पाकिस्तान में दाखिला, हुर्रियत नेताओं की कमाई

जम्मू कश्मीर के पृथकतावादी नेताओं के बारे में जब गहराई से जानकारी हासिल करने लगता हूं तो मुझे लगने लगता है कि वे भले ही खुलकर भारत का विरोध व पाकिस्तान का समर्थन करते हो मगर उनका डीएनए पूरी तरह से भारतीय है। वे आम भारतीय नागरिक की तरह से हर सुविधा का बेजा फायदा उठाना चाहते हैं व उनके महत्व को आकते हुए उनकी पूरी कीमत वसूलते हैं।

हाल ही में आल पार्टी हुर्रियत कांन्फ्रेंस के वयोवृद्ध पृथकतावादी नेता सैयद अली शाह गिलानी द्वारा अपने पद से इस्तीफा दिए जाने के बाद यह बात खुलकर सामने आई कि सारा विवाद लूट के माल के बंटवारे को लेकर था। मुझे याद है कि जब इंदिरा गांधी का वक्त था तब बांग्लादेश युद्ध हुआ तो उससे पहले भारत में बांग्लादेश के शरणार्थियों के लिए विदेश से बड़ी तादाद में लोगों ने अपने गरम कपड़े दान में भेजे थे। कुछ दिनों बाद ही पूरे देश के बाजारों में ये कपड़े बिकने लगे।इन विदेशी कपड़ों के व्यापार से महिलाएं तक मोटा मुनाफा कमाने लगीं। वे यह कपड़े खरीदकर अपने घरो में उसकी सेल लगाती व दावा करती कि विदेश से आने वाले किसी रिश्तेदार ने उन्हें भेजा था।

फिर जब दिल्ली आया तो उस समय देश दूध के संकट से गुजर रहा था। तब योरोपीय यूनियन बड़ी मात्रा में हमें अपना देसी घी (बटर आयल) भेजता था। सरकार ने ही उस दान में मिले घी को लोगों के बीच मुफ्त में बांटने की जगह उसे मदर डेरी के बूथ पर बेचना शुरु कर दिया। जब हरियाणा में भजन लाल मुख्यमंत्री थे तो वे पुलिस व अध्यापकों की भर्ती के दौरान अपने विधायकों व मंत्रियों को खुश रखने के लिए उन्हें उम्मीदवारों का कोड दिया करते थे।

बाद में यही काम उत्तरप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह करने लगे। वे मंत्रियों, विधायकों व अपने पसंदीदा पत्रकारों को पीडब्ल्यूडी आदि के आला अफसरों जैसे चीफ इंजीनियर आदि की नियुक्ति का कोड देते थे ताकि वे उनकी मनचाही जगह नियुक्त करवा कर जेब भर सके। आज यही काम हमारा पड़ौसी दुश्मन देश पाकिस्तान कर रहा है और हुरिर्यत नेता इसका पूरा फायदा उठा रहे हैं।

दशकों से भारत विशेषकर जम्मू कश्मीर के छात्र इंजीनियरिंग, मेडिकल आदि शिक्षा लेने के लिए पाकिस्तान जाते हैं। पाकिस्तान सार्क संगठन का सदस्य है व सभी सदस्यों के बीच एक दूसरे के छात्रों को अपने यहां पढ़ने देने के लिए एक लिखित समझौता है। पाक अधिकृत कश्मीर व पूरे देश के ऐसे तमाम कालिजों में भारत के जम्मू कश्मीर के तमाम छात्रों को दाखिला देकर उन्हें वहां देश के खिलाफ बरगलाया जाता था। ध्यान रहे कि यह व्यवस्था सार्क  के गठन के बाद ही चली आ रही है। सार्क देशों के बीच समझौता है जिसके तहत वे आपसी समझ को बढ़ावा देने के लिए और यहां की शिक्षण संस्थाओं को दूसरे सदस्य देश के छात्रों को दाखिला देती है।

अभी हाल में जब हुर्रियत कान्फ्रेस के संस्थापक व कर्ताधर्ता अध्यक्ष सैयद अली शाह गिलानी ने अध्यक्ष पद से इस्तीफा देते हुए संगठन से सारे संबंध तोड़ लिए तो खुलासा हुआ कि जम्मू कश्मीर के पृथकतावादी नेता किस स्तर पर अपने यहां के लोगों का पाकिस्तान में दाखिला करवा कर मोटी रकम कमा रहे थे। उन्होंने इस संगठन में वित्तीय गड़बड़ियों का आरोप लगाया था।

पाकिस्तान के मेडिकल व इंजीनियरिंग कालेजों में पैसे लेकर भारतीय छात्रों को दाखिला दिलवाने का सिलसिला पिछले दो दशकों से चला आ रहा था। आमतौर पर कोटे के तहत मिलने वाली सीटों के लिए छात्रों को कोई फीस अदा नहीं करनी पड़ती है। पाकिस्तान सरकार ने अपनी छात्र वृत्ति योजना के तहत इसमें पढ़ने वाले छात्रों को वजीफा देने के साथ उसके होस्टल का खर्च भी उठाती है। शुरु में सुरक्षा बलों की मुठभेड़ में मारे गए आतंकवादियों के बच्चों को दाखिला में प्राथमिकता दी जाती ।

इस साल 100 सीटें खाली  रखी गई। इनमें से 50 सीटें तो एमबीबीएस के लिए है। वहां पढ़ने जाने वाले छात्रों को पाक अधिकृत कश्मीर व पाकिस्तानी कालिजों में दाखिला दिया जाता है। इसके अलावा एमफिल व एमएस व पीएचडी करने के लिए भी छात्र दाखिला लेते है। भारत में एमएस की फीस एक करोड़ रुपए करीब है। इस बार कोविड प्रकोप के कारण छात्र वहां नहीं जा पाए। पढ़ रहे पृथकतावादी व मारे गए आतंकवादियों के बच्चों को न्यूनतम अंक की भी जरुरत नहीं पड़ती है।

पिछले साल राष्ट्रीय जांच एजेंसी एनआईए ने खुलासा किया था कि इस सिलसिले में हुर्रियत नेता गिलानी व मीरवाइज सिफारसी पत्र लिखते आए हैं। जिनके आधार पर दाखिले हो जाते है। कुछ पुलिसवालों  ने सिफारिश पर अपने बच्चों का दाखिला करवाया व इस मामले का खुलासा तब हुआ जब हुर्रियत कान्फ्रेंस की मुजफ्फरनगर शाखा के प्रमुख अब्दुल्ला जीलानी ने वहां के हुर्रियत कान्फ्रेंस संयोजक गुलाम मोहम्मद साफी पर यह सीटें बेचने का आरोप लगाया। जीलानी ने उसे इस पद से हटाकर साफी को संयोजक बना दिया। इसे लेकर संगठन में आपसी झगड़े चालू हुए व अंततः इसकी परिणति गिलानी के इस्तीफे में हुई।

मालूम हो कि कश्मीर में व्यासायिक शिक्षा देने वाले कालिज बहुत कम है। पहले वहां से अभिभावक एमबीबीए करवाने के लिए बच्चे को रुस भेजत थे। इसके लिए उन्हें काफी पैसा देना पड़ता था। पर फिर पाकिस्तान की इस स्थिति का लाभ उठाते हुए छात्रों के कम अंकों व कम फीस लेकर भी दाखिला देना शुरु कर दिया। जब भारत के विभिन्न हिस्सों के निजी कालिजों में दाखिला लेने वाले छात्रों पर कश्मीर में बढ़े आतंकवाद के विरोध में हमले हुए तो उनके अभिभावकों ने अपने बच्चों को पाकिस्तान व बांग्लादेश भेजना ज्यादा पसंद किया। समस्या आती है इनकी डिग्री की मान्यता में।

एक अंतरराष्ट्रीय समझौते के तहत मेडिकल काउंसिल आफ इंडिया ने सार्क देशों के 481 मेडिकल कालिजों की डिग्रियों को मान्यता दे रखी है। हालांकि पाकिस्तान से डिग्री हासिल करने वाले मेडिकल छात्रों को भारत में प्रेक्टिस करने के लिए परीक्षा पास करनी पढ़ती है पर योरोप, बांग्लादेश, खाड़ी के देशों में उस आधार पर प्रेक्टिस कर सकते हैं। यह मामला अदालत में गया। छात्रों ने दलील दी कि भारत के अनुसार पाक अधिकृत कश्मीर उसका इलाका है अतः वहां की डिग्री को उसे मान्यता देनी ही होगी। मगर हाईकोर्ट का कहना है कि चूंकि उस इलाके के कालिजों में एमसीआई से मान्यता नहीं ली है अतः उसकी डिग्री को भारत मान्यता नहीं दे सकता है।

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