तो यही हाल होता है

जब सियासी जरूरतें हर चीज पर हावी हो जाएं, तो उसका पहला शिकार साख बनती है। यही भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के मामले में हुआ है। अटकलें यह हैं कि राजनीतिक श्रेय की आवश्यकता से आईसीएम प्रेरित हुआ और उसने कोविड-19 का स्वदेशी वैक्सीन चिकित्सकीय उपयोग के लिए 15 अगस्त तक तैयार कर लेने का निर्देश जारी कर दिया। संबंधित अस्पतालों से कहा कि वे भारत बॉयोटेक के सहयोग से विकसित किए जा रहे संभावित टीके ‘कोवैक्सीन’ के परीक्षण के लिए मंजूरी देने की प्रक्रिया तेज करें। फिलहाल, क्लीनिकल परीक्षण के लिए 12 स्थलों की पहचान की गई है। ‘कोवैक्सीन’ को डीसीजीआई से मानव पर परीक्षण की बीते 29 जून को अनुमति मिली थी। इसे हैदराबाद की कंपनी भारत बायोटेक ने भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) और राष्ट्रीय विषाणु विज्ञान संस्थान (एनआईवी) के साथ मिलकर विकसित किया है।

गौर करने वाली बात यह है कि खुद भारत बायोटेक अक्टूबर से पहले वैक्सीन का ट्रायल पूरा करने से इनकार कर रही है। एक अंग्रेजी अखबार के मुताबिक कंपनी का कहना है कि पहले और दूसरे चरण का ट्रायल अक्टूबर तक ही हो पाएगा। कंपनी को अभी तक पहले और दूसरे चरण का ट्रायल करने की मंजूरी मिली है, जबकि बड़े पैमाने के ट्रायल तीसरे चरण में किए जाते हैं। जाहिर है, आईसीएमआर के वैक्सीन के लिए समयसीमा निर्धारित करने पर आम तौर पर डॉक्टरों और वैज्ञानिकों ने भी आश्चर्य जताया। पत्र के लहजे और जल्दबाजी के संकेत से कुछ वैज्ञानिक चिंतित भी दिखे हैं। उन्होंने कहा है कि वैक्सीन के प्रभाव और सुरक्षा दोनों को ध्यान में रखते हुए यह एक बहुत ही चुनौती भरा काम है। कुछ जानकारों ने समयसीमा को बेतुका कहा है। एक वेबसाइट पर छपी खबर में एक वैज्ञानिक का हवाला दिया गया, जिन्होंने कहा, ‘मुझे डर है कि इसके लिए वैश्विक वैज्ञानिक समुदाय हम पर हंस रहा होगा। ऐसा नहीं होना चाहिए था। भारत विज्ञान के क्षेत्र में एक गंभीर देश रहा है। अगर हम इस तरह का व्यवहार करेंगे तो कौन हम पर भरोसा करेगा? अगर हम वास्तव में कल एक अच्छा वैक्सीन लेकर आएं, तो भी हम पर विश्वास करने वाला कौन करेगा?’ यही प्रमुख सवाल है। मगर आईसीएमआर ने इसकी चिंता नहीं की। बाद में उसने एक लचर सफाई दी कि उसका मतलब सिर्फ फाइल क्लीयर करने की प्रक्रिया को तेज करने से था। लेकिन तब तक नुकसान पहुंच चुका था।

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