चाचा-भतीजे का नया सियासी मुहावरा

हमारे देश की राजनीति ने ही भाई-भतीजावाद, आयाराम गयाराम सरीखे बहुचर्चित मुहावरे दिए हैं। मैं सच में महाराष्ट्र सत्ता कांड का बहुत आभारी हूं। जिसने एक बहुतचर्चित व स्थापित मुहावरे भाई-भतीजावाद को पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया। ऐन मौके पर शरद पवार के सगे भतीजे और राकांपा विधायक दल के नेता रहे अजीत पवार ने जिस तरह से पाला बदल कर राज्यपाल के पास जाकर भाजपा को सरकार बनाने के लिए समर्थन देने के साथ उप-मुख्यमंत्री पद की शपथ ली वह चौकाने वाला था व शुरू से इसे शरद पवार की ही रणनीति माना जा रहा था।

मगर शरद पवार ने उन्हें इस पद से हटाकर स्पष्ट कर दिया कि भतीजा कुछ ज्यादा ही सक्रिय हो गया था। भतीजा 2010 से 2012 के बीच अशोक चव्हाण व पृथ्वीराज चव्हाण की सरकारों में उप-मुख्यमंत्री रहा। माना जाता है कि अपने खिलाफ चल रहे भ्रष्टाचार के मामले की कई जांच, प्रवर्तन निदेशालय द्वारा जांच शुरू किए जाने के कारण वह बहुत घबरा गया हैं।

मालूम हो कि भाजपा के सत्ता में आने के बाद 2014 में भ्रष्टाचार नियंत्रण ब्यूरो ने उनके खिलाफ 20,000 करोड़ रुपए के सिंचाई योजना में घोटाले व अनियमितता करने के अपराध में पहला मामला दर्ज किया था तब वे उप-मुख्यमंत्री थे। शरद पवार द्वारा अपनी बेटी सुप्रिया व दूसरे भतीजे के बेटे रोहित पवार के ज्यादा महत्व दिए जाने के कारण चाचा-भतीजे के बीच शीत युद्ध चालू हो गया और अंततः उन्होंने भ्रष्टाचार से अपनी जान बचाने के लिए शरद पवार द्वारा कांग्रेस-शिव सेना के गठबंधन के सरकार बनाने के लिए समर्थन देने के बजाय अपने आप जाकर भाजपा के सरकार बनाने के लिए समर्थन देने का ऐलान कर दिया।

अजीत अनंतराव पवार, शरद पवार के बड़े भाई अनंतराव के बेटे हैं। उन्होंने पहले जाने-माने फिल्म निर्देशक शांताराम के राजकमल स्टूडियो में काम किया। अजीत पवार के बाबा गोबिंद राव पवार बारामती कोऑपरेटिव ट्रेडिंग कंपनी में काम करते थे व उनकी दादी उनकी देखभाल करती थी। जब वे सीनियर सेकेंडरी कर रहे थे तभी अजीत पवार के पिता का निधन हो गया और वे पढ़ाई छोड़कर खेती का काम देखने लगे।

यह वह समय था जब उनके चाचा शरद पवार कांग्रेस में रहते हुए महाराष्ट्र की राजनीति में आगे बढ़ रहे थे। महाराष्ट्र में 1960 के दशक में सहकारिता आंदोलन शुरू हो गया था। चीनी मिलो पर इसका विशेष प्रभाव था। वहां एशिया की सहकारिता क्षेत्र में पहली चीनी मिल लगी। देखते-ही-देखते सहकारिता क्षेत्र की चीनी मिलो व राजनीतिको का एक दूसरे में दखल होने लगा व राजनीति सहकारिता मिलो को व मिले राजनीति को प्रभावित करने लगी। ध्यान रहे कि महाराष्ट्र देश में होने वाले कुल चीनी उत्पादन का 20 फीसदी उत्पादन होता है। देखते-ही-देखते वहां का तेजी से विकास हुआ व चीनी मिलो के बाद स्कूल कॉलेज व शिक्षा संस्थान तक चलाने लगी।

इस समय महाराष्ट्र में 173 चीनी मिले हैं। पिछले साल उनमें एक लाख टन चीनी का उत्पादन हुआ था। किसानों का 20 अरब रुपया बकाया है। अजीत पवार ने भी राजनीति में सक्रिय होने के लिए चीनी मिल को ही चुना। वे 1982 में एक सहकारी चीनी मिल के बोर्ड के अध्यक्ष चुने गए। वे इस पद पर 16 साल तक बने रहे। इस दौरान वे अपने चाचा शरद पवार के काफी करीब पहुंच गए व शरद पवार ने उन्हें बारामती लोकसभा सीट से जितवाया।

शरद पवार पीवी नरसिंहराव सरकार में रक्षा मंत्री बने तभी अजीत पवार ने यह बारामती की सीट उनके लिए खाली कर दी। फिर वे 2009 व 2014 में बारामती विधानसभा सीट से चुने गए। इसके बाद 2019 तक कभी वे तो दो बार उनके चाचा शरद पवार बारामती से लगातार जीतते रहे। उन्होंने अपने चाचा शरद पवार से ही राजनीति सीखी। कहा जाता है कि वे एक बार जुबान देने पर पीछे नहीं हटते हैं। शरद पवार का अपना कोई बेटा नहीं है और वे 78 साल के हो गए हैं।

पिछले कुछ वर्षों से उनके उत्तराधिकार को लेकर उनकी बेटी सुप्रिया सुले व अजीत पवार के बीच अनकहा संघर्ष चल रहा है। पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान शरद पवार ने ऐलान किया था कि वे मावल सीट से चुनाव लड़ेंगे। उनके लोकसभा सीट से अजीत पवार का बेटा पार्थ पवार भी चुनाव लड़ना चाहता था। इस पर अजीत ने अपने बेटे के लिए जब दबाव डाला तो शरद पवार ने उनकी बात मानते हुए यह सीट छोड़ दी और कहा कि अगली पीढ़ी को एक मौका दिया जाना चाहिए। हालांकि पार्थ उस सीट पर हार गए।

इसके बाद शरद पवार ने अपने दूसरे भाई के बेटे को ज्यादा अहमियत देनी शुरू कर दी। उन्होंने रोहित को पार्थ के मुकाबले स्थापित करना शुरू कर दिया। जब शरद पवार छगन भुजबल को पार्टी में लेकर आए तो यह बात अजीत पवार को पसंद नहीं आई। जब 2010 में आदर्श जमीन घोटाला विवाद में नाम आने के बाद अशोक चव्हाण ने इस्तीफा दिया तो अजीत पवार को लगा कि उनके चाचा कांग्रेस की तुलना में राकांपा के ज्यादा विधायक होने के कारण उन्हें नया मुख्यमंत्री बनवाएंगे।

मगर उन्हें उपमुख्यमंत्री पद से ही संतोष करना पड़ा व कांग्रेस ने पृथ्वीराज चव्हाण को मुख्यमंत्री बना दिया। जब कुछ समय पहले प्रवर्तन निदेशालय ने हाईकोर्ट के कहने पर उनके खिलाफ कार्रवाई शुरू की तो उनको लगा कि शरद पवार उन्हें बचाएंगे। पर ऐसा कुछ नहीं हुआ और उन्हें अपना बचाव खुद करना पड़ा।

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