India gdp growth rate सुधार के लिए अभी इंतजार करना होगा
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सुधार के लिए अभी इंतजार करना होगा!

Nirmala sitaraman

India gdp growth rate अर्थव्यवस्था के जिस आंकड़े का बेसब्री से इंतजार हो रहा था वह जारी हो गया है। भारत सरकार के कार्यक्रम क्रियान्वयन और सांख्यिकी मंत्रालय ने चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही यानी अप्रैल-जून 2021 के आंकड़े जारी कर दिए हैं। इस तिमाही में सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी की दर 20.1 फीसदी रही है। विकास की यह दर अनुमानित थी। भारतीय रिजर्व बैंक का अनुमान था कि विकास दर 21 फीसदी से थोड़ा ऊपर रहेगी लेकिन अंतरराष्ट्रीय न्यूज एजेंसी रायटर्स ने कोई एक सौ अर्थशास्त्रियों के अनुमानों के आधार पर जीडीपी की दर 20 फीसदी के आसपास रहने का अनुमान जताया था। जाहिर है कि सारे अर्थशास्त्री और एजेंसियां जो अनुमान जता रही थीं उसी के आसपास वास्तविक आंकड़ा रहा है।

पहली नजर में 20.1 फीसदी की विकास दर का आंकड़ा बहुत बड़ा लगेगा लेकिन सबको पता है कि यह लो बेस इफेक्ट है। पिछले साल इसी तिमाही में विकास दर माइनस 24.4 फीसदी रही थी। तभी इस लो बेस इफेक्ट की वजह से 20.1 फीसदी विकास दर को वी शेप रिकवरी नहीं कह सकते हैं। वी शेप रिकवरी तब मानते जब जीडीपी की दर महामारी शुरू होने से ठीक पहले वाली स्थिति में पहुंच गई होती। हालांकि भारत में अर्थव्यवस्था में गिरावट का दौर 2018 की पहली तिमाही से ही शुरू हो गई थी फिर भी अगर 2019-20 की पहली तिमाही के बराबर भारत की जीडीपी होती तो माना जाता कि यह वी शेप रिकवरी है।

हकीकत यह है कि अप्रैल-जून 2021 का कुल सकल घरेलू उत्पाद 2019-20 की पहली तिमाही यानी अप्रैल-जून 2019 के आसपास भी नहीं है। उस समय कुल सकल घरेलू उत्पाद 35 लाख 66 हजार 708 करोड़ रुपए का था, जबकि अभी यह 32 लाख 38 हजार करोड़ है। यह आंकड़ा 2017-18 की पहली तिमाही के आंकड़े के करीब है। इस लिहाज से कह सकते हैं कि चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में देश का कुल उत्पादन उतना ही है, जितना चार साल पहले था। सोचें, इन चार वर्षों में देश की आबादी बढ़ती गई और उत्पादन रूका रहा!

चालू वित्त वर्ष के पहले तीन महीने के आंकड़े के आधार पर डंका बजाया जा रहा है कि अर्थव्यवस्था में चमत्कारिक सुधार हो गया। लेकिन हकीकत यह है कि 2019-20 के मुकाबले यह नौ फीसदी कम है और असल में 2017-18 के आंकड़ों के बराबर है। अगर जीडीपी में विकास की यही रफ्तार जारी रहती है तो उम्मीद की जा सकती है कि यह अगली तिमाही में यानी जुलाई-सितंबर में 2019-20 के बराबर पहुंचेगी। आर्थिकी के जानकार उम्मीद कर रहे हैं कि मार्च 2022 तक देश की अर्थव्यवस्था महामारी से पहले वाली स्थिति में पहुंचेगी। असली चुनौती उसके बाद शुरू होगी। क्योंकि भारत में महामारी ने तो अर्थव्यवस्था को ठप्प किया था लेकिन इसकी रफ्तार नोटबंदी के असर में 2018 से ही धीमी पड़ने लगी थी। सो, अगर अगले साल मार्च में भारत की जीडीपी की विकास दर 2019-20 के चार फीसदी विकास दर तक पहुंच भी जाती है तो उससे देश के 140 करोड़ लोगों का भला नहीं होना है।

GDP

ऐसा इसलिए है कि ताजा आंकड़ों को बारीकी से देखने पर एकाध सेक्टर को छोड़ कर कहीं भी उम्मीद नहीं बंधती है। आंकड़े आने के बाद से इस बात का हल्ला मचाया जा रहा है कि भारत का निर्यात बढ़ा है लेकिन यह तस्वीर का सिर्फ एक पहलू है। निर्यात बढ़ा जरूर है लेकिन उसी अनुपात में आयात भी बढ़ गया है, जिसका नतीजा यह है कि भारत का व्यापार घाटा लगभग तीन गुना बढ़ गया है। अप्रैल-जून 2020 में भारत का व्यापार घाटा 9.12 अरब डॉलर था, जो अप्रैल जून 2021 में बढ़ कर 30.75 अरब डॉलर हो गया। सो, निर्यात के आंकड़े जरूर सकारात्मक हैं, लेकिन अकेले इससे कुछ नहीं होगा। इसके अलावा दो और सेक्टर हैं, जिनमें सुधार दिखा है। कृषि और बिजली ये दो ऐसे सेक्टर हैं, जिनमें भारत की स्थिति बेहतर हुई है। कृषि और बिजली का उत्पादन 2019-20 के स्तर तक पहुंच गया है। लेकिन इनके अलावा बाकी सारे सेक्टर 2017-18 की स्थिति में अटके हैं। ताजा आंकड़ों के मुताबिक व्यापार, होटल, परिवहन, संचार आदि सेक्टर की स्थिति बहुत बुरी है। निर्माण और विनिर्माण दोनों सेक्टर के विकास की गति बहुत धीमी है। ध्यान रहे कंस्ट्रक्शन और मैन्यूफैक्चरिंग ये दो ऐसे सेक्टर हैं, जिसमें कुशल और अकुशल दोनों तरह की सर्वाधिक नौकरियां पैदा होती हैं। लेकिन इन दोनों की हालत नहीं सुधरी है। यही कारण है कि विकास दर तेज होने के बावजूद बेरोजगारी की दर ऊंची बनी हुई है।

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असलियत यह है कि अर्थव्यवस्था के तिमाही आंकड़ों से कई चीजों का पता नहीं चल पाता है। अनौपचारिक सेक्टर की विकास दर और वहां की स्थिति का अंदाजा नहीं होता है तो साथ ही लघु व मझोले उद्यमों की विकास की स्थिति का भी पता नहीं चलता है। ध्यान रहे इस सेक्टर में सबसे ज्यादा रोजगार की संभावना होती है और भारत सरकार ने कोरोना के बीच में आर्थिक पैकेज के नाम पर जो कुछ भी दिया है उसका बड़ा हिस्सा एमएसएमई सेक्टर को गया है। इसलिए वास्तविक तस्वीर का अंदाजा पूरे साल का आंकड़ा आने के बाद ही चलेगा, खास कर रोजगार के संबंध में। लेकिन उससे पहले पहली तिमाही के आंकड़ों के आधार पर बहुत उछलने की जरूरत नहीं है। इसका कारण यह है कि देश में आम लोगों के उपभोग में बढ़ोतरी नहीं हुई है। घरेलू मांग एकदम निचले स्तर पर है। ध्यान रहे आम लोगों के उपभोग का जीडीपी में 56 फीसदी के करीब हिस्सा होता है और इसमें तेजी नहीं लौटी है। इसके बगैर अर्थव्यवस्था में बड़े सुधार की उम्मीद नहीं की जा सकती है।

कोरोना वायरस की दूसरी लहर के जारी रहने और तीसरी लहर की आशंका के बीच देश में निजी निवेश के क्षेत्र में भी सुधार होने की कोई गुंजाइश नहीं दिख रही है। हालांकि सरकार निजी निवेश को प्रोत्साहित करने के लिए कर छूट दे रही है और मौजूदा कंपनियों को कुछ अतिरिक्त प्रोत्साहन भी दे रही है। लेकिन वह भी तभी कारगर है, जब निजी उपभोग में बढ़ोतरी हो। जहां तक सरकारी खर्च की बात है तो उसकी भी क्षमता सीमित है क्योंकि सरकार की राजस्व वसूली उम्मीदों के मुताबिक नहीं है। भारत में वैक्सीनेशन अभियान ने रफ्तार पकड़ ली है इसके बावजूद वायरस की तीसरी लहर की अनिश्चितता कायम है। इसी वजह से निवेश और खर्च दोनों बहुत सोच समझ कर किए जा रहे हैं। ऐसे में बहुत जल्दी बड़े सुधार की उम्मीद नहीं की जा सकती है।

इसके बावजूद सांख्यिकी मंत्रालय के ताजा आंकड़ों को अगर सिर्फ संख्या के आधार पर नहीं देखें तो उम्मीद की हलकी सी किरण दिखाई देती है। ध्यान रहे जीडीपी के 20.1 फीसदी की दर से बढ़ने का आंकड़ा अप्रैल-जून 2021 का है, जब देश में कोरोना वायरस की दूसरी लहर चल रही थी और स्थानीय स्तर पर देश के लगभग हर राज्य में पाबंदियां लगी हुई थीं। इन पाबंदियों के बावजूद जीडीपी की 20 फीसदी से ऊपर की विकास दर मामूली नहीं मानी जाएगी। पिछले साल अप्रैल-जून में कोरोना वायरस की पहली लहर में पूरे देश में पाबंदी लगी थी। दोनों का फर्क यह है कि उस समय प्रधानमंत्री ने राष्ट्रीय स्तर पर पाबंदी की घोषणा की थी और उसकी बंदिशें ज्यादा सख्त थीं। उसके उलट दूसरी लहर में राज्यों ने अपने अपने स्तर पर पाबंदियां लगाई थीं, जिनकी बंदिशें उतनी सख्त नहीं थीं। इसी वजह से पहली लहर के लॉकडाउन के मुकाबले दूसरी लहर के लॉकडाउन का अर्थव्यवस्था पर सीमित असर हुआ। दूसरी लहर की पाबंदियों से अर्थव्यवस्था को कम नुकसान हुआ। इसलिए यह उम्मीद की जा सकती है कि पाबंदियां हटने या कम होने के बाद जुलाई-सितंबर की तिमाही में विकास दर और बेहतर होगी।

By अजीत द्विवेदी

पत्रकारिता का 25 साल का सफर सिर्फ पढ़ने और लिखने में गुजरा। खबर के हर माध्यम का अनुभव। ‘जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से शुरू करके श्री हरिशंकर व्यास के संसर्ग में उनके हर प्रयोग का साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और अब ‘नया इंडिया’ के साथ। बीच में थोड़े समय ‘दैनिक भास्कर’ में सहायक संपादक और हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ शुरू करने वाली टीम में सहभागी।

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