क्या लद्दाख पर कांग्रेस का कहा काल्पनिक?


जिस दिन से चीन और भारत की सरकार ने लद्दाख में शांति बहाली के समझौते और सैनिकों की चरणबद्ध वापसी का ऐलान किया है उस दिन से कांग्रेस इस बात को लेकर हमलावर है कि सरकार ने ‘भारत माता की जमीन चीन को सौंप दी’। पहले राहुल गांधी ने कहा कि सरकार ने ‘भारत माता की छाती चीर कर एक टुकड़ा चीन को दे दिया’ और उसके बाद कांग्रेस की सरकार में रक्षा मंत्री रहे एके एंटनी ने प्रेस कांफ्रेंस करके कहा कि भारत ने अपनी जमीन गंवा दी है। दूसरी ओर सरकार का कहना है कि चीन के साथ समझौते में ‘भारत ने कुछ भी नहीं खोया है’। भाजपा के नेता और केंद्र सरकार के मंत्री पहले राहुल को अगंभीर बताते थे लेकिन चीन वाली बात के बाद उन्होंने कहना शुरू किया है कि राहुल गांधी काल्पनिक बातें करते हैं। सवाल है कि क्या सचमुच चीन के साथ हुए समझौते और सैनिकों की वापसी के मामले में राहुल और कांग्रेस काल्पनिक बातें कर रहे हैं?

असलियत यह है कि राहुल गांधी या कांग्रेस पार्टी और दूसरे सामरिक विशेषज्ञ काल्पनिक बातें नहीं कर रहे हैं, बल्कि सरकार अपनी छवि बचाने और लोगों में झूठी धारणा बनवाने के लिए अधूरा सच बता रही है। कहा जा रहा है कि दोनों देशों के सैन्य कमांडरों की मोल्डो में हुई नौवें दौर की वार्ता में बनी सहमति के आधार पर पैंगोंग झील के उत्तरी और दक्षिणी सिरे से दोनों देशों के सैनिक चरणबद्ध तरीके से पीछे हट रहे हैं। जिस दिन यह खबर आई उस दिन से भारतीय मीडिया में और सोशल मीडिया में भी यह प्रचार चल रहा है कि चीन डर कर पीछे हट गया। ऐसा लग रहा है कि पांच राज्यों के चुनाव, किसान आंदोलन और बिगड़ती आर्थिकी के बीच एक सकारात्मक धारणा बनवाने के लिए यह प्रचार हुआ है। असल में यह समझौता अधूरा है और इस समझौते से अप्रैल 2020 से पहले की स्थिति बहाल नहीं हो रही है। अप्रैल 2020 से पहले की स्थिति तब बहाल होगी, जब चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी यानी पीएलए देपसांग में भी पीछे हटे, पूरी गलवान घाटी में भारतीय सेना की गश्त शुरू हो और गोगरा-हॉट स्प्रिंग का भी पूरा इलाका चीन खाली कर दे।

चीन इन तीनों इलाकों में अंदर तक घुसा हुआ है। अप्रैल 2020 से पहले की स्थिति बहाल कराने के लिए भारत को चीनी सैनिकों को 18 किलोमीटर पीछे धकेलना होगा। चीन के सैनिक देपसांग प्लेन में 18 किलोमीटर पीछे जाएंगे  तब यथास्थिति बहाल होगी। ऐसे ही पूरी गलवान घाटी हमेशा भारत की रही है और इस पर कभी विवाद नहीं रहा है इसलिए जब भारतीय सेना पेट्रोलिंग प्वाइंट 14 तक गश्त करने लगेगी तब माना जाएगा कि यथास्थिति बहाल हुई है। पीएलए गोगरा-हॉट स्प्रिंग का पूरा इलाका खाली कर दे और पैंगोंग झील के उत्तरी छोर पर बफर जोन फिंगर आठ के दोनों तरफ बन जाए तब माना जाएगा कि यथास्थिति बहाल हुई है। अभी पैंगोंग झील के उत्तरी छोर पर बफर जोन पूरी तरह से भारत की जमीन पर आ गया है।

पैंगोंग झील के उत्तर में पूरा बफर जोन भारत की सीमा के अंदर है। इस इलाके में पहले भारत की सेना गश्त करती थी लेकिन चीन के साथ समझौते में भारत ने इस इलाके के बड़े हिस्से को बफर जोन में बदल दिया है। इस इलाके में भारत के नियंत्रण पर कभी भी विवाद नहीं रहा है। चीन के साथ युद्ध के समय भी इस पर विवाद नहीं था। यह सही है कि उत्तर सिरे पर फिंगर आठ के दोनों तरफ दोनों देशों के सैनिक गश्त करते थे, लेकिन अब बफर जोन भारत में फिंगर दो और चार के बीच आ गया है। सबसे ज्यादा हैरान करने वाली बात यह है कि सरकार कैलाश पर्वत का क्षेत्र खाली कर रही है। चुशुल घाटी की रक्षा के लिए कैलाश का इलाका बेहद अहम है। सोचें, पैंगोंग झील के उत्तर में बफर जोन भारत के नियंत्रण वाले हिस्से के अंदर लाने और कैलाश पर्वत का क्षेत्र खाली करने के फैसले के बावजूद कहा जा रहा है कि भारत ने कुछ नहीं खोया है!

भारत के लिए संतोष की बात कुल जमा इतनी है कि दोनों देशों की सेना, जहां एक-दूसरे के आमने-सामने आ गई थी और 24 घंटे टकराव की स्थिति बन गई थी वहां से अब दोनों के सैनिक पीछे हट गए हैं। इस तरह टकराव की संभावना टल गई है। यह अच्छी बात है क्योंकि दोनों देशों के बीच मामूली टकराव भी बड़े युद्ध में बदल सकता था। ध्यान रहे गलवान घाटी में पिछले साल 15 जून को दोनों के बीच हिंसक झड़प हुई थी, जिसमें भारत के 20 सैनिक शहीद हुए थे और चीन के भी सैनिक मारे गए थे। अब वैसी स्थिति से बचा जा सकेगा क्योंकि सेनाएं पीछे हट गई हैं। इसके अलावा भारत के लिए इस समझौते में फायदे वाली कोई बात नहीं है। उलटे पैंगोंग झील के उत्तरी छोर पर नुकसान यह है कि बफर जोन भारत की सीमा में आ गया है और दक्षिण छोर पर नुकसान यह है कि वहां भारत ने अपनी मजबूत स्थिति गंवा दी है।

ध्यान रहे पैंगोंग झील का दक्षिणी छोर हमेशा भारत का मजबूत इलाका रहा है। उस इलाके में चीन ने 1959 में अवैध कब्जा किया था इसके बावजूद भारत का ताकुंग बेस मजबूत और सुरक्षित है। इस बार चीन 1959 में कब्जे वाले इलाके से भी आगे बढ़ गया है। भारत के लिए नुकसान की बात यह है कि भारत पैंगोंग झील के उत्तरी और दक्षिणी दोनों सिरे से पीछे हट रहा है। दक्षिण में भारत के पास चीन के मुकाबले बढ़त थी, पीछे हट कर भारत उसे गंवा रहा है। भविष्य में किसी भी किस्म के टकराव की स्थिति में भारत के पास कोई एडवांटेज नहीं रहेगा।

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने संसद में दिए अपने बयान में कहा कि कुछ मुद्दे अब भी लंबित हैं, जिन्हें जल्दी ही सुलझाया जाएगा। उम्मीद की जानी चाहिए कि आगे की वार्ता में भारत की ओर से देपसांग का इलाका खाली करने के लिए दबाव बनाया जाएगा। जितनी जल्दी हो भारत को देपसांग, गोगरा-हॉट स्प्रिंग और गलवान घाटी पूरी तरह से खाली करानी चाहिए। भारत ने पैंगोंग झील के दक्षिण सिरे पर अपनी एडवांटेज गंवा दी है। और पैंगोंग हिल्स से भारतीय सैनिक नीचे उतर जाते हैं तो चीनी सैनिकों के मूवमेंट पर नजर रखना भारत के लिए मुश्किल हो जाएगा। भारत सरकार बेशक राहुल गांधी की बातों को काल्पनिक कह कर खारिज करे और उस पर ध्यान नहीं दे पर अपने सांसद और वरिष्ठ नेता सुब्रह्मण्यम स्वामी की बात जरूर सुने। चीन के साथ सैनिक पीछे हटाने के समझौते के तीन दिन बाद स्वामी ने ट्विट करके पूछा था कि क्या चीन देपसांग में पीछे हट रहा है? अगर नहीं तो सरकार इसके लिए दबाव बनाए। उन्होंने यह भी कहा था कि सेना प्रमुख जनरल एमएम नरवणे ने पीएलए के ठिकानों पर नजर रखने के लिए पैंगोंग हिल्स पर सैनिक तैनात किए थे। अब उन्हें वापस बुलाया जा रहा है। तब सवाल है कि पीएलए की गतिविधियों की निगरानी कैसे होगी? अगर चीन ने अचानक कोई हरकत की तो क्या होगा?


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