विदेश जा कर बसने का जुनून

जब मैं इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए आम चुनावकी रिपोर्टिंग कर रहा था तब पूर्वी उत्तर प्रदेश की जनसभा में राजीव को बोलते देखकर रैली में आई एक ग्रामीण महिला को यह कहते सुना कि कैसा बेटा गोर गोर, नीक लागत है मानो अंग्रेज का बच्चा रहा सा। मतलब राजीव गांधी सुंदर, गौरे, अंग्रेज के बच्चे सरीखे लग रहे हैं।

इसे महज संयोग कहे या कुछ और जो हमारे देश में विदेशी सामान, विदेशी भाषा व विदेशी लोगों को लेकर आम जनता के मन में बहुत सम्मान रहा है। जब बांग्लादेश युद्ध हुआ और तमाम देशों से उपहार स्वरूप विस्थापित शरणार्थियो के लिए पुराने कपड़े दान में आने लगे तो तमाम महिलाओं ने इन बांग्लादेशी कपड़ो को खरीद कर उन्हें ड्राईक्लीन करवा कर अपने घर में उनकी सेल लगानी शुरू कर दी। वे यह दावा कर रही थी कि इन कपड़ो को यूरोप या अमेरिका में रहने वाले उनके रिश्तेदारो ने भेजा है।

लोग विदेशी कपड़ो के नाम पर उन्हें महंगे दामों पर खरीद ले जाते थे। कस्टम विभाग ने तो जब्त किए हुए विदेशी सामान की बिक्री के लिए अपने दफ्तरो में ही दुकाने खोल ली। जिनमें वे कैलकुलेटर से लेकर कपड़े व प्रसाधन तक का सामान बेचते थे। वैसे भी हमारे लोगों को विदेशी और विदेशियो के प्रति काफी लगाव रहा है। खासतौर पर पंजाब में रहने वालो का तो क्या कहना। इस बात में कोई संदेह नहीं कि पंजाबी लोग बेहद मेहनती व उद्यमी होते हैं औरखासतौर पर सिख कही भी मेहनत करके अपनी जेब भरपूर बना लेते हैं। आज पंजाबी अफ्रीका से लेकर कनाडा और अमेरिका तक में बसे हुए हैं। उनकी बढ़ती तादाद इस बात का प्रमाण है कि कनाडा का उपप्रधानमंत्री जगमीत सिंह बगड़ एक सिख है जिसके मां-बाप भारतीय मूल के थे व कनाडा में सिखो का क्या कहना। इन लोगों को विदेश जाकर नौकरी करना बहुत अच्छा लगता है।

हां, वहां उन्हें काफी मेहनत करनी पड़ती है और अपने गांव के घर की तुलना में बहुत कठिनाई भरे हालात में रहना पड़ता है। विदेशों के प्रति अपने लगाव के कारण वे अपने बच्चों को वहां भेजने के लिए लालयित रहते हैं। जो पढ़ लिखकर व कानूनी कार्रवाई पूरी करके वहां जाते हैं उनका तो ठीक है मगर बाहर जाने की चाहत में वहां के संपन्न परिवारो से लेकर गरीब किसान परिवार तक जमीन बेचकर या ऊंची दरो पर कर्ज लेकर एजेंटो को लाखों रुपए देकर अपने बच्चो को विदेश भेजते हैं।

कई बार तो विमान से लेकर जहाज तक में छुपकर जाने की खबरें प्रकाश में आई हैं। ये एजेंट पहले उन्हें किसी और देश जैसे माल्टा, मैक्सिको लेकर जाते हैं, वहां के रेगिस्तान या नदी को पार करा मछलियो की तरह नावो या गाडि़यो में उन्हें ठूसकर गैर कानूनी तरीके से अमेरिका, कनाडा पहुंचता हैं। यह इतना कष्टदायक होता है कि अवैध रूप से रेगिस्तान या जंगल पार करते समय प्यास व भूख के कारण इन लोगों की मौत तक हो जाती है व उनके शवो को जंगल या वीराने में ही जानवरो के खाने के लिए छोड़ दिया जाता है।

जो सीमा पार करने में सफल हो जाते हैं उन्हें भी उस देश में चोरों की तरह से रहना पड़ता है। एजेंट व अपराधी समूह उनसे वहां गैर-कानूनी रूप से काम करने की एवज में मोटी राशि वसूलते हैं। वहां उन्हें काम तो मिलता है मगर उन्हें सही मजदूरी नहीं मिलती क्योंकि उन्हें काम देने वाला भी उनकी स्थिति का फायदा उठाते हुए बहुत कम वेतन देते हैं। पकड़े जाने पर उन्हें जेल जाना पड़ता है और अंत में उन्हें जबरन स्वदेश भेज दिया जाता है।

हाल में अमेरिका में बिना कानूनी वीजा के प्रवेश करने की कोशिश में पकड़े गए 150 भारतीय लोगों की गिरफ्तारी के बाद उन्हे भारत भेजे जाने का मामला प्रकाश में आया है। इन लोगों में से कुछ ने तो एजेंटो को 25 लाख रुपए तक अदा किए थे। एक सुंदर सुरक्षित भविष्य हासिल करने की कोशिश में कुछ लोगों के अभिभावको ने तो अपनी जमीन बेचकर दलालो को पैसे दिए थे। वे वहां जाने के लिए कितने लालयित रहते हैं इसका अनुमान इस बात से ही लगाया जा सकता है कि पंजाब के भटिंडा इलाके के जबरजंग सिंह ने बताया कि वह तो चौथी बार अमेरिका से जबरन निकाला गया है।

उसने बताया कि वह 15 मई को हवाई जहाज के जरिए मास्को व पेरिस होता हुआ मैक्सिको पहुंचा था। वहां से वह पैदल कैलीफोर्निया में दाखिल हुआ व अगले दिन पुलिस ने उसे पकड़कर वापस भारत भेज दिया। उसने बताया कि उसने 24 लाख रुपए दलालो को व 40 लाख रुपए वकीलो को दिए। इसके पहले 18 अक्टूबर को इसी तरह से मैक्सिको के आव्रजन विभाग ने गैर-कानूनी रूप से अमेरिका में प्रवेश करते समय पकड़े जाने के अपराध में 300 भारतीय युवको, महिलाओं व बच्चो को भारत भेजा था।

इन लोगों ने लाखों रुपए खर्च करने के साथ-साथ मैक्सिको के जंगलो में भूखे, प्यासे रहकर सैकड़ो मील का सफर तय किया था। इन लोगों में 19 साल का पटियाला निवासी मनदीप सिंह भी था जो कि सेना में भर्ती की परीक्षा में फेल हो जाने के कारण वहां गया था। उसने दलाल को 20 लाख रुपए दिए थे। अन्य लोगों ने बताया कि गिरफ्तारी के बाद उन लोगों को जिन जेलो में रखा गया वहां के हालात बहुत खराब थे। खाना खाने को नहीं मिलता था। मांसाहारी भोजन ही दिया जाता था जिसमें गोमांस अधिक होता था। वहां दिन में एक घंटे के लिए ही पानी आता था। वे वहां जानवरो से भी बदस्तूर जिदंगी जीने के लिए बाध्य थे। वे सब कुछ लुटा कर खाली हाथ स्वदेश लौट आए जहां वे पहले से ही अच्छी जिदंगी जी रहे थे।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Shares