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बुलडोजर है काना!

illegal construction bulldozer

अगर राजधानी दिल्ली और एनसीआर के इलाकों की बात करें तो शायद ही कोई निर्माण होगा, जहां कुछ न कुछ अवैध नहीं बना होगा। जिस उत्तरी दिल्ली नगर निगम की टीम जहांगीरपुरी में बुलडोजर लेकर गई थी उसके पास अवैध निर्माण की चार हजार शिकायतें लंबित हैं। लेकिन उसने कभी कार्रवाई करने की जरूरत नहीं समझी। दिल्ली से सटे गुरूग्राम में मेदांता मेडिसिटी प्रोजेक्ट को लेकर कितने बरसों से शिकायत लंबित है। इसके मालिकों के ऊपर धनशोधन के आरोप लगे और यह आरोप भी लगा कि जिस मकसद से किसानों की जमीन ली गई उसके लिए जमीन का इस्तेमाल नहीं किया गया। लेकिन किसी सरकार ने उसकी ओर आंख उठा देखने की जरूरत नहीं समझी। हरिशंकर परसाई ने लिखा था कि कानून को लोग अंधा कहते हैं लेकिन यह असल में काना होता है। उसे एक आंख से एक तरफ की चीजें दिखती हैं और दूसरी तरफ की नहीं दिखती हैं। भारत में भी शासन एक आंख वाला हो गया है।

Hindu Idea Rule of Law

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असल में लगातार बन रहे इस किस्म के नैरेटिव से भारत एक हिंसक और बीमार समाज में तब्दील होता जा रहा है। धार्मिक उत्सवों में हथियार लेकर चलने को न्यायसंगत ठहराया जा रहा है। अल्पसंख्यकों को पूजा स्थल पर जाकर हंगामा करना और अपने धर्म का झंडा लहरा कर अपनी श्रेष्ठता साबित करने फैशन बन गया है। और अगर इसका विरोध हो तो सरकार बुलडोजर लेकर पहुंच जाएगी। यह पहली बार हो रहा है कि देश के लोग गरीब का घर उजाड़े जाने का जश्न मना रहे हैं। उस पर खुश हो रहे हैं। इससे पहले अमीरों या बड़े लोगों के ऊपर कार्रवाई होती थी तो लोग खुश होते थे। अब गरीब पर बुलडोजर चलता है तो खुशी मनाई जाती है। रेहड़ी पटरी वालों के उजाड़े जाने का जश्न मनाया जा रहा है। दिल्ली में 40 डिग्री से ज्यादा तापमान और रमजान के महीने में एक पूरी बस्ती उजाड़ने के लिए बुलडोजर चले तो वातानुकूलित घरों और टेलीविजन चैनलों के स्टूडियो में बैठे लोगों किलकारी लगाते हुए इसका स्वागत किया, जश्न मनाया। सोचें. कैसा बीमार समाज बन रहा है भारत! किसानों को गाड़ी से कुचल दिया, पांच लोग मर गए फिर भी स्टूडियो में बैठे लोग उसे न्यायसंगत बता रहे थे। पहले गरीब या कमजोर को मारने से लोग बचते थे, लेकिन अब उलटा हो गया है। सिर्फ इसलिए कि सरकार कार्रवाई कर रही है उसका समर्थन करना है।

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By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

1 comment

  1. हिन्दूओं के धार्मिक जलसों पर पत्थरबाजी पर तो आप ने एक लाईन भी नहीं लिखी महोदय व्यास जी। राजनैतिक दल तो अपने लाभ हानि को देखकर ही पक्ष विपक्ष की राजनीति करते हैं परन्तु आप जैसे विद्धान लेखक की भी यही एकतरफा सोच हिन्दूओं में निराषा व कट्टरता पैदा करती है।

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