पुलिस से सियासी खुफियागिरी

आखिर वहीं हुआ जिसकी आशंका थी। महाराष्ट्र में चल रहे विवाद के दौरान राकांपा के नेताओं ने अपने होटल में सादे कपड़ो में पुलिस वालो को घूमते हुए पकड़ा और उन पर विधायको पर नजर रखने का आरोप लगाया व अंततः अपना होटल बदलकर अपने विधायको को हयात होटल में ठहरा दिया।

राजनीति में पुलिस का इस्तेमाल किया जाना नया नहीं है। यह तो बहुत पहले से ही होता आया है। दूर क्यों जाए खुद महाराष्ट्र में जब शरद पवार और सुशील कुमार शिंदे की निकटता की वजह यही थी। श्री शिंदे कांग्रेस की ओर से उप राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार बनाए गए थे। हालांकि वे चुनाव हार गए। खुद शिंदे ने मुझे बताया था कि वो महाराष्ट्र पुलिस की स्पेशल ब्रांच (गुप्तचर इकाई) में हुआ करते थे व उनकी जिम्मेदारी कांग्रेस पर नजर रखने की थी। वहां नजर रखते-रखते उनकी मुलाकात शरद पवार से हुई जोकि पार्टी में अपने विरोधियों के बारे में जानकारी लिया करते थे। धीरे-धीरे उनकी घनिष्ठता इतनी ज्यादा बढ़ गई वे उन्हें राजनीति में ले आए और उन्हें कांग्रेस में शामिल करवा दिया। शिंदे बताते है कि वे शरद पवार के भक्त थे और उन्हें बहुत मानते थे। एक बार उन्होंने शरद पवार से कहा कि वे तो उनके लिए विट्ठल (कृष्ण) की तरह है। हालांकि जब बाद में शिंदे ने अपना राजनीतिक पाला बदला तो एक बार शरद पवार ने उनसे पूछा कि आप तो मेरे भक्त थे और में आपके लिए विठ्ठल की तरह था बावजूद इसके आपने पाला बदल लिया।

शिंदे के मुताबिक उन्होंने जवाब दिया कि मैं तो आज भी आपके आगे हाथ जोड़कर खड़ा हुआ हूं। मगर क्या करूं विठ्ठल की मूर्ति ने ही अपनी दिशा बदल ली। दिल्ली में ज्यादातर हर राज्य की पुलिस के कुछ लोगों की नियुक्ति हुआ करती थी जोकि राज्य भवन में रहते हुए वहां ठहरने वाले नेताओं व उनकी दिनचर्या के बारे में मुख्यमंत्री तक खबर पहुंचाते हैं। इनमें हरियाणा और पंजाब काफी आगे थे।

हरियाणा में तो इस काम के लिए बाकायदा एक आला अफसर डीआईजी सीआईडी की नियुक्ति होती थी जोकि मुख्यमंत्री का काफी करीबी माना जाता था। वहां विधायको से लेकर मंत्रियों तक के बारे में मुख्यमंत्री को पल-पल की खबर भेजता रहता था।

मुख्यमंत्री रहे भजनलाल तो सोनिया गांधी के घर पर भी नजर रखवाते थे। उनके लोग यह बताते थे कि सोनिया गांधी कहां जाती है। एक बार तो हरिणयाणा सीआईडी की गाड़ी सोनिया गांधी की कार से टकरा गई थी। तब एसपीजी नहीं बनी थी। ओमप्रकाश चौटाला व केंद्र की चंद्रशेखर सरकार के पतन की वजह ही हरियाणा सीआईडी द्वारा राजीव गांधी के घर पर नजर रखना था। कांग्रेसियों ने इस संबंध में दो पुलिस वालो को पकड़ा था जोकि हरियाणा सीआईडी से थे।

जब बंसीलाल कांग्रेस में थे व उनका मन पार्टी से उचट रहा था तो एक बार उन्होंने अपना विरोध प्रदर्शन करने के लिए चंडीगढ़ में रैली करने का ऐलान किया। भजनलाल मुख्यमंत्री थे। उन्होंने हरियाणा भवन में अपने कुछ परिचित पत्रकारो की मौजूदगी में हरियाणा सीआईडी आईजी से पूछा कि कल बंसीलाल की रैली में कितने लोग आ जाएंगे। उन्होंने हिचकिचाते हुए कहा कि सर 50-60 हजार तो आ ही जाएंगे।

इस पर भजनलाल ने उनसे कहा कि किसी भी हालात में कुछ लाख से कम की भीड़ नहीं होनी चाहिए। उसकी रैली में भीड़ भिजवाओ। अगर उसकी रैली में लाखों लोग आ गए तो वह बौरा जाएगा और अपनी लोकप्रियता से पागल होकर अलग पार्टी बनाने का ऐलान कर देगा व मेरा क्लेश हमेशा के लिए कट जाएगा। भजनलाल व बंसीलाल की आपस में नहीं बनती थी। वहीं दूसरी और बंसीलाल ने रैली की सफलता से उत्साहित होकर अलग पार्टी बनाने का ऐलान कर दिया और कांग्रेस से अलग हो गए।

यहीं हालात पंजाब के थे। वहां की सीआईडी के लोगों का स्टाफ दिल्ली में तैनात रहता जोकि यहां चलने वाली राजनीतिक गतिविधियों की खबर मुख्यमंत्री को भेजा करते थे। वे तो इतने दुस्साहसी थे कि जब अकाली नेता की कनाट प्लेट के रेस्तरां में प्रेस कांफ्रेंस होती तो उससे कुछ दूरी पर अपनी सीट पर बैठकर चाय पीने का नाटक करने लगते थे। एक बार तो दिवंगत अकाली नेता रछपाल सिंह ने उनसे कहा कि आप लोग भी पत्रकारो के साथ बैठ जाइए ताकि आप सारी बाते सुन सके। वैसे भी आप लोग प्रेस कांफ्रेंस खत्म होने के बाद बाहर इन लोगों से डिटेल नोट करेंगे। आमतौर पर यही होता था। एक बार तो पुलिस वाले ने प्रेस कांफ्रेंस के बारे में पूछने के बाद अनुरोध किया कि भाई साहब चार-पांच बाते और लिखवा दीजिए। क्योंकि हमारे अफसर कहते हैं कि कम-से-कम एक पेज की रिपोर्ट तैयार करो। इस बार करीब एक पैरा कम है। अब यही सबकुछ देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में हो रहा होगा।

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