ये कहां आ गए हम!

हैदराबाद में महिला डॉक्टर के सामूहिक बलात्कार और हत्या के आरोपियों को पुलिस एनकाउंटर में मार गिराया। मुठभेड़ें अक्सर वैसे भी संदिग्ध होती हैं, इसलिए उनको सवाल पूछे जाएं, यह आवश्यक माना जाता है। बहरहाल, आम तौर पर ऐसा पहले भी नहीं होता था। लेकिन अब एक नया ट्रेंड ऐसी घटनाओं पर जन उत्सव मनाने का है। पुलिस ने कहा और लोगों ने मान लिया कि मारे गए लोग असली अपराधी थे। फिर मुठभेड़ की पुलिस की कहानी भी बिना किसी संदेह के स्वीकार कर ली गई। फिर उत्सव शुरू हो गया। इससे स्वाभाविक सवाल उठता है कि देश में कैसा माहौल बन गया है। सभ्य और लोकतांत्रिक होने की इच्छाएं कहां पीछे छूट गई हैं। क्या यह संदेह नहीं किया जाना चाहिए कि एनकाउंटर महिलाओं के अधिकारों की रक्षा करने में पुलिस की नाकामी से लोगों का ध्यान भटकाने के लिए किया गया? क्या यह अपेक्षा अब बेमायने हो गई है कि पुलिस पीट-पीटकर हत्या करने वाली भीड़ यानी लिंच मॉब की तरह व्यवहार नहीं कर सकती? कुछ मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की इस बात में दम है कि यह न्याय नहीं है। बल्कि पुलिस, न्यायपालिका एवं सरकारों से जवाबदेही और महिलाओं के लिए न्याय एवं उनकी गरिमा की रक्षा की मांग करने वालों को चुप करने की ‘साजिश’ है। महिलाओं के अधिकारों की रक्षा करने में सरकार की नाकामी के बारे में हमारे सवालों का जवाब देने और अपने काम के लिए जवाबदेह बनने के बजाय पुलिस ने लिंच मॉब की तरह काम किया और इसका कई राजनेताओं ने समर्थन किया है।

सच यह है कि देश में सख्त कानून मौजूद होने के बावजूद सरकारें इन्हें लागू करने में नाकाम रही हैं। ऐसे में इस मामले में उच्चस्तरीय जांच की मांग औचित्यपूर्ण लगती है। वरना मुमकिन है कि अब सरकारें महिलाओं को एक स्वतंत्र नागरिक का जीवन देने के आश्वासन देने के नाम पर इस तरह की कार्रवाइयों को बढ़ावा दें। गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देश हैं कि एनकाउंटर के हर मामले में पुलिस के खिलाफ एफआईआर दर्ज और जांच होनी चाहिए। ये बात इस मामले पर भी लागू होनी चाहिए। वैसे यह संतोषजनक है कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने इस एनकाउंटर को चिंता का विषय माना है और मामले की जांच के आदेश दिए हैं। ये जांच जल्द, पूरी तत्परता और निष्पक्षता के साथ कराई जानी चाहिए।

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