दुनिया का पालना और…

हम लोगों ने अपने को कैसे जाना हुआ है? जवाब है मानविकी, सोशल विज्ञान की विभिन्न विधाओं-तरीकों और विज्ञान की खुर्दबीनों, आधुनिक औजारों, आईनों व दूसरों से तुलना करके हमने अपने को नहीं जाना हुआ है! हमारा जानना मिथक, पुराण या फिर जिनके गुलाम थे उनकी व्याख्या से, जीवन जीने के अंदाज और खामोख्याली व जुगाड़ से है! तभी दुनिया जैसे हमको समझती है हम उन्हें वैसे नहीं समझ पाते और हमें दुनिया जैसे जानती है उसका हमें बोध नहीं है। हमने दूसरों को विधर्मी माना तो उन्होंने हमको सांप-सपेरों वाला, अंधविश्वासी और कमतर आंका! हमारा मनोविश्व, बुनावट, चेतन-अवचेतन रामलीला, कृष्णलीला व रामायाण-महाभारत से है। मेरा-आपका बचपन राम, कृष्ण, रामायण-महाभारत और व्रत-उपवास, तीज-त्योहार की कथाओं के पालने में लोरियों, लीलाओं व झांकियोंसे बना हुआ है। एक था राजा, एक थी रानी। एक थी अयोध्या, एक थी लंका। अयोध्या के राजा सत्यवादी थे तो लंका का राजा रावण अंहकार,असत्य का राक्षस! युद्ध हुआ तो राम जीते व रावण हारा। अच्छाई की जीत बुराई की हार। राजा रामअयोध्या लौटे व दीपोत्सव हुआ। उसकी जगमग ही हमारा उत्सवऔर वहीं रामराज्य का अजर-अमर राष्ट्र मॉडल! यही दुनिया में जीने का, अपने राज नीति का बीज मंत्र!

पर सोचें, जाग्रत इतिहास के किस काल में हमारे नसीब व अनुभव में यह बीज मंत्र प्रस्फुटित हुआ, वह अजर-अमर राष्ट्र-राज्य मॉडल मां-भारती में साकार हुआ? और तो और पालने की सुनी कथाओं में वाल्मीकि, वेदव्यास ने जीत के बाद जश्न, राजतिलक की दास्तां या महाभारत के शांतिपर्व में यह झांकी भी नहीं बताई कि रामराज्य में और युधिष्ठर के राजाधिराज होने के बाद उनके हाथों लोक कल्याण, साम्राज्य निर्माण की प्रक्रिया क्या थी, भरतवंशियों का निश्चय व रोडमैप क्या था?उलटे शंका, परीक्षा, वैराग्य व नैराश्य पढ़ने को मिलेगा। (पालने में बना यह मनोविज्ञान बहुत भारी है, जिस पर बाद में विचार करेंगे।)

सो, निःसंदेह हमारा पालनाकथा-कहानी, लीलाओं, लोरियों से भरा हुआ है। वह हमारा बालकाल है न कि इतिहास।धर्म-कर्म, संस्कार की नींव है। ‘पालना’ शब्द मैंने अमेरिकी लेखक मार्क ट्वेन के वाक्य से लिया है। उनका यह कहा सटीक है कि- भारत मानव नस्ल का पालना (India is the cradle of the human race), मानव के बोलने का जन्मस्थान, उसके इतिहास की मां, किंवदंतियों की दादी, और परपंराओं की परदादी है।

मगर मसला तो मानव शास्त्र, इतिहास का है। मानव सभ्यता और सभ्यतागत राष्ट्र-राज्य के जाग्रत इतिहास का है। मतलब मानव चेतना के शिकारी-खानाबदोश रूप से आधुनिक स्वरूप का छह-आठ हजार साला इतिहास। याकि मानव के होश संभालने, चेतन अवस्था, लड़कपन, जवानी याकि प्राचीन, मध्यकाल, आधुनिक काल के होमो सेपिंयस का लिखित-साक्ष्यपूर्ण सफरनामा।
उस सफरनामे में पालने के वेद, रामायण, महाभारत, वाणी और अक्षर ज्ञान, संस्कृत,व्याकरण, अंकगणित, शतरंज, पूजा, आरती, धर्म-कर्म, दर्शन, आध्यात्म में हमने सब बुना, सुना, गुना और जन्म-मरण-पुनर्जन्म की तमाम अवस्थाओं के दर्शन-आध्यात्म की कथाओं, लीलाओं, लोरियों को आत्मसात किया, उन्हे दुनिया को भी सुनाया मगर जब पालने से बाहर निकले, चलने का वक्त आया, अपने आपको बनाने का जाग्रत वक्त आया तो जीवन जीने की सच्चाइयों, उसके ऊबड़-खाबड़ में से गुजरे तो हम कैसे-कैसे गिरे? जीवन क्योंकर विकट यातनाओं और गुलामी में गुजरा? हमारा जीना भी क्या जीना हुआ!

मानव शास्त्र याकि एंथ्रोपोलॉजी मनुष्य विकास के सफर की सच्चाई को जांचना और इतिहास कानाम है। यह जाग्रह इतिहास कोई आठ हजार या दस हजार (इसमें छह हजार साल की काल अवधि अहम) सालों का याकि आठ-दस सहस्त्राब्दियों का मामला है। इसमें भी चार हजार सालों याकि चार सहस्त्राब्दियों का अनुभव मौजूदा वैश्विक सभ्यताओं के एंथ्रोपोलॉजिकल डीएनए (जैविक नहीं) का सत्व-तत्व है।
तभी हम क्या हैं, इसे समझना है तो चार-छह सहस्त्राब्दियों के जाग्रत इतिहास पर फोकस करना होगा। होमो सेपियंस के सफरनामे में मां भारती की कोख के छह हजार साल पुराने पालने और आगे के विकास व अनुभव को ढूंढना होगा। संदेह नहीं कि अफ्रीका से चला होमो सेपियंस महासागरीय किनारों से चलते पहले दक्षिण  भारत, वहां से उत्तर भारत की और फिर सिंधु सभ्यता घाटी  के ईर्द-गिर्द के केंद्र में जैसे ही शिकारी-खानाबदोश से  स्थायीवासी-खेतिहर हुआ और उसमें फिर ईरान के रास्ते, काकेशियन यूरोप के रास्ते होमो सेपियंस के और वंशज आ कर घुले-मिले तो वह सिंधु घाटी-हड़प्पा-मोहनजोदड़ो का अपना  पालना था। उस पालने में कथा कहानी-लीला, वाणी-भाषा, अन्नप्रास, नगर-चारदिवारी की सुरक्षा आदि सब है लेकिन अपनी त्रासदी, अपना दुर्भाग्य है जो उस वक्त के टाइमकैप्सूल, ब्लैकबॉक्स के रहस्य हम छटांग भर नहीं बूझ पाए हैं!

इस बिंदु पर भी फिर कभी विचार करेंगे। फिलहाल बिंदु मां भारती की कोख और पालने का है। अपना दो टूक मानना है कि वह पूरे उपमहाद्वीप याकि दक्षिण एशिया का दायरा लिए हुए था। फालतू बात है कि दक्षिण भारत में कुछ और था और उत्तर भारत में कुछ और। इस बहस का मतलब इसलिए नहीं है कि जब यूरोपीय सभ्यता अपने आपको मध्य एशिया-ग्रीक-रोम की कई सभ्यताओं, कई इलाकों का क्रम बना कर वक्त-काल की दसियों भिन्नताओं को समेटते हुए अपने आपको पश्चिमी सभ्यता के सुपर जुमले में कन्वर्ट किए हुए है और अपनी दादागिरी व सर्वोच्चता का गुमान बनाए हुए है तो भारत के हम लोग, हम हिंदू तो पूरे दक्षिण एशिया के जीवन जीने की उन सनातनी समानताओं, निरंतरताओं को लिए हुए हैं, जिसमें उत्तर हो या दक्षिण, पूर्व हो या पश्चिम सर्वत्र स्मृतियां पालने की हैं, बालपन की कथाओं, उसके धर्म व संस्कारों की है।

जाहिर है मार्क ट्वेन हो या डॉ. टॉयनबी या विल डुरांट, मैक्समूलर और सर विलियम जोन्स, पश्चिम के सभी विद्धानों ने भी भारत के योगदान को आध्यात्मिक, दार्शनिक, सांस्कृतिक दायरे में रख उसे अमूल्य बताया हुआ है तो वह उनके द्वारा भारत का सभ्यतागत सीमांकन भी है। यही हमारी पूंजी है तो यहीं हमारी कमी है। हमारा पालना और उससे भारत क्षेत्र विशेष की बनी सांस्कृतिक एकता, जहां दुनिया के देखने के नजरिए का एक आधार है तो दूसरा नजरिया भारत में राजनीति-आर्थिकी-विकास याकि राष्ट्र-राज्य के इतिहासजन्य वैक्यूम में यह थ्योरी बनवाए हुए है कि हम दुनिया के लिए मॉडल नहीं हैं, बल्कि दुनिया की दूसरी सभ्यता, उसके राष्ट्र-राज्य हमारे म़ॉडल हैं। रामराज्य पालने की लोरी है लेकिन वह हमारे इतिहास का अनुभव नहीं है, म़ॉडल नहीं है।

चीन के मौजूदा अंहकार का सैद्धांतिक हुंकारा मानते हुए समकालीन चाइनीज दार्शनिक जांग वी वी(Zhang Weiwei) ने द चाईना वेव (The China Wave) में यह फतवा दिया हुआ है कि भारत सभ्यतागत राष्ट्र नहीं है। (India is not a civilization state) वह तो अकेला चीन है क्योंकि वह सर्वाधिक आबादी के साथ विशिष्ट सांस्कृतिक परंपराओं वाला सहस्त्राब्दियोंपुरानाराष्ट्रइतिहास लिए हुए है। बतौर राष्ट्र चीन दुनिया का मॉडल है। मतलब चीन दुनिया का सामान्य राष्ट्र नहीं, बल्कि सभ्यतागत राष्ट्र है और ऐसा कोई दूसरा राष्ट्र नहीं है। जांग वी वी के अनुसार आबादी के नाते भारत विशाल देश जरूर है लेकिन 19वीं शताब्दी के मध्य से पहले भारत कभी एकीकृत राष्ट्र-राज्य नहीं था, जबकि चीन का पहला एकीकरण ईसा पूर्व सन 221 से है।

और ऐसा सोचना शेष विश्व का भी है। तभी सवाल है कि हड़प्पा याकि सिंधु घाटी के तीन हजार साल पुराने पालने के बावजूद हममें वह क्या कमी हुई, जिससे चीन तो अपना राष्ट्र-राज्य का सफर ईसा पूर्व सन् 221 से बना हुआ बताता है जबकि हमारे राष्ट्र अनुभव को दुनिया अंग्रेजों के वक्त से शुरू हुआ मानती है? दुनिया की निगाह में हमारा रामराज्य, हमारा मॉडल क्यों स्थापित नहीं है? (जारी)

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