भारत का पूंजीवाद अनोखा है


भारत में कुछ बातों को एक झीने परदे में ढक कर रखने की परंपरा रही है। सरकारें पहले भी निजीकरण को बढ़ावा देती थीं, पूंजीपतियों के लिए काम करती थीं, अपने क्रोनी पैदा करती थीं, लेकिन इसका खुल कर इजहार नहीं किया जाता था। इस पर अर्थव्यवस्था की मजबूती, घाटा कम करने की मजबूरी या आम लोगों के हित का मुलम्मा चढ़ाया जाता था। स्वतंत्र पार्टी को छोड़ कर किसी दूसरी पार्टी ने अब तक पूंजीवाद का खुला समर्थन नहीं किया था। लेकिन भारतीय जनता पार्टी ने उस झीने परदे को एक झटके में खींच कर हटा दिया है। प्रधानमंत्री ने स्वंय और उनकी पार्टी की सांसद मीनाक्षी लेखी ने संसद में खुल कर कहा कि निजी कंपनियों को बढ़ावा देने की जरूरत है।

निजीकरण को बढ़ावा देने के नाम पर सरकारी कंपनियों खास तौर से मुनाफा कमाने वाली कंपनियों को बेचे जाने का विरोध करने वालों को सरकार की ओर से बेहद तीखी और चेतावनी देने के अंदाज में जवाब दिया गया है। प्रधानमंत्री ने संसद में खुद कहा है कि वोट के लिए निजी कंपनियों के खिलाफ अनुचित बात करने को बरदाश्त नहीं किया जाएगा। उन्होंने किसी का नाम नहीं लिया, लेकिन सबको पता है कि वे किन निजी कंपनियों की बात कर रहे थे। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ कि किसी सरकार का मुखिया इस तरह से खुल कर निजी कंपनियों के बचाव में उतरा हो।

प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में कहा कि सरकारी कंपनियां तो ठीक हैं पर निजी कंपनियों का भी बहुत महत्व है। उन्होंने आगे कहा कि भारत अगर आज दुनिया के अनेक देशों की सेवा कर रहा है तो वह निजी कंपनियों के कारण ही संभव है। सोचें, क्या इस तर्क से निजी कंपनियों को बढ़ावा देने और सरकारी कंपनियों को बेचने के फैसले को न्यायसंगत ठहराया जा सकता है? अगर सीरम इंस्टीच्यूट ऑफ इंडिया में उत्पादित वैक्सीन को भारत दुनिया भर में भेज रहा है तो हो सकता है कि इसका कुछ कूटनीतिक फायदा हो पर यह भारत की कारोबारी उपलब्धि कैसे है? साठ साल पहले बनी एक निजी कंपनी दुनिया के दूसरे देश में ईजाद की गई वैक्सीन का उत्पादन कर रही है और उस निजी कंपनी की वैक्सीन को अपने पैसे से खरीद कर अगर भारत सरकार दुनिया के देशों में भेज रही है तो यह कौन सी उपलब्धि हुई? यह एक निजी कंपनी की कारोबारी सफलता है लेकिन इसके आधार पर सरकारी कंपनियों को बेचने के फैसले को जायज नहीं ठहराया जा सकता है, बल्कि यह इस कमी सबूत है कि भारत में सरकारों ने आज तक शोध और रिसर्च पर ध्यान नहीं दिया, उस पर खर्च नहीं बढ़ाया और उच्च गुणवत्ता वाले शोध संस्थान तैयार नहीं किए। सरकारों की इस कमी को एक निजी संस्थान की उपलब्धि के पीछे छिपाना कोई बहुत तारीफ की बात नहीं हो सकती।

प्रधानमंत्री ने लोकसभा के भाषण में एक और हैरान करने वाली बात यह कही कि देश को सरकारी बाबुओं के हवाले कर देने से क्या हासिल होगा, क्या सरकारी बाबू सब काम कर सकते हैं? निश्चित रूप से सरकारी बाबू सब काम नहीं कर सकते हैं और देश भी किसी ने उनके हवाले नहीं किया है क्योंकि उनके ऊपर जनता के चुने लोगों के हाथ में कमान होती है। पर सवाल है कि इस देश में निजी सेक्टर के पेशेवरों ने क्या कमाल कर दिया है? इस देश की शीर्ष दस कंपनियों के कामकाज का विश्लेषण किया जाए तो पता चलेगा कि ज्यादातर कंपनियों के शीर्ष अधिकारियों ने सरकारों के साथ जनसंपर्क बनाने का काम किया है और नेता, मंत्री, अधिकारी के गठजोड़ का फायदा उठा कर अपनी कंपनी का कारोबार और मुनाफा बढाया है। उनका एकमात्र काम सरकारी ठेके हासिल करना, जोड़-तोड़ करके बैंकों से कर्ज लेना और प्राकृतिक संपदा हथिया कर अपनी कमाई बढ़ाना है।

भारत की दो-चार कंपनियों को छोड़ दें तो कौन सी कंपनी विश्व स्तर पर प्रतिस्पर्धा कर रही है और भारत की अर्थव्यवस्था को मजबूती दे रही है? भारत की किस कंपनी ने निर्यात आधारित कारोबार स्थापित किया है और भारत के निर्यात को बढ़ाया है? भारत की कौन सी निजी कंपनी दुनिया के दूसरे देश में सेवा दे रही है या किस निजी कंपनी का कौन सा उत्पाद दुनिया के दूसरे देशों में बिक रहा है? सॉफ्टवेयर या आईटी आधारित सेवा देने वाली गिनी चुनी कंपनियों को छोड़ दें तो इस देश की कोई कंपनी दुनिया को कुछ भी निर्यात नहीं कर रही है। देश की जिन निजी कंपनियों के खिलाफ अनुचित बात बरदाश्त नहीं करने की बात कही जा रही है उन कंपनियों की कुल जमा उपलब्धि यह है कि वे अलग अलग सरकारों की कृपा से फली-फूली हैं, सरकारी संपत्ति व प्राकृतिक संपदा का दोहन करके उन्होंने अपने को मजबूत किया है और उनका देश की अर्थव्यवस्था में कोई योगदान नहीं है।

भारत का पूंजीवाद इस मायने में अनोखा है कि दुनिया के किसी देश में ऐसा देखने को नहीं मिलता है कि एक कंपनी दस तरह के कारोबार में हो। जेफ बेजोस की कंपनी अमेजन है और उनका एक ही कारोबार है ई-कॉमर्स का। वे दुनिया के सबसे अमीर आदमी हो गए तो ऐसा नहीं हुआ कि वे अमेरिकी हवाईअड्डे या रेलवे स्टेशन खरीदने लगे। स्टीव जॉब्स की बनाई कंपनी है एपल, जिसका एक ही कारोबार है मोबाइल-कंप्यूटर-लैपटॉप या इनसे जुड़ी सामग्री बनाना। मार्क जकरबर्ग ने फेसबुक बनाया तो उनका कारोबार सिर्फ सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का है। सर्गेई बिन ने गूगल बनाया तो उनका बुनियादी काम सर्च इंजन का ही है, जैसे बिल गेट्स का काम माइक्रोसॉफ्ट का है, एलन मस्क का टेस्ला का है या रूपर्ट मर्डोक का चैनल और फिल्म का है। अमेरिका या यूरोप में बड़े कॉरपोरेशन बने हैं तो उन्होंने आविष्कार किए हैं, नया उत्पाद बनाया है और उसे पूरी दुनिया में बेचा है। वे पूरी दुनिया से पैसा कमा कर अपने देश में लाते हैं।

भारत में इसका उलटा होता है। भारत में एक कारोबारी ऐसा है जो पेट्रोलियम सेक्टर में है, संचार के क्षेत्र में है, खुदरा कारोबार के क्षेत्र में है, अनाज खरीदने का भी उसका काम है, फिल्म निर्माण के क्षेत्र में है और न्यूज चैनल व डीटीएच के कारोबार में भी है। एक दूसरा कारोबारी है, जो बंदरगाह के कारोबार में है, हवाईअड्डे संचालित करने के कारोबार में है, रेलवे स्टेशनों के संचालन के कारोबार में है, खाद्यान्न उत्पादन में है तो अनाज खरीदने और भंडारण के कारोबार में भी है, लॉजिस्टिक्स के कारोबार में है, खदान के कारोबार में है तो गैस पाइपलाइन के कारोबार में भी है और बिजली उत्पादन व वितरण के धंधे में भी है। अगर सिर्फ इन दो कारोबारियों की बात करें तो ये देश में होने वाले लगभग हर धंधे में हैं और हर धंधे में इनको अपना एकाधिकार बनाना है और जब इन पर सवाल उठता है तो प्रधानमंत्री कहते हैं कि निजी कंपनियों के खिलाफ अनुचित बात बरदाश्त नहीं की जाएगी? सोचें, अमेरिका में फेसबुक चलाने वाली कंपनी ने व्हाट्सऐप और इंस्टाग्राम का अधिग्रहण किया तो वहां इस एकाधिकार को लेकर संसद में हंगामा हुआ और संसदीय समिति के सामने फेसबुक के मालिक की पेशी हुई और उनसे एकाधिकार खत्म करने को कहा गया। इसके उलट भारत में सरकार गिनी-चुनी कंपनियों का एकाधिकार बनवाने की बात कर रही है!

निजीकरण, एकाधिकार, सरकारी कंपनियों की बिक्री आदि को न्यायसंगत ठहराते हुए भाजपा की सांसद मीनाक्षी लेखी ने लोकसभा में चीन के जैक मा की मिसाल दी और कहा कि अमीर होने के लिए चीन को भी पूंजीपतियों को आगे लाना पड़ा। अव्वल तो यह मिसाल देनी ही नहीं चाहिए क्योंकि चीन में ऐसे कारोबारी गिने-चुने हैं। वहां अब भी कारोबार पर सरकार का नियंत्रण है। रणनीतिक कारोबार या जनता को मिलने वाली सेवाएं लगभग पूरी तरह से सरकार के नियंत्रण में हैं और जहां तक जैक मा की बात है तो वे ई-कॉमर्स के क्षेत्र में ऑनलाइन टू ऑफलाइन कारोबार का एक नया मॉडल लेकर आए और उनकी कंपनी अलीबाबा का जितना कारोबार चीन में है उससे बहुत ज्यादा कारोबार दुनिया के दूसरे देशों में फैला है। भारत में कौन सा पूंजीपति नया बिजनेस मॉडल लेकर आया है या किस पूंजीपति का कारोबार दुनिया के दूसरे देशों में फैला है? जैक मा पैसे कमा कर अपने देश में ला रहे हैं। भारत का कौन सा कारोबारी क्या निर्यात कर रहा है, जिससे विदेशी पूंजी भारत आ रही है? भारत के पूंजीवाद की हकीकत यह है कि 2018 में भारत की कुल संपत्ति का 58 फीसदी हिस्सा देश के एक फीसदी लोगों के पास था और एक साल में यानी 2019 में देश की संपत्ति का 73 फीसदी हिस्सा उन एक फीसदी लोगों के पास पहुंच गया! क्या ऐसे पूंजीवाद को किसी तर्क से न्यायसंगत ठहराया जा सकता है?


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