विचारधारा की रेखा धुंधली होने के फायदे

यह कहना जोखिम भरा है कि विचारधाराओं की विभाजक रेखा मिट रही है या धुंधली हो रही है तो यह अच्छी बात है। अगर व्यावहारिक राजनीति और लोकतंत्र के भविष्य के लिहाज से देखें तो समझ में आता है कि अगर विचारधाराओं की विभाजक रेखा धुंधली हो जाए तो यह लोकतंत्र के लिए अच्छी बात है। पिछले कुछ समय से यह परिघटना भारत और दुनिया भर के देशों में देखने को मिल रही है। अलग अलग विचारधाराओं पर आधारित पार्टियां वैचारिक रूप से अपने को लचीला बना रही हैं। विचारधारा की शुद्धता पर उनका जोर कम हो रहा है। विचारधाराओं का आपस में विलय हो रहा है। हालांकि उनके बुनियादी विचार वहीं होते हैं, जिस पर उनका गठन हुआ होता है पर व्यावहारिक राजनीति के लिहाज से वे समझौते के लिए उन्मुक्त हो रहे हैं।

दुनिया के देशों से गुजर कर यह परिघटना भारत पहुंची है तभी कांग्रेस का कोई नेता यह कहने की हिम्मत कर पा रहा है कि अगर शिव सेना की ओर से प्रस्ताव आएगा तो वह सरकार बनाने के लिए उसको समर्थन देने पर विचार कर सकती है। सोचें, कांग्रेस पार्टी इस प्रस्ताव पर विचार कर सकती है कि शिव सेना को सरकार बनाने के लिए समर्थन किया जाए। पांच साल या दस साल पहले इस बारे में सोचा भी नहीं जा सकता था। दस साल पहले यह भी नहीं सोचा जा सकता था कि कांग्रेस और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी, सीपीएम मिल कर चुनाव लड़ सकते हैं।

कोई चार साल पहले कांग्रेस और सीपीएम ने मिल कर पश्चिम बंगाल का विधानसभा चुनाव लड़ा था और अब कांग्रेस धुर दक्षिणपंथी, कट्टर हिंदुवादी पार्टी को समर्थन देने पर विचार के लिए तैयार है। कह सकते हैं कि यह प्रदेश कांग्रेस के एक नेता का बयान था और वह भी काल्पनिक स्थितियों पर निर्भर था। पर यह हकीकत है कि आज देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस एक्सट्रीम लेफ्ट से लेकर एक्सट्रीम राइट तक के साथ राजनीति और सत्ता की साझीदारी के लिए तैयार है। यह राजनीति के बुनियादी रूप से बदल जाने का संकेत है। भाजपा भी इस बदलाव का कारण बनी है। पांच साल पहले भाजपा ने जम्मू कश्मीर में मुफ्ती मोहम्मद सईद और बाद में महबूबा मुफ्ती की पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी के साथ मिल कर सरकार बनाई थी। भारत में उदार और मध्यमार्गी राजनीति का प्रतिनिधित्व करने वाली कांग्रेस धुर वामपंथी और दक्षिणपंथी पार्टियों के साथ तार जोड़ रही है तो धुर दक्षिणपंथ और नस्ली भेदभाव की विचारधारा पर आधारित पार्टी भाजपा ने उस पार्टी के साथ तालमेल किया, जो उसकी विचारधारा के बिल्कुल विरोध में बनी है, विपरीत नस्ल का प्रतिनिधित्व करती है। मुख्यधारा की दोनों बड़ी पार्टियों का यह बदलाव लोकतंत्र के लिए शुभ मानना चाहिए।

असल में विचारधारा की शुद्धता का आग्रह पार्टियों को आम लोगों से दूर करता है। उससे पार्टियां लोगों को अपने अपने वोट बैंक के रूप में देखना शुरू करती हैं। समाज समग्रता के साथ उनकी नजरों के सामने नहीं होता है। कम्युनिस्ट पार्टियों के लिए अमीर और पूंजीपति लोग दुश्मन होते हैं तो दक्षिणपंथी या नस्ली भेदभाव की विचारधारा पर आधारित पार्टियों के लिए दूसरी नस्ल के लोग कमतर होते हैं और दुश्मन होते हैं। भाजपा और शिव सेना के बारे में यह आम धारणा है कि ये पार्टियां मुस्लिम विरोधी हैं। इसी तरह भाजपा का विरोध करते करते कांग्रेस इतना आगे बढ़ गई थी कि उसके हिंदू विरोधी होने की धारणा बन गई थी।

अभी कांग्रेस अपने को बदल रही है तो भाजपा भी बदल रही है। भाजपा ने घरेलू मोर्चे पर अपने को मुस्लिम महिलाओं के अधिकार का चैंपियन बनाया है तो अंतरराष्ट्रीय मंचों पर मुस्लिम देशों के नेताओं के साथ दोस्ती दिखा कर प्रधानमंत्री मोदी ने यह धारणा बनवाई है कि वे मुस्लिम विरोधी नहीं हैं। अभी यह आंकड़ों से प्रमाणित होना बाकी है पर भाजपा की ओर से पिछले कई चुनावों से दावा किया जा रहा है कि मुस्लिम महिलाएं उसे वोट कर रही हैं। अगर सचमुच ऐसा हो जाए कि मुस्लिम भाजपा को वोट करें, भाजपा हिंदुओं के एकाधिकार वाली पार्टी न रह जाए, कांग्रेस भी हिंदू वोटों की राजनीति करे, समाजवादी व वामपंथी पार्टियां कारोबारियों और पूंजीपतियों को दुश्मन न मानें और सबका साझा लक्ष्य देश का हित हो तो निश्चित रूप से दीर्घावधि में इससे लोकतंत्र को फायदा होगा। दुनिया के पैमाने पर और खास कर विकसित दुनिया में यह परिघटना पहले ही घटित हो चुकी है। वहां जो लिबरल है, वहीं लेबर है, वहीं लेफ्ट है और वहीं सोशलिस्ट भी है और वहीं कंजरवेटिव भी है। वहां विचारधारा के आधार पर पार्टियों की विभाजक रेखा बहुत महीन हो गई है। भारत में भी इसकी शुरुआत हो गई है। पर अभी यह सिर्फ सत्ता को साधने का अवसरवादी तरीका भर है। इसे वैचारिक व व्यावहारिक धरातल पर लाने की जरूरत है।

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