जान लें, जीना नहीं हमारा जीना! - Naya India
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जान लें, जीना नहीं हमारा जीना!

बाकी सभ्यताओं और कलियुगी हिंदू सभ्यता का यह कैसा विकट अंतर है जो हम 140 करोड़ लोग और भारत देश मृत्युलोक में मर-मर के जीवन जीने का ख्याल लिए हुए हैं, जबकि अमेरिका, ब्रिटेन आदि सभ्य विकसित देश और उनके लोग पृथ्वी की कर्मलौकिकता में जीवन बनाते, जीवन भोगते हुए ब्रह्माण्ड के परलोक में अपनी कॉलोनी बसाने की जीवंतता से जी रहे हैं। वे महामारी काल में भी अपने लोगों को अंतरिक्ष की यात्रा कराने स्पेस यान की टेस्टिंग करवाते हुए हैं।

कलियुगी भारत-13: कोरोना मंदिर, मोदी मंदिर!

भारत कलियुगी-14: इक्कीसवीं सदी का सत्य है मनुष्य की देवलोक जैसी उपलब्धियां। इस बात को हम हिंदू न मान सकते हैं और न समझ सकते हैं। तब भी कल्पना करें कि इक्कीसवीं सदी में पश्चिम के लोग क्या कुछ करते हुए हैं? जवाब है मंगल पर बस्ती बसाने, लोगों को अंतरिक्ष में घूमाने, कृत्रिम मेधा या एआई से मनुष्य जीवन स्वचालित बनाने और रोबो बना कर मनुष्य को श्रम से पूरी तरह मुक्त बना देने के प्रोजेक्ट हैं। ये ऐसे प्रकल्प हैं कि परलोक में यदि कहीं ईश्वर है तो वह मानव प्रतिभा-विकास से जलन करेगा। जानने वाली बात है कि सभ्य-विकसित देशों में मनुष्य देवलोक की कल्पनाओं को साकार बनाता हुआ है। वह इतना फ्री, आजाद, साधन-सुविधा और लग्जरी लिए हुए है कि उसके आगे इंद्रलोक का वैभव भी कुछ नहीं! हम-आपको अंदाज नहीं है कि अमेरिका, यूरोप, स्कैडिनेवियाई देश, न्यूजीलैंड, जापान जैसे विकसित देशों ने महामारी के मौजूदा वक्त में अपने नागरिकों को घर बैठा कर कितना पैसा बांटा। इन देशों के मौजूदा नैरेटिव पर गौर करें तो लोग वहां गर्मियों में घुमक्कड़ी को ले कर दबाव बना रहे हैं कि तालाबंदी जल्दी खत्म हो ताकि पब खुलें, बीयर पीयें, समुद्र किनारे जा कर छुट्टियां मनाएं। किताबें पढ़ें, हॉल में सिनेमा-नाटक देखें, संगीत सुने, सेक्स-मौजमस्ती करें, पर्यटन करें! सो, पैसा है, बेफिक्री है। उन्हें लॉकडाउन के बाद कमाना नहीं है, बल्कि गर्मियों के वक्त को जीवन की जिंदादिली में जीना है।

कलियुगी भारत-12: ठहरा वक्त, रिपीट इतिहास!

यह मानवता के इतिहास की अद्भुत नई बात है। कैसे? इसलिए कि स्पेनिश फ्लू, कोलेरा जैसी पुरानी महामारियों से पश्चिमी सभ्यता को उबरने में सालों लगे थे। इलाज-वैक्सीन का विज्ञान सालों की रिसर्च के बाद बना। उस नाते आधुनिक ज्ञान-विज्ञान का बेजोड़ कमाल है जो ब्रिटेन-अमेरिका-यूरोप के वैज्ञानिकों ने न केवल साल भर में वैक्सीन बना दी, बल्कि लोगों में, आर्थिकी में दौड़ने का, जिंदगी के मजे लेने का विश्वास भी फटाफट पैदा है। लॉन टेनिस, ओलंपिक, रूग्बी, फुटबाल का जज्बा ही नहीं, बल्कि अंतरिक्ष की उड़ान और महामारी के अनुभवों को ध्यान में रख कर वापिस पहले की तरह लग्जरी सैर-सपाटा शुरू हो चुका है।

कलियुगी भारत-11: बड़े दिमाग की छोटी खोपड़ी!

इस सबका क्या अर्थ है? पहला तो यह कि जिन लोगों ने जीवन और जीवन के आनंद का देवलोक बना लिया है उन्हें वे तमाम रास्ते-तरीके मालूम हैं, जिनसे विपरीत स्थितियों, प्राकृतिक चुनौतियों कें बावजूद जीने का वैभव बनाने, लौटाने में देरी नहीं लगती। पृथ्वी पर कुछ सभ्यताएं-नस्लें ऐसी हैं, जो महायुद्ध के विध्वंस, महामारी-आपदा-विपदा के बावजूद तुरत-फुरत जीवन को वापिस वैभवपूर्ण बना डालती हैं और वह भी नई ऊंचाईयों के लक्ष्य के साथ।

ऐसा कैसे? वजह है लोगों की जिंदादिली, आजादी के उड़ते पंख और ज्ञान-विज्ञान-सत्य की निरंतर-चिरंतन खोज की वह आदत, वह स्वभाव, वह डीएनए जो पश्चिमी देशों के घर-घर पैठा हुआ है! लोगों की सोच, वैज्ञानिकता व बुनावट का कमाल है जो कर्मलोक का सत्य-सदाचार हर स्तर पर पसरा हुआ है।

और कलियुगी भारत व उसके 140 करोड़ लोग?

मृत्युलोक के मुर्दा जीवन को शापित। सोचें, कलियुगी हिंदू ने दिमाग-धर्म-अध्यात्म में पृथ्वी को मृत्युलोक का जो नाम दिया है वह हमारे कलियुग का क्या सच्चा प्रतिनिधि सत्य नहीं है? अन्य सभ्यताओं, खास तौर पर पश्चिमी सभ्यता ने पृथ्वी को कर्मलोक याकि भौतिक जीवन का मनुष्यगत स्वर्ग माना और बनाया तो जान लें यही उनकी और हम हिंदुओं की बुद्धि, दिल-दिमाग और चित्त के फर्क की निर्णायक-बुनियादी बात है। सोचें, हिंदू अपने धर्म, दर्शन, अध्यात्म में पृथ्वी को क्यों मृत्युलोक मानता है? तब जीवलोक, जीवनलोक कौन सा है? क्या यह अपने कलियुगी धर्म-अध्यात्म-सोच की पहचान नहीं है जो हम माने बैठे हैं कि पृथ्वी मतलब मृत्युलोक! और मृत्युलोक नरक है। इसमें जीवन का आनंद नहीं है। मजा नहीं है। सिर्फ मर-मर कर जीना है। जीवन से मुक्ति पानी है!

कलियुगी भारत-10: ‘चित्त’ से हैं 33 करोड़ देवी-देवता!

तभी गहराई से विचार करें कि बाकी सभ्यताओं और कलियुगी हिंदू सभ्यता का यह कैसा विकट अंतर है जो हम 140 करोड़ लोग और भारत देश मृत्युलोक में मर-मर के जीवन जीने का ख्याल लिए हुए हैं, जबकि अमेरिका, ब्रिटेन, यूरोप, जापान, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड आदि सभ्य विकसित देश और उनके लोग पृथ्वी की कर्मलौकिकता में जीवन बनाते, जीवन भोगते हुए ब्रह्माण्ड के परलोक में अपनी कॉलोनी बसाने की जीवंतता से जी रहे हैं। वे महामारी काल में भी अपने लोगों को अंतरिक्ष की यात्रा कराने स्पेस यान की टेस्टिंग करवाते हुए हैं। महामारी को धत्ता बता गर्मियों को समुद्र किनारे सैर-सपाटे-आराम से गुजारने का प्रोग्राम बनाए हुए हैं। वे कर्म में जुटे हैं, विज्ञान-सत्य की खोज में डटे हैं, जबकि ठीक विपरीत भारत के लोग सरकार और उसके झोलाछाप वैज्ञानिकों की मूर्खताओं व माता कोरोना देवी की पूजा, महामृत्युंजय पाठ करते हुए हैं तो दिन-प्रतिदिन ये खबरें भी हैं कि मृत्युलोक की मान्यता लिए कलियुगी भारत मौत की संख्या भी छुपाते हुए है। कलियुगी हिंदुओं से कोई पूछे कि जब हमने पृथ्वी को मृत्युलोक माना हुआ है तो नरेंद्र मोदी की हिंदू सरकार को मौत के आंकड़े छुपाने चाहिए या गर्व से कहना चाहिए कि इतने हिंदुओं को मृत्युलोक से मुक्ति मिली। क्यों नहीं यह प्रचार होना चाहिए कि मोदी सरकार नारकीय जीवन के मृत्युलोक से लोगों की आत्मा को मुक्त कराने में परम सफल! यदि गंगा-यमुना दोआब के गरीब-गुरबे महामारी में मरे लोग गंगा में बहते हुए हैं तो वह मृत्युलोकी नारकीय जीवन से मुक्ति है या नहीं!

कलियुगी भारत-9: ‘चित्त’ की मनोवैज्ञानिक ऑटोप्सी में वक्त!

मैं भटका हूं। मृत्युलोक बनाम कर्मलोक की फिलासॉफी बना बैठा हूं। पर यह पहलू, यह बिंदु महामारी के अनुभव में कलियुगी भारत बनाम कर्मयोगी सभ्यताओं के फर्क को बूझने में भी सटीक है। इसी से समझ लेना चाहिए, गांठ बांध लेनी चाहिए कि कलियुगी हिंदू का भारत में जीना मृत्युलोक में मर-मर कर जीना है, जबकि बाकी सभ्यताओं का जीना जीवन जीने के उद्देश्यों, साधनों-तरीकों के ऐश्वर्य और ज्ञान-विज्ञान-बुद्धि-सत्य की ताकत का श्रीसुख है।

फिर नोट रखें कि मनुष्य और जानवर का फर्क सिर्फ बुद्धि, दिमाग की चेतनता से है। यदि दिमाग, ब्रेन से खोजे हुए सत्य में जीवन चलता हुआ नहीं है तो मनुष्य शरीर अलग-अलग तरह के पशु-पक्षियों में जीता हुआ होगा। भेड़-बकरी, भेडियों, गिद्ध-कौओं, सांप-बिच्छु, केकड़े, खरगोश, कछुआ, हाथी-शेर गधे-घोड़े का वह एक एनिमल फार्म होगा, जिस पर यह ताला पक्का कि बुद्धि और सत्य घुसें नहीं।

कलियुगी हिंदू न केवल पृथ्वी को मृत्युलोक बनाए हुए है, बल्कि एनिमल फार्म की इस बेसुधी को भी जीता हुआ है कि बाकी जीवों से भला हमारा क्या फर्क है? कर्मलोक और मृत्युलोक का क्या फर्क है? कर्मयोगी कैसे जीते हैं मृत्यु से मुक्ति के साधक कैसे जीते हैं? मतलब सवाल-जवाब-समझने का दिमाग ही नहीं!

भारत कलियुगी-8: समाज का पोस्टमार्टम जरूरी या व्यक्ति का?

तो मूल मसले पर लौटें कि कैसे जानें कि उनका जीना जीवन और जिंदादिली है और हमारा जीना मुर्दनगी में मर-मर कर जीना है।

तो गौर करें- वे लोग आजाद और उड़ते हुए हैं, जबकि हम पिंजरे में बंद व गुलामी की जंजीरों में जकड़े हुए। उनका भौतिक ऐश्वर्य कर्मलोक का स्वर्ग है और हमारा मृत्युलोक का नरक। वहां दूध-घी की नदियां हैं और हम गंदे नालों का पानी पीते हुए। वे छप्पन भोग खाते हुए हैं और हम गेंहू-दाल का बांटा खाते हुए। वहां सरस्वती का उजियारा है और अपने यहां राक्षसों के अज्ञान का अंधकार। वे लक्ष्मी की कृपा के कुबेर हैं और हम लक्ष्मी का शाप भोगते कंगले! वे निडरता-निर्भीकता-शक्ति के बर्बर शेर हैं और हम भेड़-बकरियां। वे मनुष्य जीवन के आनंद और काम के सोलह शृंगारों के रस-भाव, तमाम एंद्रियों की मौज-मस्ती को भोगते हुए हैं, जबकि हम कुंठा-दमित इच्छाओं, विकृतियों में मरा-घुटा जीवन जीते हुए। वे ओलंपिक-खेलकूद के बादशाह हैं और हम गिल्ली डंडा खेलते हुए! वे किताबे पढ़ते हैं, पत्र-पत्रिकाएं पढ़ते हैं, ज्ञान बटोरते हैं, शास्त्रीय बौद्धिकता के एवरेस्ट बनाते हैं और हम झूठ, प्रोपेगेंडा, फेक-बाजारू-व्हाट्सप पोस्ट के कीचड़ से लथपथ हैं। वे विज्ञान-सत्य के खोजी हैं, तकनीक बनाते हैं और हम जैसे-तैसे जीवन जीने का जुगाड़ करते हैं। वे पचास साल पहले चंद्रमा पर कदम रखते हैं और हम पचास साल बाद नकल में चंद्रयान खिलौना बना डींग मारते है कि देखो हमारी विश्व गुरूता। वे विजेता हैं, हम गुलाम-पिछलग्गू! वे लक्जरी-ऐश्वर्य में तरबतर और हम जैसे-तैसे जीवन जीते हुए भूखे-नंगे! वे बह्माण्ड में घूमते, मंगल पर बस्ती बनाने की महत्वाकांक्षा लिए हुए और हम कुएं में अपने अस्सी करोड़ लोगों को पांच किलो गेंहू-दाल का राशन बांटते हुए! वे मानवता, पृथ्वी को संभालते हुए और हम अपने को भी संभालने में असमर्थ!

क्या यह सब गलत है? हां, उन कलियुगी हिंदुओं के लिए गलत होगा, जिन्होंने दुनिया नहीं घूमी है, नहीं देखी है! जिनका भूतकाल और वर्तमान दोनों कलियुगी काले अंधकार में जीता हुआ है! और अंधकार भी ऐसा, जिसकी पट्टी आंखों से न कभी हटी और न हटेगी! तकनीक ने भले अंधकार में रहने वाले लोगों में आवाजाही, संचार-सूचना-जानकारी के साधन पहुंचा दिए हैं लेकिन दिमाग-बुद्धि भी तो खुली होनी चाहिए जो फर्क कर सकें कि अपना रेल और विमान का सफर भी कैटल क्लास वाला है। हाथ में भले स्मार्टफोन आया हुआ हो मगर वह भी अज्ञान, झूठ, सेक्स की कुंठाओं के स्खलन का जरिया है। हमने राजनीतिक, संवैधानिक, आजादी और आधुनिक जीवन की आवश्यकताओं के जुगाड़ सब बना लिए हैं लेकिन मृत्युलोक की देशी गुलामी-दीनता-हीनता की आत्मा से। ऐसे जुगाड़ से न कर्मलोक का स्वर्ग बनता है और न मृत्युलोक का नरक मिटता है। और तो और हम इतना भी बूझ-समझ नहीं पाते हैं कि हमारा जीना इक्कीसवी सदी में भी बहुत शर्मनाक, बहुत नारकीय है! (जारी)

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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