चीन को दिखलानी होगी ताकत!

चीन पर हम वैसे नहीं सोचते हैं, जैसे पाकिस्तान पर सोचते हैं। तभी दोनों सीमाओं पर सतर्कता में फर्क है। भारत में लोग हैरान हुए थे यह जान कर कि चीनी सीमा पर भारत के निहत्थे सैनिक तैनात हैं। डोकलाम और गलवान घाटी में दोनों तरफ के सैनिकों की पहलवानी वाली भिड़ंत के वीडियो जब लोगों ने देखे तो सब चकित हुए। कैसे ऐसा? दरअसल भारतीय नेताओं ने ही परस्पर भरोसा बनाने के ख्याल में चाहा कि चीन की सीमा पर बिना बंदूक के सैनिकों की गश्त रहे ताकि गोली चलने का खतरा नहीं हो। चीनी सीमा पर हिंसा और गोलीबारी का तनाव न बने। क्या अर्थ है? पहला अर्थ हुआ कि भारत का रक्षा प्रतिष्ठान पाकिस्तान और चीन की सीमा काफर्क लिए हुए है। दूसरी बात, चीन से सैनिक पंगा न हो, इसकी अतिरिक्त सावधानी में भारत का व्यवहार है। तीसरी बात, चीन की विस्तारवादी नियत में भारत का रक्षा प्रतिष्ठान चौकन्ना नहीं है, जबकि हकीकत है कि 1947 सेले कर अब तक चीन ने यदि किसी दिशा में सर्वाधिक विस्तार किया है तो बीजिंग से दक्षिण दिशा में किया है। सोचें जरा इस बात पर!

हां, चीन का विस्तारवादी मिशन दक्षिण में है। उसने पूरा तिब्बत खाया। उसने भारत का पूरा अक्साई चीन पठार खाया। यहीं नहीं पाकिस्तान से भी कश्मीर का उत्तरी हिस्सा खाया। वह लद्दाख, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश फिर भारत से पार वियतनाम को खाना चाहता है। चीन ने रूस, मंगोलिया व मध्य एशिया से ले दे कर सीमा समझौते किए हैं लेकिन भारत के साथ सीमा विवाद ओपन रखा हुआ है। वह भारत से सीमा वार्ता में तनिक रियायती नहीं है न सीमा विवाद सुलटाने में संजीदा है। वजह हान सभ्यता की सभ्यतागत सोच है। भारत में चीन विस्तार चाहता है। भारत की भीड़ को वह आर्थिक उपनिवेश जैसे निर्भर बनाना चाहता है ताकि दक्षिण एशिया से उसका हिंदमहासागर क्षेत्र, अफ्रीका, अरब भूभाग पर साम्राज्यवादी दबदबा बने। वह भारत को थका-थका कर, उसे पाकिस्तान- इस्लाम से घेरे रख कर, उसे रोजी-रोटी धंधों में अपने पर आश्रित बना कर उसकी वहीं हैसियत बनाना चाहता है जैसे मध्य एशिया के कुछ देशों की बनाई है।

मेरी यह थीसिस आपको बहुत फैली व दीर्घकालिक लग सकती है लेकिन सभ्यतागत विचार में ऐसे ही सोचना होता है। मैं माओ, देंग से लेकर शी की लीडरशीप में चीन की इस मनोवृत्ति को बूझता हूं कि देश चीन का मकसद दुनिया की धुरी बनना है। उसमें भारत की भीड़, भारत के आकार को वह जहां बाजार बनाना चाहता है तो भारत को निर्भर और दब्बू बनाना उसका भू-राजनीतिक मिशन है।

ऐसा भारत और भारत की सरकार नहीं मानती। तभी पंडित नेहरू पंचशील का हल्ला लिए हुए थे तो नरेंद्र मोदी ने वुहान स्पिरिट में चीन का भारत में धंधा चमकाया और सीमा पर चीन की धौंस को यह सोचते हुए बरदाश्त करते हैं कि हमें चीन को लेकर विचारना होगा। सीमा पर गोलीबारी नहीं होने देनी है। चीन का विश्वास जीतना है।

सो,पाकिस्तान की सीमा पर भारत की चौकसी अलग तरह की और चीन की सीमा पर अलग। जबकि दोनों दुश्मन हैं और दोनों का साझा है। दोनों की सीमा दुश्मन के एक सिक्के के दो पहलू। पर नई दिल्ली के सत्ता-रक्षा प्रतिष्ठान ने भारत के दुश्मन के नाते सिक्का केवल और केवल पाकिस्तान का बना रखा है। उसमें एक तरफ चीन की फोटो इसलिए नहीं क्योंकि तब चीन से धंधा किस सिक्के में होगा।

तभी बार-बार बिंदु उभरता है कि कैसे तो भारत राष्ट्र-राज्य सोचता है और भारत की लीडरशीप को कैसे बुद्धि प्राप्त हो! लीडरशीप कैसे विजनरी बने?वह देशों के व्यवहार की गहराई कैसे पाए और कैसे साहस मे रचे-बसे? यदि भारत के नेता अपनी प्रजा को मूर्ख बनाने के काम में से दस प्रतिशत फुरसत निकाल सोचे होते कि अपने लोगों को भरमाने की बजाय यह मकसद हो कि दुश्मन और दुनिया को समझ उन्हें भारत माफिक ठीक करना है तो प्रजा और देश दोनों का भला होगा। कैसे ऐसे हुआ कि भारत के तमाम प्रधानमंत्रियों ने भारत को चीन पर आर्थिक तौर आश्रित बनने दिया और न उसे खबर व न प्रजा को। सोचें, भारत ने पाकिस्तान से व्यापारिक रिश्तों पर पूरी चौकसी रखी, उन्हें इतना नहीं बढ़ने दिया कि जब पंगा हो तो सवाल उठे कि धंधे का तब क्या होगा? ऐसी कोई सावधानी चीन के साथ भारत के प्रधानमंत्रियों ने नहीं रखी! आज भारत इस कदर चीन पर निर्भर है कि अंबानी, अदानी के भी हाथ पांव फूले हुए होंगे तो गरीब व्यक्ति भी यह फिक्र करता मिल रहा है कि उसे सस्ता फोन तब कहां से मिलेगा।

क्या यह चीन की भारत पर आर्थिक जीत नहीं है? हमें सुध नहीं कि इसी के चलते बीजिंग के नेता निश्चिंत हैं। भारत की रत्ती भर परवाह नहीं। वे मानते हैं कि न भारत लड़ सकता है और न उससे आर्थिक नाता तोड़ सकता है। चीन हमारे लिए वह देश हो गया है, जिससे हममें न एक्शन है और न रिएक्शन! जबकि हमारे पास सब है। 138 करोड़ लोग हैं। उपमहाद्वीप आकार है। विशाल सेना है। परमाणु प्रक्षेपास्त्र हैं। लेकिन दोनों ही दुश्मन नहीं डरते हैं।

सोचें जम्मू-कश्मीर में 370 खत्म हो चुका है। मगर ग्राउंड रिपोर्ट क्या है?इस साल के पहले छह महीनों में भारत की सेना ने 127 आंतकवादी मारे हैं। मतलब पिछले साल की तुलना में 30 प्रतिशत ज्यादा आंतकी मुठभेड़ें हुईं। ऐसे ही 2019 के मुकाबले 2020 में भारत-पाकिस्तान की 742 किलोमीटर लंबी नियंत्रण रेखा पर गोलीबारी-उल्लंघन की घटनाएं और बढ़ी हैं। पाकिस्तान की हरकतें जस की तस तनाव बढ़ाने वाली हैं तो वह चीन की बढ़ी गतिविधियों के साथ भी साझा दिखा रहा है। हालांकि इस्लामाबाद ने भारतीय एजेंसी की उस खबर को गलत बताया है कि पूर्वी लद्दाख क्षेत्र की नियंत्रण रेखा पर उसने बीस हजार सैनिक तैनात किए हैं। बावजूद इसके हर सामरिक जानकार इस हकीकत को समझे हुए होगा कि दोनों दुश्मन साझा तौर पर फिलहाल सैनिक सहमति में कैसा-क्या काम कर रहे होंगे।

इस सबसे घबराने की जरूरत नहीं है। जब दोनों दुश्मन हैं और उनमें साझा है तो हम भी निहत्थे नहीं हैं। हम परमाणु ताकत लिए हुए हैं। तभी यह नहीं होना चाहिए कि कोई घर में घुस आए तो उससे मकान खाली कराते-कराते हम खुद मकान खाली कर बैठें। मतलब वह घर, वह इलाका जो विरासत से हमें प्राप्त है उसे कूटनीति से जस्टिफाई करते हुए खाली नहीं किया जाना चाहिए। भारत को लड़ना होगा और दो टूक अंदाज में लड़ना होगा फिर भले नतीजा कुछ भी हो।

भारत के चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल बिपिन रावत ने 2018में कहा था कि भारत दोनों सीमाओं पर एकसाथ लड़ने में समर्थ है। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोवाल, सीडीएस जनरल बिपिन रावत ने पिछले चार वर्षों में दस तरह से भारत की जनता और दुनिया को विश्वास दिलाया है कि दोनों दुश्मनों को भारत की एक इंच जमीन नहीं लेने देंगे। भारत में ताकत है, साहस है, छप्पन इंची छाती वाला प्रधानमंत्री है तो दुनिया का भी साथ है। सबसे बड़ी बात पाकिस्तान की क्या औकात, चीन की क्या हिम्मत जो ऐसे वक्त में भारत से पंगा ले जब दुनिया में दोनों की थू-थू है।

इसलिए वक्त का तकाजा है जो हम चीन को आंखे दिखाएं। चीन पर दो टूक दबाव बनाएं। सीमा पर सीमित लड़ाई लड़ कर भारत को बताना होगा कि चीन गांठ बांधें कि वह आगे डोकलाम, गलवान जैसी हरकतें नहीं करेगा। उससे सारा व्यापार तब तक स्थगित रहेगा जब तक वह सीमा विवाद को स्थायी तौर पर सुलझाता नहीं। लद्दाख और अरुणाचल जैसे दावे हमेशा के लिए खत्म नहीं करता। भारत की सीमा उसकी सर्वभूमि गोपाल की नहीं है। इसलिए यह कूटनीति भारत को मंजूर नहीं कि घर, इलाका छोड़ने के लिए वह कहे और भारत उसके कहने पर पीछे हटे। भारतीय सेना को इलाके विशेष में लड़ कर कब्जाई जमीन खाली करानी होगी। हम बात करके चीन को पीछे हटने को मजबूर करें, यह एप्रोच गलवान में अब इसलिए बेतुकी है क्योंकि चीन कब्जा करके बैठ गया है जबकि भारत के सैनिक पीछे हटे हैं। वह हमें कुछ दे और हम उसे कुछ दें यह इसलिए संभव नहीं है कि जमीन के मामले में चीन कतई भारत को एक इंच जमीन नहीं देगा। उसकी पूरी रणनीति भारत से भारत का इलाका छुड़वाने की है।

हां, भारत की कूटनीतिक सफलता तभी बनेगी जब भारत के सैनिक पुरानी जगह वापिस लौटें और चीन के सैनिक पुरानी पोजिशन तक पीछे हटें। यों इस एप्रोच का समय भी निकला मानना चाहिए। अब गलवान घाटी के अलावा चीन दूसरे इलाकों में भी सेना की दबिश बना रहा है। जाहिर है चीन के दिमाग से यह बात निकालनी होगी कि वह सीमा पर कुछ भी करेगा तो भारत बरदाश्त करता जाएगा।

तभी चीन से सीमित लड़ाई जरूरी है। इसके बिना बात नहीं बनेगी। इसके खतरे, जोखिम में जो चिंता है उस पर विचार कर चुका हूं। मामला तर्क, यथार्थ से नहीं, बल्कि भूत के मनोवैज्ञानिक डर व 1962 की हार से उबरने का भारत को प्रमाण देने का है। भारत को बताना है कि वह शी जिनफिंग को झूला सकता है तो डंडा भी मार सकता है। उससे धंधा खत्म करके दुश्मन देश से आर्थिक आजादी भी पा सकता है।

5 thoughts on “चीन को दिखलानी होगी ताकत!

  1. मैं लेखक के विचार से सहमत हूं कि चीन को हमारी जगह से कब्जा छोड़ने के लिए बाध्य किया जाए भले ही इसमें हमारी शिव शक्ति का उपयोग करना पड़े इस मामले में हमें किसी भी तरह का समझौता या किसी भी तरह की ढिलाई या किसी भी तरह का हल्का ना दिखाएं देश की सीमाएं हमारे घर जैसे घर जैसी है यदि कोई दुश्मन कुत्ता है येन केन प्रकारेण उसे बाहर निकालते खींचने में हमें कोई भी संकोच नहीं करना चाहिए जय हिंद

    1. आज अगर हिंदुस्तान चीन पर हमला कर दे तो जीत हिंदुस्तान की होगी। हमारे सैनिक हर हालात में चीनी सैनिकों से ताकतवर हैं।

  2. Mai bhi lekhak ki vichar se sahmat huchin ko to aukat to batana hi hoga ki uski asali jagah kaha hai is per pradhn mantri ji ko aapsi sahamati se vichar Kiya jay

  3. बिलकुल! मै भी लेखक के विचारों से पूरी तरह से सहमत हूँ। चीन एक ऐसा छली-कपटी देश है जोकि धोखे से आपकी जमीन पर कब्जा करेगा और फिर बातचीत कर-करके आपको थका देगा जिससे कि आप तात्कालिक स्थिति पर समझौता कर ले और अपना इलाका गँवा दे।अतः भारत को परमाणु युद्ध होने के खतरे से न घबराकर, नयी टैक्नोलॉजी के हथियार जल्दी से खरीदकर और मौका देखकर चीन पर हमला करना ही होगा तथा साथ ही विगत में अपना गंवाया हुआ हिस्सा अक्साई चिन भी वापस लेना होगा! तभी चीन आगे से ऐसी विस्तारवादी हरकतें करना बन्द करेगा अन्यथा आगे चलकर एक दिन भारत के पूरे पहाड़ी इलाकों को हडप कर जायेगा!

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