शाकाहारी पशु का मांसाहारी बनना?

इसके पहले घास फूस खाने वाले जानवरों के बहुत कम ही मांसाहारी होने की बात सुनी थी। कुछ दिन पहले टीवी पर एक वीडियो वायरल हुए जिसे पश्चिम बंगाल के चांदपुर इलाके में रहने वालों ‘लाल’ नामक बछड़े के मुरगी के चूजे खाते हुए देखा गया था। शुरु में जब उस इलाके में चूजे गायब होने लगे तो लोगों को लगा कि यहां घूमने वाले आवारा कुत्ते उनका शिकार कर रहे होंगे पर जब उस गाय के मालिक ने उसे अपनी बकरियों के बाड़े में घूसकर चूजे खाते हुए पकड़ा तो उनको यह पता चला कि वह बेजुबान निरीह चूजों को अपना शिकार बना रही थी।

वैसे कुछ प्रकार के हिरणों को भी समुद्र के किनारे मिलने वाली चिड़िया, उनके अंडों व बच्चे को खाते हुए देखा गया है। ऐसा माना जाता है कि वे यह कदम अपने शरीर में होने वाली कैल्शियम की कमी को दूर करने के लिए उठाते है। इसके पहले दसवीं कक्षा में पढ़ा था- अमेजन के घनघोर जंगलों में छाह में उगने वाले पौधे सूरज की रोशनी न मिलने के कारण अपने शरीर में नाइट्रोजन नहीं बना पाते है और उसको दूर करने के लिए अपने फूलों वे फलों पर बैठने वाले जिंदा कीड़ों को अपने रसायन में घोलकर पी जाते है। इनमें वीनस फलाई ट्रेप नामक पौधा प्रमुख है।

वैसे कई बार तालाब के गंदे पानी से प्यास बुझाते हुए जानवर गलती से मेंढक क बच्चे पानी के साथ पी जाते हैं। इनमें गाय-भैंस शामिल होती है। जब चांदपुर के गांवों के लोगों को इस घटना का पता चला तो वे उसे देखने के लिए दौड़े चले गए। वहां आसपास रहने वाले ज्यादातर लोग हिंदू थे और उन्होंने तुरंत यह ऐलान कर दिया कि लाल नामक बछड़ा पिछले जन्म में शेर था। इसीलिए वह चिकन खाता है। वैसे पश्चिम बंगाल की बात ही कुछ और है।

यह ऐसा प्रदेश है जहां नवरात्रि के दौरान देवी को मांस और शराब चढ़ायी जाती है। जबकि बाकीप्रदेशों में नवरात्रि मनाने वाले हिंदू मांस व शराब तो क्या प्याज लहसुन से लेकर गेंहू तक से परहेज करते हैं। मैं खुद भी मांसाहारी रहा हूं। मगर मंगल व गुरुवार के अलावा जिस दिन मंदिर जाता हूं। उस दिन मांस नहीं खाता। जब कुछ मुस्लिम मित्रों ने सारे दिनों को एक बताते हुए मेरा मजाक उड़ाया तो मैंने उन्हें रोजों की याद दिलाते हुए पूछा कि सारे दिन एक जैसे होने की बात तब लागू क्यों नहीं होती जब कि तुम रोजा खुलने तक पानी की एक बूंद तक नहीं पीते हो।

अध्ययनों से पता चलता है कि इस पृथ्वी पर रहने वाले इंसानों की आबादी पिछले 50 साल में दुगुनी हो गई है जबकि मांसाहार करने वाले इंसानों की संख्या तिगुनी हो गई है। मध्य वर्ग के ज्यादातर लोग मांसाहार कर रहे हैं। इनमें चीन सबसे आगे हें। वहीं योरोप व कनाडा में मांसाहार कम हुआ है। भारत में चीन की तुलना में मीट कम खाया जाता है। योरोप व अमेरिका में लोग सुअर व बीफ (गाय, भैंस) खाना ज्यादा पंसद करते है। वे चिकन, बत्तख, टर्की खाते हैं।

पर्यावरण के नुकसान पहुंचाने वाली ग्रीन हाउस गैसे पैदा करने में भी इसकी प्रमुख भूमिका रहती है। दुनिया में हम जितनी फसलें उगाते हैं उसके एक तिहाई हिस्सा पालतू पशुओं के खाने चारे के रुप में इस्तेमाल कर लिया जाता है। दुनिया में करीब 1 अरब लोगों के पशुपालन के जरिए रोजी रोटी मिल रही है।

जब कुछ साल पहले योरोप में मैडकाउ नामक बीमारी फैली तो मांसाहार करने वाले अनेक देशों ने ‘बीफ’ मांस का आयात बंद कर दिया था। तब यह खुलासा हुआ था कि अमेरिका व योरोप में ‘बीफ’ को मांस के लिए मारने के बाद उसके शरीर के वे हिस्से जो कि मानव भोजन में इस्तेमाल नहीं किए जाते हैं। उन्हें पुनः गायो के चारे में मिलाकर उन्हें खिला दिया जाता था व इस कारण इस बीमार के लक्षण दूसरी गायो में भी पहुंच गए।

भारत ने तो लंबे अरसे से अमेरिका से आने वाले डेरी उत्पादों के आयात पर प्रतिबंध लगा रखा है। हाल ही में अखबारों में छपी एक खबर ने देश में सबकी आंखे खोलकर रख दीं। खबर के मुताबिक गोवा सरकार के मंत्री माइकेल लोबो ने खुलासा किया कि उन्होंने 76 गायो के झुंड के कूड़े में होटलों द्वारा फेंके गए मांसाहार को खाते हुए पाया। उन्हें गोवा के एक पर्यटक स्थल के पास देखा गया। उन्होंने बताया कि रेस्तरां व होटलों द्वारा फेंके गए बासी चिकन व दूसरे मांसाहार को यह गाये बेहद चाव से खा रही थीं। वे कुत्तों और कौव्वों की तरह सड़ रही मछली भी खाती पायी गई।

जब भाजपा शासित गोवा की सरकार ने इन गायों को वहां एक गौशाला में भेजा तो उन्होंने गायों को सामान्यतः दिया जाने वाले चारे व घास को खाने से इंकार कर दिया। जिससे यह पता चला कि वे मांसाहारी हो गई थी व उन्हें जीवित रखने के लिए मांस खिलाना जरुरी था। अब सरकार उन्हें शाकाहारी बनाने की कोशिश कर रही है। वैज्ञानिकों का मानना है कि ये गाय कुछ विटामिनों की कमी को पूरा करने के लिए मांसाहारी बनी है। मेरा तो यही मानना है कि यह कुल मिलाकर कलयुग का उदहारण है जहां गाय नवरात्रि तक का प्रसाद न खाकर कूड़ा करकट ही नहीं मांस तक खा रही है।

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