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आगे बढ़ी अलगाव की भावना

अलगाव की भावना एक जगह हावी हो, तो उससे दूसरी जगह भी उसे हवा मिलती है। स्कॉटलैंड के ताजा चुनाव नतीजे को इसी रूप में समझा जा सकता है। ब्रिटेन ने आत्म-केंद्रित नजरिया अपनाते हुए खुद को यूरोपियन यूनियन से अलग किया। तो वैसी भावना अब स्कॉटलैंड में बढ़ी है, तो इसके लिए सिर्फ वहां के लोगों को दोष नहीं दिया जा सकता। हालांकि अभी यह तय नहीं है कि स्कॉटलैंड के लोग अंततः ब्रिटेन से अलग होने का फैसला करेंगे। लेकिन अभी प्रांतीय असेंबली के चुनाव में स्कॉटिश नेशनलिस्ट पार्टी (एसएनपी) को मिली जीत से ये संकेत मिला है कि वहां ऐसी भावना बढ़ रही है। एसएनपी स्पष्ट बहुमत पाने से एक सीट दूर रह गई। लेकिन वहां ग्रीन पार्टी को आठ सीटें मिली हैं। इसलिए एसएनपी की नेता निकोला स्टरजन ने दावा किया है कि आजादी समर्थक दलों को साझा तौर पर पूरा बहुमत मिला है। चुनाव में प्रांतीय असेंबली की 129 में से 64 सीटें एसएनपी को मिलीं। पिछली बार से उसे एक सीट ज्यदा मिली है। ग्रीन पार्टी ने दो सीटों की बढ़ोतरी करते हुए इस बार आठ सीटें जीती हैँ। इस तरह अगर एसएनपी दूसरे जनमत संग्रह की मांग के पक्ष में प्रस्ताव लाएगी, तो उसका पारित हो जाना तय है।

उसके बाद उस मांग को प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन कैसे ठुकराएंगे या उन्होंने ऐसा किया तो उसका क्या असर होगा, ये सवाल अब उठ खड़े हुए हैँ। चुनाव जीतने के तुरंत बाद स्टरजन ने कहा कि अब प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन के पास दूसरे जनमत संग्रह से इनकार करने की कोई वजह नहीं है। उन्होंने कहा कि जनमत संग्रह को सिर्फ एसएनपी की मांग नहीं कहा जा सकता। बल्कि नए सदन में उन सदस्यों का बहुमत है, जिन्होंने जनमत संग्रह का वादा किया था। विश्लेषकों कहना है कि अगर जॉनसन अपने मौजूदा रुख पर अड़े रहे, तो उससे देश एक बड़े संवैधानिक संकट की तरफ बढ़ सकता है। उनकी कंजरवेटिव पार्टी ये दावा कर रही है कि एसएनपी को स्पष्ट बहुमत ना मिलने के साथ ही आजादी की मांग पर विराम लग गया है। लेकिन ये दावा बहुत कारगर नहीं दिखता। गौरतलब है कि स्कॉटलैंड में आजादी के सवाल पर पहला जनमत संग्रह 2014 में हुआ था। तब आजादी समर्थकों की मामूली अंतर से हार हो गई थी। लेकिन ब्रेग्जिट के बाद स्कॉटलैंड में माहौल बदल गया है। इसलिए संभावना है कि अगर दूसरा जनमत संग्रह हुआ, तो उलटा नतीजा आ सकता है।

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