मुकुल रॉय वे भाजपा के कार्यकर्ताओं में उत्साह नहीं पैदा कर सके।

चूंकि भारतीय जनता पार्टी ने पहले से कोई बड़ा बांग्ला भाषी नेता नहीं तैयार किया है या किसी बांग्ला भाषी नेता को पूरी मजबूती से पार्टी ने ममता बनर्जी के मुकाबले पेश नहीं किया, जिसका नतीजा यह हुआ है कि ममता बनर्जी बांग्ला भाषा और संस्कृति की अस्मिता का मुद्दा बना कर भाजपा से आगे निकल गईं। भाजपा को समझना होगा कि भाषायी अस्मिता वाले राज्यों के महापुरुषों का नाम लेने भर से कुछ नहीं होगा। उनकी विरासत का प्रतिनिधित्व करने वाले चेहरों को आगे लाना होगा। अगर नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने पिछले सात साल में भाजपा के किसी बंगाली नेता को दिल्ली में तरजीह दी होती, उसका स्वतंत्र व्यक्तित्व बनने दिया होता और उसे भी प्रचार मिला होता तो वह बंगाल चुनाव में कारगर हो सकता था। भाजपा ने नरेंद्र मोदी से पहले भी यह काम नहीं किया और नरेंद्र मोदी के बाद भी नहीं हो रहा है।

यही कारण है कि केरल में या तमिलनाडु में भाजपा कोई असर नहीं डाल पा रही है। केरल में उसे मेट्रो मैन के नाम से मशहूर पूरी तरह से अराजनीतिक व्यक्ति ई श्रीधरन को चुनाव में उतारना पड़ा। उनके 88 साल के होने के बावजूद पार्टी ने उनको चुनाव लड़ाया। वे खुद को मुख्यमंत्री पद का दावेदार मान कर चुनाव लड़ रहे थे, लेकिन खुद ही चुनाव नहीं जीत सके और न पार्टी का खाता खुला। तमिलनाडु में भी भाजपा के पास दिखाने के लिए जो चेहरे थे, उनमें से पोन राधाकृष्णन कन्याकुमारी सीट से लोकसभा का उपचुनाव लड़े और बड़े अंतर से हारे। दूसरा चेहरा तमिलिसाई सौंदर्यराजन का था, जिन्हें पार्टी ने राज्यपाल बना दिया है। दक्षिण भारत के राज्यों में भाजपा सिर्फ कर्नाटक में सत्ता में आ पाई तो उसका कारण यह था कि अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी के जमाने से वहां बीएस येदियुरप्पा का नेतृत्व तैयार किया गया। वे राजनीतिक रूप से सर्वाधिक मजबूत समुदाय का प्रतिनिधित्व करते हैं और जमीनी राजनीति करने वाले नेता हैं। उनके जैसा दूसरा कोई नेता भाजपा समूचे दक्षिण भारत में नहीं तैयार कर सकी। वेंकैया नायडू हों या अब निर्मला सीतारमण हों ये जमीनी राजनीति करने वाले नेता नहीं रहे। भाजपा ने तमिलनाडु के एस जयशंकर को विदेश मंत्री बनाया है, लेकिन ध्यान नहीं आ रहा है कि वे तमिलनाडु के चुनाव में एक दिन भी प्रचार के लिए गए हों। जमीन से जुड़ाव नहीं रखने वाले नेताओं को तरजीह देकर भाजपा ने दक्षिण के राज्यों में अपने को बढ़ने से रोका है।

चाहे दक्षिण भारत के राज्य हों या पूर्वी भारत में पश्चिम बंगाल, ओड़िशा या पूर्वोत्तर के दूसरे राज्य हों, इन राज्यों में भाषा और संस्कृति की राजनीति बहुत हावी होती है। संशोधित नागरिकता कानून यानी सीएए के विरोध में असम में बड़ा सांस्कृतिक आंदोलन हुआ था। इस आंदोलन की वजह से भाजपा ने सत्ता लगभग गंवा दी थी, लेकिन अच्छा हुआ जो चुनाव से पहले भाजपा और केंद्र सरकार ने इस कानून को ठंडे बस्ते में डाला और चुनावी मुद्दा नहीं बनने दिया। भाजपा को दूसरा फायदा यह हुआ कि इस कानून के विरोध में असम में दो क्षेत्रीय पार्टियां बन गईं, जिन्होंने मिल कर चुनाव लड़ा और इतना वोट काट लिया कि भाजपा चुनाव जीत गई। असम में भाजपा को तीसरा फायदा यह हुआ कि समूचे पूर्वी भारत में असम एकमात्र राज्य है, जहां भाजपा के पास सर्बानंद सोनोवाल के रूप में अपना एक चेहरा है। हालांकि वे भी पहले असम आंदोलन से जुड़े रहे हैं और लेकिन काफी पहले ही भाजपा में शामिल हो गए थे। बाद में कांग्रेस से आए हिमंता बिस्वा सरमा को भी पार्टी ने महत्व देकर अपने को मजबूत किया है। यह स्थिति दूसरे राज्यों में नहीं है।

सो, भाजपा को अगर भाषायी अस्मिता और अलग सांस्कृतिक पहचान वाले राज्यों में राजनीतिक रूप से सफल होना है तो उसे सबसे पहले उन राज्यों में मजबूत राजनीतिक नेतृत्व तैयार करना होगा। यह सही है कि सिर्फ हिंदी पट्टी की पार्टी होने की भाजपा की पहचान बदल रही है। उसे दूसरे राज्यों में भी सफलता मिली है। केरल में भी इस बार उसे 11 फीसदी वोट आया है। यह वोट भाजपा के मजबूत केंद्रीय नेतृत्व की वजह से है। अगर इसे बढ़ाना है या सत्ता में आने लायक वोट हासिल करना है तो मजबूत प्रादेशिक नेतृत्व तैयार करना होगा और इस बात का खास ख्याल रखना होगा कि जिसे नेता के तौर पर तैयार किया जा रहा है वह सामाजिक समीकरण के लिहाज से भी मजबूत हो, जैसे येदियुरप्पा हैं। वैसे भाजपा के सामने हिंदी पट्टी में भी नेतृत्व का संकट खड़ा होने वाला है क्योंकि पार्टी के मौजूदा केंद्रीय नेतृत्व ने अपने नीचे मजबूत नेता पैदा करने की भाजपा की पुरानी परंपरा को खत्म कर दिया है। अब प्रादेशिक क्षत्रप नहीं तैयार किए जा रहे हैं, बल्कि नेताओं की व्यक्तिगत निष्ठा को ज्यादा महत्व दिया जा रहा है। बिना आधार वाले नेताओं को आगे बढ़ाया गया है, जिनकी वजह से आने वाले दिनों में भाजपा को मुश्किल होगी। इस लिहाज से भी जरूरी है कि पार्टी दक्षिण और पूर्वी भारत में नया नेतृत्व तैयार करे।

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साभार - ऐसे भी जानें सत्य

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