क्या सचमुच तनाव घटा है?

पहले भारतीय मीडिया में यह खबर आई और फिर भारत के विदेश मंत्रालय ने यह कहा। उसके एक दिन बाद चीनी विदेश मंत्रालय ने उसे दोहराया कि वास्तविक नियंत्रण रेखा पर तनाव घटाने और मसले का शांतिपूर्ण हल निकालने पर भारत और चीन सहमत हो गए हैं। ये सहमति मंगलवार को लेफ्टिनेंट जनरल अधिकारी के स्तर पर हुई वार्ता के दौरान बनी। लेकिन साथ ही यह भी कहा गया है कि मसला हल होने में समय लगेगा।

उसके पहले अधिकारी स्तर की कई वार्ताएं होंगी। लेकिन अगर भारतीय नजरिए से देखें, तो यह बात समस्याग्रस्त है। सीधी बात यह है कि चीन की फौज हमारे इलाके में घुसी है। वह 5 मई के पहले की जगह पर लौट जाए तो मिनटों या घंटों में समस्या का समाधान निकल सकता है। लेकिन चीन इसके लिए राजी नहीं है। बल्कि कुछ भारतीय रक्षा विशेषज्ञों ने अपने सूत्रों के हवाले से कहा है कि चीन ने अपना रुख सख्त कर लिया है।

वह न सिर्फ गाललान वैली, बल्कि पैंगोंग त्सो और नाकु ला पर भी अपनी घुसपैठ की जगह तक को चीन का होने का दावा कर रहा है। ये बात तो पहले ही साफ हो चुकी है कि इस बार की घुसपैठ वास्तविक नियंत्रण रेखा की समझ का फेर होने का मामला नहीं है। बल्कि इसके बीच चीन की समन्वित रणनीति है। ऐसे में कांग्रेस नेता और पूर्व विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद का ये सवाल प्रासंगिक है कि आखिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सीधे चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग को फोन कर इस मसले पर बात क्यों नहीं करते? दोनों नेता इसके पहले वुहान और मल्लपुरम में अनौपचारिक शिखर सम्मेलन करके बेहतर संबंध की इच्छा और भावना जता चुके हैं।

क्या अब उसका कोई मतलब नहीं बचा? दोनों देशों के सेनाओं के पीछे लौटने खबरों के बीच यह गौरतलब है कि पैंगोंग झील पर- जहां दोनों सेनाओं के बीच सबसे बड़ा गतिरोध बना हुआ है- वहां अभी भी स्थिति में कोई सकारात्मक बदलाव नहीं आया है। मीडिया में आई खबरों के मुताबिक दोनों तरफ इस बात की सहमति बनी है कि कम से कम पांच स्थानों पर दोनों सेनाओं के बीच तनातनी हुई है और इनमें से पैंगोंग के “फिंगर्स” इलाकों को छोड़कर बाकी सभी स्थानों पर सेनाएं पीछे हट जाएं। लेकिन सबसे ज्यादा घुसपैठ पैंगोग झील के इलाके में हुई है। जब तक वहां प्रगति नहीं होती तनाव घटने की तमाम बातें बेमतलब होंगी।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Shares