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बांग्लादेश को बचाए भारत

श्रीलंका और पाकिस्तान की विकट आर्थिक स्थिति पिछले कुछ माह से चल ही रही है और अब बांग्लादेश भी उसी राह पर चलने को मजबूर हो रहा है। जिस बांग्लादेश की आर्थिक प्रगति दक्षिण एशिया में सबसे तेज मानी जा रही थी, वह अब अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोश के सामने पाकिस्तान की तरह झोली फैलाने को मजबूर हो रहा है। चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने भी ढाका का खाली चक्कर लगा लिया लेकिन इस समय बांग्लादेश इतने बड़े कर्ज में डूब गया है कि 13 हजार करोड़ रु. का कर्ज चुकाने के लिए उसके पास कोई इंतजाम नहीं है।

प्रधानमंत्री शेख हसीना ने ताइवान के मसले पर चीन को मक्‍खन लगाने के लिए कह दिया कि वह ‘एक चीन नीति’ का समर्थन करता है लेकिन वांग यी ने अपनी जेब जरा भी ढीली नहीं की। अंतरराष्ट्रीय कर्ज चुकाने और विदेशी माल खरीदने के लिए हसीना सरकार ने तेल पर 50 प्रतिशत टेक्स बढ़ा दिया है। रोजमर्रा के इस्तेमाल की चीज़ों के दाम कम से कम 10 प्रतिशत बढ़ गए हैं।

लोगों की आमदनी काफी घट गई है। कोरोना की महामारी ने बांग्लादेश के विदेश व्यापार को भी धक्का पहुंचाया है। बांग्ला टका याने रुपए का दाम 20 प्रतिशत गिर गया है। इस देश में 16-17 करोड़ लोग रहते हैं लेकिन टैक्स भरनेवाले की संख्या सिर्फ 23 लाख है। इस साल तो वह और भी घटेगी। अभी तक ऐसा लग रहा था कि पूरे दक्षिण एशिया में भारत के अलावा बांग्लादेश ही आर्थिक संकट से बचा है लेकिन अब वहां भी श्रीलंका की तरह जनता ने बगावत का झंडा थाम लिया है।

ढाका के अलावा कई शहरों में हजारों लोग सड़कों पर उतर आए हैं। इसमें शक नहीं कि विरेाधी नेता इन प्रदर्शनों को खूब हवा दे रहे हैं लेकिन असलियत यह है कि श्रीलंका और पाकिस्तान की तरह बांग्ला जनता भी अपने ही दम पर अपना गुस्सा प्रकट कर रही है। बांग्लादेश की मदद के लिए उससे गाढ़ी मित्रता गांठनेवाला चीन भी दुबका हुआ है लेकिन शेख हसीना की सही सहायता इस समय भारत ही कर सकता है।

पिछले 30 साल में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से पाकिस्तान ने 12 बार, श्रीलंका ने 6 बार और बांग्लादेश ने सिर्फ 3 बार कर्ज लिया है। भारत ने इन तीन दशकों में उससे कभी भी कर्ज नहीं मांगा है। भारत के पास विदेशी मुद्रा कोश पर्याप्त मात्रा में है।

वह चाहे तो पाकिस्तान, श्रीलंका और बांग्लादेश को अराजकता से बचा सकता है। इस समय इन देशों को धार्मिक आधार पर अपने परिवार का बतानेवाले कई मुस्लिम और बौद्ध राष्ट्र भी कन्नी काट रहे हैं। ऐसी विकट स्थिति में भारत इनका त्राता सिद्ध हो जाए तो पूरे दक्षिण और मध्य एशिया के 16 राष्ट्रों को एक बृहद् परिवार में गूंथने का काम भारत कर सकता है।

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By वेद प्रताप वैदिक

हिंदी के सबसे ज्यादा पढ़े जाने वाले पत्रकार। हिंदी के लिए आंदोलन करने और अंग्रेजी के मठों और गढ़ों में उसे उसका सम्मान दिलाने, स्थापित करने वाले वाले अग्रणी पत्रकार। लेखन और अनुभव इतना व्यापक कि विचार की हिंदी पत्रकारिता के पर्याय बन गए। कन्नड़ भाषी एचडी देवगौड़ा प्रधानमंत्री बने उन्हें भी हिंदी सिखाने की जिम्मेदारी डॉक्टर वैदिक ने निभाई। डॉक्टर वैदिक ने हिंदी को साहित्य, समाज और हिंदी पट्टी की राजनीति की भाषा से निकाल कर राजनय और कूटनीति की भाषा भी बनाई। ‘नई दुनिया’ इंदौर से पत्रकारिता की शुरुआत और फिर दिल्ली में ‘नवभारत टाइम्स’ से लेकर ‘भाषा’ के संपादक तक का बेमिसाल सफर।

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