आंदोलन आखिर कैसे खत्म होगा? - Naya India
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आंदोलन आखिर कैसे खत्म होगा?

किसानों का आंदोलन कैसे खत्म होगा? यह यक्ष प्रश्न है। सरकार में इसे लेकर चिंता है। यह नागरिकता कानून के विरोध में हुए शाहीन बाग की तरह का आंदोलन नहीं है, जो महीनों लोगों को बैठे रहने के लिए छोड़ दिया जाए और एक दिन कोरोना वायरस का संक्रमण शुरू हो तो आंदोलन अपने आप खत्म हो जाए। एक तो केंद्रीय कृषि कानूनों का विरोध कर रहे किसान दिल्ली की सीमा पर बैठे हैं और कम से कम पांच हाईवे के ऊपर ऐसी रणनीतिक जगह पर हैं, जहां से रास्ते बंद करके राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली को उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, हरियाणा और राजस्थान से पूरी तरह काट सकते हैं। दूसरे, किसान हर दिन अपने आंदोलन में नए एलीमेंट जोड़ रहे हैं। इसलिए सरकार को हर हाल में पहल करके इसे खत्म कराना होगा। तभी अमित शाह ने कमान अपने हाथ में लिया है।

सवाल है कि अमित शाह बातचीत के जरिए सहमति बना कर आंदोलन को खत्म कराएंगे या कोई दूसरा रास्ता निकाला जाएगा? सरकार के प्रबंधक मान रहे हैं कि दूसरा रास्ता अख्तियार करना मुश्किल होगा क्योंकि उसका समय निकल गया है। किसान आंदोलन के 15 दिन हो गए हैं और दिल्ली की सीमा पर जमे किसानों की संख्या बढ़ कर लाखों में हो गई है। एकदम शुरुआत में सरकार ने दूसरे तरीके से आंदोलन को रोकने का प्रयास किया था। पंजाब और हरियाणा से आ रहे किसानों को हरियाणा में ही रोक देने की भरसक कोशिश हुई थी। सड़कें खोद दी गई थी, किसानों पर वाटर कैनन चलाए गए थे और पूरे रास्ते बैरिकेड्स लगा कर भारी पुलिस बल के जरिए किसानों को रोकने का प्रयास हुआ था। उसके बावजूद किसान दिल्ली की सीमा पर पहुंच गए और हर दिन उनकी संख्या व समर्थन भी बढ़ रहा है। इसलिए आंदोलन को जोर जबरदस्ती खत्म कराने का विकल्प समाप्त हो गया है।

तभी सरकार की ओर से बातचीत के जरिए सहमति बनाने का प्रयास हो रहा है। लेकिन उसमें भी पेंच है। पेंच यह है कि केंद्र सरकार कानूनों को वापस लेने के लिए तैयार नहीं है। यह बात मंत्रियों के साथ बैठक में किसानों से स्पष्ट किया जा चुका है कि सरकार कानून वापस नहीं लेगी। तीनों कानूनों में जरूरी संशोधन किए जा सकते हैं, लेकिन वापसी संभव नहीं है। दूसरी ओर किसानों का कहना है कि तीनों कानून खेती-किसानी के लिए डेथ वारंट हैं और डेथ वारंट में संशोधन नहीं होता है, उसे वापस ही लेना होता है। सो, सहमति बनाना थोड़ा मुश्किल है।

सहमति के साथ साथ या उसके अलावा सरकार के पास दो रास्ते हैं। एक रास्ता कोरोना वायरस के संक्रमण के प्रोटोकॉल को लागू करना है। सरकार इस बहाने जोर जबरदस्ती कर सकती है कि किसानों के जमावड़े से कोरोना वायरस का संक्रमण फैल रहा है। दूसरा रास्ता सुप्रीम कोर्ट से आदेश कराने का है। इसमें देश की सर्वोच्च अदालत का दो तरह से इस्तेमाल संभव है। पहली याचिका तो सुप्रीम कोर्ट में दायर भी हो गई है, जिसमें शाहीन बाग के प्रदर्शन पर सर्वोच्च अदालत के फैसले को आधार बना कर कहा गया है कि प्रदर्शनकारी किसानों को हाईवे से हटाने का आदेश दिया जाए। इस याचिका में कोरोना वायरस का पहलू भी जोड़ा गया है। याचिकाकर्ता का कहना है कि किसानों के आंदोलन से लोगों को आने-जाने में दिक्कत हो रही है और कोरोना वायरस का संक्रमण फैलने का भी खतरा है। सो, सार्वजनिक जगह पर प्रदर्शन नहीं करने के अदालत के आदेश और कोरोना संक्रमण फैलने के खतरे के आधार पर अदालत प्रदर्शनकारियों को हटाने का आदेश दे सकती है।

दूसरा रास्ता यह है कि तीनों कृषि कानूनों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की जा सकती है। ऐसे में मामला न्यायालय के अधीन हो जाएगा तो सरकार हाथ खड़े कर सकती है। ध्यान रहे कांग्रेस शासित राज्यों ने केंद्रीय कानूनों के खिलाफ बिल पास किया है और उसे राष्ट्रपति के पास भेजा है। वे राष्ट्रपति के फैसले का इंतजार कर रहे हैं इसलिए उन्होंने अभी अदालत का रुख नहीं किया है। अगर वे पहले ही अदालत में चले गए होते तो सरकार को आसानी होती। लेकिन अब भी संभव है कि सरकार का समर्थक कोई वकील या सामाजिक कार्यकर्ता अदालत में चला जाए और केंद्र के बनाए तीनों कृषि कानूनों को चुनौती दे। उससे भी सरकार का काम आसान हो जाएगा।

एक तीसरा रास्ता भी है, लेकिन उस पर तभी अमल संभव है, जब सरकार अहंकार छोड़े और उदारता दिखाए। वह इसे प्रतिष्ठा का सवाल बनाने की बजाय किसानों की वास्तविक चिंताओं को समझे और उसमें बदलाव की प्रतिबद्धता दिखाए। अगर सरकार उदारता दिखाती है तो वह संसद का एक छोटा सत्र बुला सकती है, जिसमें इन तीनों विधेयकों को नए सिरे से पास किया जा सकता है। इस समय सारे किसान संगठन दिल्ली में इकट्ठा हैं। उनके साथ बैठ कर सरकार एक एक बिंदु पर विचार कर सकती है। उसके बाद नया मसौदा तैयार करके सरकार विपक्षी पार्टियों से भी बात कर सकती है और तीनों कानूनों की जगह लेने वाले नए कानून पास करा सकती है। किसी भी चुनी हुई सरकार से ऐसा ही रास्ता अपनाने की उम्मीद की जाती है। लेकिन ऐसा लग नहीं रहा है कि सरकार कानूनों को रद्द करके उनकी जगह नया कानून लाने का रास्ता अख्तियार करेगी।

किसान भी इस बात को समझ रहे हैं और इसलिए वे भी पूरी तैयारी के साथ दिल्ली की सीमा पर डटे हैं। उनको पता है कि इन कानूनों को लेकर सरकार इतना आगे बढ़ गई है कि उसके लिए वापसी मुश्किल है। असल में इन कानूनों की पृष्ठभूमि बहुत पुरानी है, जिसकी पोल अब किसान संगठन खुद ही खोल रहे हैं। कानून आने से पहले सरकार के दो क्रोनी पूंजीपतियों- अंबानी और अडानी ने कृषि से जुड़े कारोबारों में घुसने और उन पर कब्जा करने का ब्लूप्रिंट बनाया हुआ था। ये कानून उसी ब्लूप्रिंट पर अमल का दस्तावेज हैं। तभी किसानों ने ऐलान किया है कि वे अंबानी-अडानी-भाजपा का बहिष्कार करेंगे। यह भी देश के लोकतांत्रिक इतिहास में पहली बार हुआ है जब आंदोलनकारी किसानों ने क्रोनी पूंजीपतियों के साथ सत्तारूढ़ दल का नाम जोड़ कर उसके बहिष्कार का ऐलान किया है। ऐसा दिख रहा है कि दोनों तरफ से पाला खींच गया है। सरकार और किसान अलग अलग पाले में खड़े हैं। दोनों एक-दूसरे की ताकत और तैयारी का आकलन कर रहे हैं। किसकी पलक पहले झपकती है इसका इंतजार हो रहा है।

By अजीत द्विवेदी

पत्रकारिता का 25 साल का सफर सिर्फ पढ़ने और लिखने में गुजरा। खबर के हर माध्यम का अनुभव। ‘जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से शुरू करके श्री हरिशंकर व्यास के संसर्ग में उनके हर प्रयोग का साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और अब ‘नया इंडिया’ के साथ। बीच में थोड़े समय ‘दैनिक भास्कर’ में सहायक संपादक और हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ शुरू करने वाली टीम में सहभागी।

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