हमें पता नहीं हम क्या! - Naya India
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हमें पता नहीं हम क्या!

आज से मैं आपको बोर करूंगा। हो सकता है मुझे आप पढ़ना छोड़ दें। क्योंकि आपकी-मेरी, आम हिंदू की यह जानने में दिलचस्पी ही नहीं है कि हम हैं क्या? बावजूद इसके मैं अनचाहे सवा सौ करोड़ लोगों के उस अनंत में खो रहा हूं, जिसकी बुनावट का न ओर है न छोर है और न समझने-जानने का कौतुक है और न ही अध्ययन की कोशिश है। क्या आपने कभी किसी यूरोपीय गोरे, किसी सऊदी मुसलमान, किसी चाईनीज हान के साथ या विदेशी के साथ अपने को खड़ा पा कर सोचा है कि ये कैसे हैं और मैं कैसा हूं? यों अपने असंख्य नागरिक अपने आपको ओलंपिक स्टेडियम में अलग-अलग सभ्यताओं के चेहरों के बीच ख़ड़े पाते हैं। विदेश में घूमते हुए चीनी, अमेरिकी, जापानी, यहूदी या अरब शेख, अफ्रीकी के बीच भारतीय खड़े मिलते हैं। उस वक्त हम लोग जैसे भी, जिस भी भाव से अपना व्यवहार बनाएं लेकिन जिज्ञासावश यह ख्याल कतई नहीं सताता कि ये कैसे हैं और हम क्या हैं जो ओलंपिक मेडलों की सूची में हम कहीं नहीं होते। ये ऐसे जीवन जीते हैं तो हम ऐसे, भला क्यों? जाहिर है सामान्य जिज्ञासा भी नहीं तो कौन इतनी दूर की सोचेगा कि यदि डार्विन के विकासवाद के सिद्धांत में चिंपांजी के वंशज होमो सेंपिंयस की बुद्धि जागृति से हम सनातनी लोग बतौर मानव बनने शुरू हुए तो विकास का अपना क्रम, अवस्थाएं, अनुभव और अनुभवों से गुंथा डीएनए अपना कैसा है और उनका कैसा है?

हां, जान लें कि सवा सौ करोड़ की मूल बुनावट (मतलब शरीर, मन, चित्त और आत्मा) और भावनाओं का रसायन एक सा है। खाप, कबीलाई, राज, राजा के समाज, राज्य और राष्ट्र सबकी हमारी सरंचना में सहस्त्राब्दियों से पके भाव, मनोभाव का रसायन एक सा है। यहां बात जाग्रत इतिहास याकि ईसा पूर्व और ईसा बाद की है। होमो सेपियंस-आदि मानव से सनातनी हिंदू बनने और उसके धर्मशास्त्र की व्यवस्थाओं में खाप, कबीले, राज, राजा, राष्ट्र के समाजशास्त्र-राजनीतिशास्त्र के तमाम अनुभवों का रसायन सवा सौ करोड़ लोगों (समग्रता में पूरा दक्षिण एशिया) के दिल-दिमाग की शिराओं को एक सा बनाए हुए है। मोटे अंदाज में समझें कि अमेरिका, यूरोप, चीन में हमारे किसी भी चेहरे को देख वहां के लोगों में हमारे लिए एक सा नाम, एक सा भाव उभरता है और हमारी नस्ल अलग वर्गीकृत होती है क्योंकि हम सब एक से हैं। इसे इस तरह भी समझें कि हम भले नेहरू और मोदी में फर्क बूझें लेकिन वाशिंगटन, लंदन, बीजिंग में इन दो प्रतिनिधि चेहरों के फर्क में भारत नजरिया बदला हुआ नहीं होता है। उनके लिए जैसे नेहरूजी हैं वैसे मोदीजी हैं। जैसे बिड़लाजी हैं वैसे अंबानीजी हैं। उनकी असल कसौटी भारत, हिंदू की बुनावट है।

क्यों? क्योंकि दुनिया की बाकि सभ्यताओं ने, नस्लों ने हम लोगों को जाना हुआ है? हमें पता नहीं है कि उन्होंने हमें जाना हुआ है क्योंकि हमने अपने आपको नहीं जाना हुआ है! वे जानते हैं कि हम क्या हैं लेकिन हम नहीं जानते हैं कि हम क्या हैं और वे क्या हैं! मेरा मानना है कि यहीं हमारा मूल व कोर सकंट है। हम सनातनी जरूर हैं लेकिन हमारी जागृति, हमारा जीना आज में होता है। हममें वह दृष्टि, वह गहराई, वह जज्बा नहीं है, जो हम आज में इतिहास का अनुभव, सबक याद रखें या वर्तमान की हकीकत पर भविष्य बूझें। यह बात हम सब पर लागू होती है। इसलिए हर वक्त निजी तौर पर या सामूहिक तौर पर व्यक्ति का, समाज का, राष्ट्र-राज्य का एक सा रवैया, एक सी जुमलेबाजी, चुनौतियों को एक ही अंदाज में हैंडल करने का तौर-तरीका सदा-सदा एक सा होता हैं।

कई सुधीजन कहेंगे यह गलत बात। नेहरू अलग थे। उनके वक्त जन मनोभाव अलग था तो नरेंद्र मोदी अलग हैं और लोग याकि हिंदुओं का मनोभाव भी अलग है। हकीकत में ऐसा कोई फर्क नहीं है। आप नहीं मानते तो जरा नेहरू के वक्त को पढ़ें। गौर करें इस बात पर कि हाल में मोदी ने संयुक्त राष्ट्र में दुनिया से क्या कहा? उन्होंने कहा भारत ने युद्ध नहीं बुद्ध दिया। क्या यहीं अंदाज पंडित नेहरू का नहीं हुआ करता था? मोदी दुनिया घूमते हुए अपने को विश्व नेता मान रहे हैं, सवा सौ करोड़ लोग इसी बात पर उनके दिवाने हैं। पर यहीं स्थिति तो पंडित नेहरू की भी थी। वे अंतरराष्ट्रीय राजनीति में निर्गुट आंदोलन की नेतागिरी के साथ विदेश घूमने, विदेशी नेताओं के साथ फोटो शूट में उतने ही व्यस्त हुआ करते थे, जितने आज मोदी हैं। नेहरू ने भी चाऊ एन लाई का भारत में स्वागत कर हिंदी-चीनी का भाईचारा वैसा ही दिखलाया था, जैसे अभी महाबलीपुरम में मोदी ने शी के साथ दिखाया है। और इस बात की गहराई समझें कि नेहरू और मोदी का रूख, व्यवहार, मनोभाव यदि समान है तो चाऊ एन लाई और शी का भी चीनी सभ्यता की तासीर में एक जैसा गुंथा हुआ है। नेहरू भी भारत के लोगों के लिए माईबाप सरकार का एवरेस्ट उठाए हुए थे तो मोदी भी उठाए हुए हैं। फालतू है यह फर्क करना कि हिंदू तब नेहरू के उतने दिवाने नहीं थे, जितने आज मोदी के हैं। तब भी यह दिवानगी थी कि नेहरू हैं तो सपने हैं, दुनिया में डुगडुगी है वैसे ही जैसे आज मोदी हैं तो विश्व में नाम है!

मतलब स्थायी चीज है विशिष्ट हिंदू भाव, बुनावट। मन, चित्त और आत्मा का व्यवहार। उसका डीएनए। हम हैं कुछ ऐसे, जिसके चलते हमारा व्यवहार कालनिरपेक्ष एक सा अंदाज, एक सी रीति-नीति, एक सा मनोविश्व, एक सा चेतन और अवचेतन लिए हुए होता है।

सो, मसला हमारी, सनातनी हिंदू रचना का है। मसला ऐंथ्रोपोलॉजी याकि मानव शास्त्र का है। यह वह शास्त्र है, जिसे मैंने नहीं पढ़ा है और सवा सौ करोड़ लोगों के बीच शायद लाख भारतीय भी इस विषय से परिचित नहीं होंगे। कहने को भारत की शिक्षा में यह विषय है। भारत सरकार ने भी इस विषय के तहत एक मानव विज्ञान सर्वेक्षण संस्थान बनाया हुआ है और प्रहलाद पटेल उसके प्रभारी मंत्री हैं लेकिन मैं जब इसकी वेबसाइट पर गया तो मालूम हुआ कि मैं अब तक का 551 वां विजिटर हूं।

यह बानगी है कि हम सनातनियों को बोध नहीं है कि हमारा बनना, मतलब दक्षिण एशिया के होमो सेपियंस याकि आदि मानव का दिमाग चैतन्य अवस्था में जब आया और फिर जीवन जीते हुए उसने क्रमशः अपने को जैसे बनाया, अपना विकास किया, घर-परिवार, खाप, कबीले, समाज, धर्म, व्यवस्था, संस्कृति, सभ्यता, राज्य और फिर राष्ट्र के जो उसके कदम बने, जो क्रमिक विकास हुआ तो वह किस अवस्था से, कैसे-कैसे अनुभवों से होते हुए था? मतलब अपने-आपको जानने की, खोजने की जो ऐंथ्रोपोलॉजी है, जो मानवशास्त्र है उसे ही हमने अपनी जिज्ञासा में जगह नहीं दिए हुए है तभी यह बेसुधी है और यह नहीं समझ पाना है कि हम कैसे हैं? (जारी)

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