बैंकों के हाथ भागते भूत की लंगोटी! - Naya India
बेबाक विचार | नब्ज पर हाथ| नया इंडिया|

बैंकों के हाथ भागते भूत की लंगोटी!

IBC bankruptcy law

लंदन मैं बैठे शराब कारोबारी विजय माल्या अफसोस कर रहे होंगे कि काश उन्होंने देश छोड़ कर जाने से पहले थोड़ा इंतजार किया होता! अगर वे थोड़ा इंतजार कर लेते तो न उन्हें भागने की जरूरत पड़ती और न बैंकों का कर्ज चुकाने की जरूरत पड़ती। वे मजे से देश में रहते और बैंकों के बकाया 11 हजार करोड़ रुपए में से सौ-दो सौ करोड़ रुपए देकर सारे कर्ज से मुक्त हो जाते। असल में वे इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरपसी कोड, आईबीसी यानी दिवालिया संहिता आने से पहले देश छोड़ कर चले गए थे। पूछ सकते हैं कि मेहुल चोकसी और नीरव मोदी तो दिवालिया संहिता आने के बाद देश से भागे, क्या वे देश में रह कर नहीं बच सकते थे? नहीं बच सकते थे, क्योंकि नीरव मोदी और मेहुल चोकसी का मामला विजय माल्या से अलग है। माल्या ने कारोबार के लिए कर्ज लिया था, बरसों तक कर्ज चुकाया था और कंपनी घाटे में आई तो वे डिफॉल्टर हुए। लेकिन मोदी-चोकसी ने बैंकों से लेटर ऑफ अंडरटेकिंग यानी एलओयू लेकर फर्जीवाड़ा किया है। उन्होंने बैंककर्मियों की मिलीभगत से फर्जी एलओयू बनाए और विदेश में पैसा निकाला। सो, माल्या का मामला डिफॉल्ट का है, जबकि मोदी-चोकसी का मामला फ्रॉड का है।

यह भी पढ़ें: कोई चुप कराएगा गुलेरिया को?

Govt attempts for no more Nirav Modi, Vijay Mallya like cases; Be aware!  The ones holding overseas citizenship | Zee Business

अब सोचें माल्या अगर देश में रह गए होते तो क्या करते, कैसे बचते? इसके लिए किसी जटिल नीति या कानून को समझने की जरूरत नहीं है। अगर आप तीन केस का ब्योरा ध्यान से पढ़ें तो अपने आप समझ में आ जाएगा कि कैसे बचते। पहला केस शिवा इंडस्ट्रीज का है। शिवा इंडस्ट्रीज का पहला केस इसलिए क्योंकि यह सबसे ताजा है। पिछले ही हफ्ते यह मामला तय हुआ है। शिवा इंडस्ट्रीज के ऊपर अलग अलग बैंकों का 4,863 करोड़ रुपया बकाया था। कंपनी कर्ज नहीं चुका सकी तो दिवालिया हो गई। ध्यान रहे आईबीसी के तहत अब कंपनियों को डिफॉल्टर घोषित करने के लिए बहुत छोटा विंडो मिल रहा है। शिवा इंडस्ट्रीज दिवालिया हो गई तो उसका मामला नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल यानी एनसीएलटी में पहुंचा, जहां से मामले को सुलझाने की हरी झंडी मिल गई।

यह भी पढ़ें: वित्त मंत्री के दावे और हकीकत

कंपनी ने कमेटी ऑफ क्रेडिटर्स यानी कंपनी को कर्ज देने वाले बैंकों के समूह के सामने यह प्रस्ताव रखा कि वे 4,863 करोड़ के बदले 323 करोड़ रुपया दे सकते हैं। यानी कुल कर्ज का 6.5 फीसदी लौटाएंगे, इतना लेना है तो लो, नहीं तो रखो कंपनी अपने पास! कंपनी के प्रमुख सी शिवशंकरन ने कहा कि इस 323 करोड़ में से अभी सिर्फ पांच ही करोड़ देंगे बाकी प्रस्ताव मंजूर होने के बाद 180 दिन यानी छह महीने में चुकाएंगे। कमेटी ऑफ क्रेडिटर्स यानी सीओसी ने खुशी-खुशी इस प्रस्ताव को मंजूर कर लिया। कुल कर्ज का 93.5 फीसदी डूब गया। सीओसी द्वारा मंजूर किया गया प्रस्ताव एनसीएलटी में जाएगा और वहां से मंजूरी के बाद शिवा इंडस्ट्रीज के कर्ज सारे खत्म हो जाएंगे और कंपनी भी मालिक को मिल जाएगी। बैंकों को मिलेगी भागते भूत की लंगोटी!

यह भी पढ़ें: पढ़ाई किसी की प्राथमिकता नहीं है!

दूसरा केस क्लासिक है और आने वाले दिनों में इसे केस स्टडी के तौर पर पढ़ाया जा सकता है। इससे यह पता चलता है कि कानून और संस्थाओं का इस्तेमाल करके कैसे खाया जाता है और खाने दिया जाता है। यह मामला वीडियोकॉन समूह का है। वीडियोकॉन समूह के ऊपर अलग अलग बैंकों का 62 हजार करोड़ रुपए का कर्ज था। कर्ज नहीं चुका पाने की वजह से कंपनी दिवालिया हो गई और एनसीएलटी में पहुंच गई। एनसीएलटी ने दिवालिया संहिता के तहत कार्रवाई शुरू करने का आदेश दिया, जिसके बाद कमेटी ऑफ क्रेडिटर्स ने बातचीत शुरू की। कंपनी के मालिक धूत की ओर से कहा गया कि वे सालाना किस्तों में 40 हजार करोड़ रुपया चुका सकते हैं। उन्होंने हर साल दो-दो हजार करोड़ रुपए देने का प्रस्ताव रखा। लेकिन उनके ऊपर सीओसी के सदस्यों ने मेहरबानी नहीं दिखाई। उनका प्रस्ताव ठुकरा दिया गया और कंपनी बेचने का फैसला हुआ। खरीदार के तौर पर वेदांता समूह सामने आया। वेदांता ने सीओसी के सामने प्रस्ताव रखा कि वे 62 हजार करोड़ के बदले में सिर्फ तीन हजार करोड़ रुपया एकमुश्त दे सकते हैं। सीओसी ने खुशी-खुशी उनको तीन हजार करोड़ रुपए में कंपनी दे दी। सोचें, वीडियोकॉन समूह का 40 हजार करोड़ का प्रस्ताव ठुकरा कर तीन हजार करोड़ का प्रस्ताव स्वीकार किया गया। इस तरह बैंकों के 59 हजार करोड़ रुपए डूब गए और हाथ लगी भागते भूत की लंगोटी! सवाल है कि सी शिवशंकरन को जो सुविधा मिली वह धूत को क्यों नहीं मिली? क्या धूत शिव सेना से सांसद रहे थे इसलिए या वेदांता के मालिक अनिल अग्रवाल सत्तापक्ष के बहुत करीब हैं और बड़ा राजनीतिक चंदा देते हैं इसलिए!

यह भी पढ़ें: बच्चों की वैक्सीन, जल्दी न करें!

तीसरा मामला और दिलचस्प है। दिवान हाउसिंग फाइनेंस लिमिटेड यानी डीएचएफएल के ऊपर एक लाख करोड़ रुपए का कर्ज था। कंपनी दिवालिया हो गई और इसे बेचने की प्रक्रिया शुरू हुई तो खरीदार के तौर पर सामने आया पीरामल समूह- देश के सबसे अमीर आदमी मुकेश अंबानी के समधि की कंपनी। कमेटी ऑफ क्रेडिटर्स ने आनन-फानन में एक लाख करोड़ के बदले में साढ़े 37 हजार करोड़ पर समझौता किया और कंपनी पीरामल समूह को सौंप दी। यानी एक झटके में बैंकों के 63 हजार करोड़ रुपए डूब गए। इस तरह के अनगिनत मामले हैं, जो 2016 में दिवालिया संहिता आने के बाद आए हैं। पतंजलि समूह के रामदेव ने इसी तरह रूचि सोया को खरीदा या इसी तरह आईएलएंडएफएस में बंदरबांट हुई है। इस कानून का इस्तेमाल करके दर्जनों कंपनियां अपने चहेतों को दी गई हैं और बैंकों का पैसा डूबने दिया गया है। अब अगर बैंक दिवालिया हो रहे हैं या बैंकों में पैसा जमा करने वालों को बहुत मामूली ब्याज मिल रहा है तो उसका कारण समझना मुश्किल नहीं है।

यह भी पढ़ें: जुबान बंद कराने की जिद से नुकसान

सवाल है कि क्या यह खेल सरकार को नहीं दिख रहा है? न खाऊंगा न खाने दूंगा का दावा करने वाले प्रधानमंत्री की नाक के नीचे यह खेल चल रहा है। कंपनियां हजारों करोड़ रुपए का कर्ज नहीं चुका रही हैं और एनसीएलटी व आईबीसी प्रक्रिया का इस्तेमाल करके कर्ज से मुक्त हो जा रही हैं! कर्ज से मुक्त होने के बाद कंपनी या तो उनके हाथ में ही रह जा रही है या कुछ चुनिंदा लोगों के करीबी उद्योगपतियों को औने-पौने दाम में मिल जा रही है। सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोगों को बचाने के लिए यह नैरेटिव बनाया जा रहा है कि बैंक वालों की मिलीभगत से यह खेल हो रहा है। यानी कर्ज देने वाले बैंकों की जो कमेटी बन रही है वह कमेटी ऑफ क्रेडिटर्स ही अपना सौदा पटा ले रहे हैं। यह भी कहा जा है रहा है कि दिवालिया संहिता को बदनाम करने के लिए साजिश के तहत ऐसा किया जा रहा है। चाहे किसी की मिलीभगत हो या कोई साजिश हो, लेकिन सवाल है कि पैसे तो उस कमेटी ऑफ क्रेडिटर्स के नही हैं? पैसे तो देश की आम जनता के हैं, जिसकी रखवाली के लिए उन्होंने एक ‘चौकीदार’ भी चुना है! फिर ‘चौकीदार’ की क्या जिम्मेदारी बनती है? ‘चौकीदार’ की जिम्मेदारी लोगों की गाढ़ी कमाई का पैसा बचाने की है उन्हें डूबने देने की नहीं!

By अजीत द्विवेदी

पत्रकारिता का 25 साल का सफर सिर्फ पढ़ने और लिखने में गुजरा। खबर के हर माध्यम का अनुभव। ‘जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से शुरू करके श्री हरिशंकर व्यास के संसर्ग में उनके हर प्रयोग का साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और अब ‘नया इंडिया’ के साथ। बीच में थोड़े समय ‘दैनिक भास्कर’ में सहायक संपादक और हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ शुरू करने वाली टीम में सहभागी।

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *