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खुशफहमी के आंकड़े

GDP

चूंकि उपभोग और विकास के मामले में देश में खाई चौड़ी होती जा रही है, इसलिए इस विभाजन रेखा के एक तरफ मौजूद लोगों को मुमकिन है कि सीएसओ के अनुमान से खुशी महसूस हो। लेकिन दूसरी तरफ के लोगों के लिए ये बात अपने गले उतारना उतना आसान नहीं होगा। indian economy estimated grow

केंद्रीय सांख्यिकी संगठन (सीएसओ) ने सत्ता पक्ष और उसके पक्षधर मीडिया को खुशफहमी पालने और फैलाने का एक आंकड़ा दिया है। आंकड़ा यह है कि चालू वित्त वर्ष में भारतीय अर्थव्यवस्था 9.2 फीसदी की रफ्तार से बढ़ेगी। यह दुनिया की सबसे ऊंची आर्थिक वृद्धि दर है। अगर यह मान भी लें कि कोरोना वायरस के ओमिक्रोन वैरिएंट की वजह से आई महामारी की तीसरी लहर से कोई फर्क नहीं पड़ेगा और अर्थव्यवस्था साल की पहली छमाही की औसत वृद्धि दर से आगे बढ़ेगी, तब भी जो हेडलाइन है, वह कहीं से भी संतोष की बात नहीं है। बल्कि यह चिंता की बात है। हकीकत यह है कि 2020-21 में अर्थव्यवस्था 7.3 प्रतिशत सिकुड़ी थी। इसे ध्यान में रखते हुए अर्थव्यवस्था के कुल मूल्य पर गौर करें, तो जब महामारी शुरू हुई थी, उसके बाद मार्च 2022 तक अर्थव्यवस्था के सकल मूल्य में महज 1.26 फीसदी का इजाफा होगा। यानी दो वर्षों में असल वृद्धि दर औसतन एक फीसदी से भी कम रहेगी? क्या यह संतोष का विषय है? लेकिन इससे भी अधिक चिंता का पहलू निजी उपभोग का इस वित्त वर्ष में अत्यंत न्यून बने रहना है। गौर करेः 2019-20 में कुल निजी उपभोग 83.22 लाख करोड़ का हुआ था। मार्च 2022 के अंत में इसके 80.80 लाख करोड़ रुपये रहने का अनुमान लगाया गया है।

क्या निजी उपभोग बढ़ने के बिना कोई अर्थव्यवस्था विकसित हो सकती है और अगर ऐसा हुआ, तो उसका क्या स्वरूप होगा? स्पष्टतः उसका स्वरूप गैर-बराबरी बढ़ाने वाला होगा। मसलन, एक मीडिया रिपोर्ट में बताया गया है कि महामारी शुरू होने के बाद से भारतीय बाजार में दो ट्रेंड देखने को मिला है। एक ओर सामान्य उपभोग में भारी गिरावट आई है, जबकि दूसरी ओर विलासिता की चीजों की बिक्री में काफी इजाफा हुआ है। शेयर बाजार और आम बाजारों की हालत पर गौर करें, तो ये बात बिना आंकड़ों के पेचीदगी में गए वैसे भी जाहिर हो जाती है। चूंकि उपभोग और विकास के मामले में देश में खाई चौड़ी होती जा रही है, इसलिए इस विभाजन रेखा के एक तरफ मौजूद लोगों को मुमकिन है कि सीएसओ के अनुमान से खुशी महसूस हो। लेकिन दूसरी तरफ के लोगों को ये बात गले उतारनी मुश्किल होगी। बहरहाल, यह भी लाख टके का सवाल है कि क्या अभी लगाए गए अनुमान असल में ठोस रूप लेंगे?

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