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चीन से टकराव के लिए तैयारी रहना होगा

चीन ने एक बार फिर वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी एलएसी पर यथास्थिति बदलने का एकतरफा प्रयास किया है। इस बार उसका निशाना अरुणाचल प्रदेश के तवांग सेक्टर में था। घटना नौ दिसंबर 2022 की है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने संसद के दोनों सदनों में बयान देकर इस बात की पुष्टि की है कि चीन ने एलएसी पर यथास्थिति बदलने का प्रयास किया यानी अपनी तय जगह से आगे बढ़ने का प्रयास किया। इससे पहले पिछले ढाई साल से ज्यादा समय से वह पूर्वी लद्दाख में भारत के साथ उलझा हुआ है। जून 2020 में उसने पूर्वी लद्दाख में एकतरफा तरीके से यथास्थिति बदलने का प्रयास किया था। तब गलवान घाटी में भारतीय सैनिकों के साथ उसकी हिंसक झड़प हुई थी, जिसमें भारत के 20 जवान शहीद हुए थे। चीन को भी बड़ा नुकसान हुआ था लेकिन उसने आधिकारिक रूप से चार सैनिकों के मारे जाने की बात कबूल की थी। उससे पहले 2017 में उसने यही काम डोकलाम में किया था। वहां भी कई महीने तक गतिरोध बना रहा था।

सो, अगर बारीकी से देखें तो इसमें साफ साफ एक पैटर्न नजर आता है। एक निश्चित अंतराल पर वह नियंत्रण रेखा के किसी न किसी प्वाइंट पर टकराव बढ़ाता है। हर बार वह जान बूझकर उकसावे की कार्रवाई करता है। एकतरफा तरीके से यथास्थिति बदलने का प्रयास करता है। और सरकार भले न माने लेकिन इस तरह की हर कार्रवाई के बाद वह कुछ न कुछ जमीन कब्जा करता है। आजादी के बाद पहली लड़ाई में उसने अक्साई चिन पर कब्जा किया था। उसके बाद उसने लड़ाई नहीं की पर छोटी मोटी झड़प और घुसपैठ की कोशिश लगातार होती रहती है। एक रिपोर्ट के मुताबिक 2005 से 2015 के बीच चीन की ओर से तीन सौ बार घुसपैठ की कोशिश की गई थी और 2015 से 2020 के पांच साल में घुसपैठ की घटनाएं दोगुनी हो गई हैं। हर बार इसका मकसद नियंत्रण रेखा पर किसी नए बिंदु पर विवाद पैदा करना और कुछ जमीन कब्जा करना है। चीन ने अपनी भौगोलिक सीमा में करीब 40 फीसदी जमीन दूसरे देशों की कब्जाई है। पांच पड़ोसी देशों की जमीन कब्जा करके उसने भौगोलिक सीमा बढ़ाई है।

सारी दुनिया उसकी विस्तारवादी नीतियों से परिचित है। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कितनी बार बिना नाम लिए चीन की विस्तारवादी नीतियों पर सवाल उठा चुके हैं। दक्षिण चीन सागर में उसकी ऐसी नीतियों से कितने ही देश परेशान हैं। उसकी नजर ताइवान पर है और खुल कर उसने अपनी मंशा जाहिर की है। उसकी नजर भारत में तवांग पर है तो पूर्वी लद्दाख के पैंगोंग झील, डेमचक, गोगरा हॉटस्प्रिंग के इलाके में भी उसने विवाद का क्षेत्र बढ़ा दिया है। सिक्कम के डोकलाम में उसकी नजर है, जिसे भारत के लिए ‘चिकेन नेक’ कहा जाता है। वहां पर कब्जा करके भारत को बड़ा नुकसान पहुंचाया जा सकता है। ध्यान रहे पूर्वी लद्दाख की घटना के बाद भारत और चीन के सैन्य कमांडरों के बीच 16 दौर की वार्ता हो चुकी है और इसके बावजूद सिर्फ दो बिंदुओं से ही सैनिकों की वापसी का समझौता हुआ है। वहां उसने भारत को ढाई साल से ज्यादा समय से उलझाया हुआ है और इस बीच तवांग में नया मोर्चा खोल दिया।

उसको पता था कि भारत के सैनिक अलर्ट होंगे और करारा जवाब देंगे। फिर भी उसने सिर्फ विवाद बढ़ाने के लिए उकसावे की कार्रवाई की है। भारतीय सेना ने नौ दिसंबर को करारा जवाब दिया और उस घटना का एक वीडियो वायरल हुआ है, जिसमें चीनी सैनिक भागते दिख रहे हैं। चीनी सैनिकों की संख्या दो सौ के करीब थी और यह भी कहा जा रहा है कि वे कारगिल जैसी किसी घटना को अंजाम देने आए थे। कारगिल जैसी घटना का मतलब है कि वे ऊंचाई पर भारत की चौकियों पर कब्जा कर लेते और खाली नहीं करते। उसे खाली कराने के लिए या तो युद्ध करना होता या चीन के सैन्य कमांडरों के साथ लंबी वार्ताएं चलतीं। भारतीय सैनिकों ने ऐसी किसी संभावना को समाप्त कर दिया।

परंतु इस घटना से कई गंभीर सवाल खड़े हुए हैं। सबसे पहला सवाल तो यही है कि भारत का डिप्लोमेटिक एंगेजमेंट कैसा है, जो चीन के साथ अक्सर इस तरह के टकराव की नौबत आ जा रही है? अगर कूटनीतिक वार्ता लगातार चलती रहती तो ऐसी नौबत नहीं आनी चाहिए थी। ध्यान रहे भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर को चीन का विशेषज्ञ माना जाता है और वे लंबे समय तक चीन में भारत के राजदूत रहे हैं। लेकिन उनके विदेश मंत्री मंत्री बनने के बाद भारत और चीन के बीच टकराव ज्यादा बढ़ गया है। ऐसे में भारत के सामने एक ही रास्ते है कि वह कूटनीतिक संबंध न्यूनतम करे और हर समय टकराव के लिए तैयार रहे। यह सबसे अच्छा और जरूरी रास्ता है। भारत को अगर अपनी सीमाओं की रक्षा करनी है और चीन के विस्तारवादी मंसूबों का जवाब देना है तो उसे सैन्य तैयारियां बढ़ानी होगी। यह अच्छा हुआ, जो तवांग में घुसपैठ के प्रयासों के बाद भारतीय वायु सेना के लड़ाकू विमानों ने भी उड़ान भरी और चीन के ड्रोन को खदेड़ को बाहर निकाला। भारत को चीन के साथ लगती सीमा पर हर जगह अपनी सैन्य तैयारियां बढ़ानी होगी, सैनिकों की तैनाती बढ़ानी होगी और बुनियादी ढांचे में सुधार करना होगा। सड़क, रेल लाइन और एयरपोर्ट बनाने होंगे ताकि जल्दी से जल्दी सेना और सैन्य सामग्री पहुंचाई जा सके। चीन के साथ युद्ध की तैयारी रख कर ही सीमा पर सुरक्षा और शांति की गारंटी हो सकती है।

इसके अलावा दूसरा रास्ता यह है कि चीन के साथ भारत अपना कारोबार कम करे। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि चीन के प्रति सख्त रवैया दिखाने के नाम पर टिकटॉक बैन करने जैसे प्रतीकात्मक काम हुए हैं। यह भी दुर्भाग्य है कि जब चीन के सैनिकों के साथ झड़प की खबर आई तो देश के गृह मंत्री ने अपने जवाब में यह कहा कि कांग्रेस पार्टी से जुड़े राजीव गांधी फाउंडेशन का एफसीआरए इसलिए रद्द किया गया क्योंकि उसने चीन से चंदा लिया था। सोचें, चीन से चंदा लेने पर एक संगठन का एफसीआरए रद्द करना कौन सी बड़ी बात है, जबकि चीन के साथ भारत का कारोबार ऐतिहासिक ऊंचाई पर पहुंच गया है। गलवान घाटी में झड़प के बाद चीन के साथ कारोबार में बेहिसाब बढ़ोतरी हुई है। भारत का कारोबार एक साल में 125 अरब डॉलर पहुंच गया है। इससे पहले कभी भी भारत और चीन का कारोबार सौ अरब डॉलर नहीं पहुंचा था। भारत के लिए चिंता की बात यह है कि इस कारोबार में 80 अरब डॉलर से ज्यादा का कारोबार घाटा भारत को है। सोचें, एक तरफ चीन के हाथ हमारे सैनिकों के खून से रंगे हैं तो हम उनके साथ कारोबार बढ़ाते जा रहे हैं! तभी, भारत को वैकल्पिक व्यवस्था करते हुए चीन के साथ कारोबार कम करना चाहिए।

इसके अलावा यह भी जरूरी है कि सरकार देश के नागरिकों को सचाई बताए। सरकार लगातार इस मामले पर परदा डालती रहती है। प्रधानमंत्री ने गलवान की घटना के बाद कहा था कि न कोई घुसा है और न कोई घुस आया है, जबकि स्वतंत्र रिपोर्ट में दावा किया गया कि चीन ने भारत की काफी जमीन कब्जा कर ली या पुराने गश्त की जगह से भारत को पीछे कर दिया। तवांग की घटना के बाद भी अमित शाह ने कहा कि जब तक केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार है तब तक कोई एक इंच जमीन कब्जा नहीं कर सकता। अगर ऐसा हो तो अच्छी बात है लेकिन सामरिक जानकार, सेटेलाइट की तस्वीरें और स्वतंत्र सामरिक विश्लेषक इससे सहमत नहीं हैं। वे मान रहे हैं कि चीन ने भारत को पीछे हटाया है। अगर भारत सरकार सच नहीं बताएगी तो उससे चीन का हौसला बढ़ेगा। उसको लगेगा कि सरकार अपनी छवि की चिंता में तथ्यों से समझौता कर रही है तो वह और आगे बढ़ेगा। इसलिए लोगों के सामने सच रखा जाना चाहिए।

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By अजीत द्विवेदी

पत्रकारिता का 25 साल का सफर सिर्फ पढ़ने और लिखने में गुजरा। खबर के हर माध्यम का अनुभव। ‘जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से शुरू करके श्री हरिशंकर व्यास के संसर्ग में उनके हर प्रयोग का साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और अब ‘नया इंडिया’ के साथ। बीच में थोड़े समय ‘दैनिक भास्कर’ में सहायक संपादक और हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ शुरू करने वाली टीम में सहभागी।

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