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अनिवार्य मतदान की तरफ बढ़ता भारत!

भारत धीरे धीरे अनिवार्य मतदान की दिशा में बढ़ रहा है। कुछ प्रयास चुनाव आयोग कर रहा है और कुछ सरकारी स्तर पर हो रहे हैं। हालांकि चुनाव आयुक्त रह चुके कई अधिकारियों ने इस विचार का विरोध किया है। उनको लगता है कि एक जीवंत लोकतंत्र के लिए अनिवार्य मतदान घातक हो सकता है क्योंकि यह लोगों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सीमित करेगा। लोकतंत्र में मतदान नहीं करना भी एक किस्म का जनादेश होता है। आखिर चुनाव आयोग ने ‘नोटा’ यानी ‘इनमें से कोई नहीं’ का विकल्प ईवीएम में जोड़ा है। अगर चुनाव लड़ रहे किसी उम्मीदवार को वोट नहीं देना मतदाता का अधिकार है तो चुनाव प्रक्रिया में हिस्सा नहीं लेना भी उसी तरह से उसका अधिकार होना चाहिए। उसे सिर्फ उम्मीदवार को खारिज करने का मौका क्यों मिले, उसे मतदान प्रक्रिया में हिस्सा नहीं लेकर पूरी सरकार और व्यवस्था के विरोध का भी अधिकार मिलना चाहिए। यह एक सैद्धांतिक स्थित है लेकिन व्यावहारिक रूप से भी भारत जैसे भौगोलिक विशालता और विविधता वाले देश में इस तरह का कानून व्यावहारिक नहीं है।

इस हकीकत को जानने के बावजूद अनिवार्य मतदान की व्यवस्था लाने के प्रयास होते रहते हैं। चुनाव आयोग की ओर से हाल के दिनों में कुछ ऐसी पहल हुई है, जिससे यह संकेत मिलता है कि प्रत्यक्ष रूप से कानून बना कर मतदान अनिवार्य करने की बजाय पिछले दरवाजे से इसे लागू करने के प्रयास हो रहे हैं। यह संयोग नहीं है कि इसकी शुरुआत भी गुजरात में हुई है, जहां स्थानीय निकाय चुनावों में अनिवार्य मतदान का कानून पास हुआ है और जहां मुख्यमंत्री रहते नरेंद्र मोदी ने दो बार अनिवार्य मतदान का विधेयक विधानसभा से पास कराया था। मुख्यमंत्री के तौर पर मोदी के दोनों प्रयास विफल हो गए थे क्योंकि तब की राज्यपाल कमला बेनीवाल ने अनिवार्य मतदान के विधेयकों को नागरिकों की आजादी और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का विरोधी बता कर और संविधान के अनुच्छेद 19 का हवाला देते हुए वापस कर दिया था। बाद में जब केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार बनी और भाजपा नेता ओपी कोहली गुजरात के राज्यपाल बने तब स्थानीय निकायों में अनिवार्य मतदान के विधेयक को उन्होंने मंजूरी दे दी।

बहरहाल, नई पहल भी गुजरात से हुई है। राज्य में अगले कुछ दिन में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले चुनाव आयोग ने गुजरात की एक हजार से ज्यादा कंपनियों के साथ एक समझौता ज्ञापन यानी एमओयू पर दस्तखत किए हैं। कंपनियों ने चुनाव आयोग से करार किया है कि वे अपने यहां काम करने वाले सभी कर्मचारियों को मतदान के लिए कहेंगी और जो कर्मचारी मतदान नहीं करेगा, उसका नाम कंपनी की वेबसाइट पर प्रकाशित किया जाएगा और ऑफिस के अंदर नोटिस बोर्ड पर लगाया जाएगा। इसका मकसद मतदान नहीं करने वाले कर्मचारियों को शर्मिंदा करना है। राज्य के मुख्य चुनाव अधिकारी पी भारती का कहना है कि चुनाव आयोग मतदाताओं की भागीदारी पर नजर रख रहा है। मतदाताओं की भागीदारी पर नजर रखना एक बात है और भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए नाम लेकर उसे शर्मिंदा करने का प्रस्ताव बिल्कुल दूसरी चीज है। यह एक नागरिक की निजता और स्वाभिमान के प्रतिकूल है, जिसे तत्काल वापस लेना चाहिए। इतना ही नहीं चुनाव आयोग ने यह योजना भी बनाई है कि जो भी व्यक्ति मतदान नहीं करेगा उसको आयोग की ओर से टेलीफोन किया जाएगा। उसमें क्या कहा जाएगा, यह नहीं बताया गया है लेकिन निश्चित रूप से कारण पूछा जाएगा। यह भी संवैधानिक प्रावधानों के अनुकूल नहीं होगा।

अनिवार्य मतदान की दिशा में भारत के बढ़ने का एक संकेत जून में चुनाव आयोग की ओर से की गई पहल से भी मिलता है। चुनाव आयोग ने इस साल जून में केंद्र सरकार और राज्य सरकार के सभी विभागों और सार्वजनिक उपक्रमों को एक चिट्ठी लिखी, जिसमें उनसे कहा गया कि जिन विभागों में काम करने वाले कर्मचारियों की संख्या पांच सौ या उससे ज्यादा है वे अपने यहां एक नोडल अधिकारी नियुक्त करें, जो इस बात का पता लगाएगा कि मतदान के दिन कौन कमर्चारी उपलब्ध होने के बावजूद वोट डालने नहीं गया यानी मतदान नहीं किया। उसके बाद उस व्यक्ति के साथ क्या करना है यह आयोग ने नहीं बताया है लेकिन जाहिर है, जब प्रयास करके या जांच करके पता लगाया जाएगा कि किसने जान-बूझकर मतदान नहीं किया है तो उसके खिलाफ किसी न किसी तरह की कार्रवाई होगी। उसे सजा भले न दी जाए लेकिन शर्मिंदा करना भी एक तरह की सजा ही है।

संसद में भी इसी साल अनिवार्य मतदान को लेकर चर्चा हुई है, जिसमें हिस्सा लेने वाले भाजपा के सभी सांसदों ने इस विचार का समर्थन कया। भाजपा सांसद जनार्दन सिंह सिगरीवाल के अनिवार्य मतदान विधेयक 2019 पर इस साल बजट सत्र में चर्चा हुई। हालांकि भाजपा सांसदों के समर्थन के बावजूद सरकार ने इसका समर्थन नहीं किया। इसके बाद फिर मॉनसून सत्र में भाजपा के एक दूसरे सांसद दीपक प्रकाश ने अनिवार्य मतदान का निजी विधेयक पेश किया। ऐसा लग रहा है कि गुजरात में पास हुए कानून से प्रभावित होकर भाजपा के सांसद अनिवार्य मतदान के विधेयक पेश कर रहे हैं। सिगरीवाल के विधेयक पर संसद पर चर्चा के दौरान कई सांसदों ने मतदाता पहचान पत्र को आधार से जोड़ने की बात कही, जिस दिशा में चुनाव आयोग पहले ही कदम बढ़ा चुका है। मतदाता पहचान पत्र को आधार से जोड़ना अनिवार्य नहीं है लेकिन ऐसे प्रावधान किए गए हैं कि वह एक तरह से अनिवार्य हो गया है। जो भी मतदाता अपना आधार वोटर आईडी के साथ लिंक नहीं कराएगा उसे इसका वाजिब कारण बताना होगा। उसके बताए कारण से आयोग का संतुष्ट होना जरूरी है। सवाल है कि सैद्धांतिक विरोध को छोड़ कर कोई भी व्यक्ति इसका क्या वाजिब कारण बता सकता है? और जाहिर है कि सैद्धांतिक विरोध का कोई भी तर्क आयोग को संतुष्ट नहीं कर पाएगा!

बहरहाल, अच्छा यह होता कि चुनाव आयोग अनिवार्य मतदान के प्रावधान करने या मतदाताओं को वोट डालने के लिए बाध्य करने के उपायों की बजाय उसी रास्ते पर चलता, जिस पर अभी चल रहा है। आयोग अभी मतदान का प्रतिशत बढ़ाने के लिए कई उपाय करता है। जागरूकता अभियान चलाए जाते हैं। मतदाता दिवस के मौके पर 25 जनवरी को शिविर लगते हैं और मतदान केंद्रों पर पहचान पत्र बांटे जाते हैं। आयोग लोकप्रिय व्यक्तियों को एंबेसेडर बना कर उनके जरिए लोगों को प्रेरित करता है। इस तरह के उपायों से राष्ट्रीय चुनावों में मतदान का प्रतिशत 67 तक पहुंच गया है। कई राज्यों में मतदान का प्रतिशत 80 फीसदी से ऊपर पहुंच गया है। ऐसे ही उपायों से मतदान का प्रतिशत और बढ़ाया जा सकता है। सरकार और चुनाव आयोग दोनों को यह ध्यान रखना चाहिए कि ज्यादा से ज्यादा लोगों का मतदान करना ही लोकतंत्र के सुरक्षित होने की गारंटी नहीं है। इसके लिए और भी उपाय करने की जरूरत है।

इसके लिए जरूरी है कि आपराधिक लोगों को चुनाव लड़ने से रोका जाए, चुनाव में होने वाला बेहिसाब खर्च कम किया जाए ताकि गरीब लोग भी चुनाव लड़ सकें, चुनाव स्वतंत्र व निष्पक्ष हो, जिससे लोगों का इस प्रक्रिया में भरोसा बढ़े और सबसे ऊपर चुनी हुई सरकारें संविधान के हिसाब से काम करें ताकि लोगों के लोकतांत्रिक अधिकार सुरक्षित रहें तो अपने आप लोकतंत्र मजबूत होगा। दुनिया के कोई तीन दर्जन देशों में अनिवार्य मतदान का कानून लागू है, लेकिन वो ज्यादातर छोटे देश हैं और उनकी आबादी कम है। भारत के 140 करोड़ लोगों की आबादी में 90 करोड़ से ज्यादा मतदाता हैं। अगर 30 फीसदी लोग भी मतदान नहीं करते हैं तो क्या सरकार 27 करोड़ लोगों को सजा दे सकती है? इससे कैसी अराजकता फैलेगी, इसका सिर्फ अंदाजा लगाया जा सकता है।

By अजीत द्विवेदी

पत्रकारिता का 25 साल का सफर सिर्फ पढ़ने और लिखने में गुजरा। खबर के हर माध्यम का अनुभव। ‘जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से शुरू करके श्री हरिशंकर व्यास के संसर्ग में उनके हर प्रयोग का साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और अब ‘नया इंडिया’ के साथ। बीच में थोड़े समय ‘दैनिक भास्कर’ में सहायक संपादक और हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ शुरू करने वाली टीम में सहभागी।

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