शर्मिंदा तो मीडिया को होना चाहिए!

केंद्र सरकार के बनाए तीन कृषि कानूनों के विरोध में आंदोलन कर रहे किसान संगठनों के नेता शर्मिंदा हो रहे हैं। वे गणतंत्र दिवस ट्रैक्टर परेड को लेकर न्यूज चैनलों की ओर से बनाए गए छद्म और समानांतर विमर्श के कारण शर्मिंदा हैं, जबकि शर्मिंदा मीडिया को होना चाहिए, जिसने सरकार के प्रति अपनी निष्ठा साबित करने के लिए एक ऐतिहासिक आंदोलन को आपराधिक गतिविधि में बदल दिया! असल में ट्रैक्टर परेड शुरू होते ही न्यूज चैनलों ने किसानों को उपद्रवी, दंगाई, हिंसक भीड़, खालिस्तानी आदि कहना शुरू कर दिया था। उनकी रैली को किसी ने ‘किसानों का कोहराम’ कहा तो किसी ने ‘आंदोलन या अराजकता’ का नाम दिया। चैनलों पर झूठी-सच्ची कहानियों और चुनिंदा वीडियो फुटेज के आधार पर घंटों तक किसानों की रैली का सिर्फ एक पक्ष दिखाया गया। जबकि एक-दो जगहों को छोड़ कर हर जगह किसानों ने शांतिपूर्ण ढंग से रैली निकाली और कई जगह दिल्ली के लोगों ने फूल बरसा कर उनका स्वागत किया। लेकिन इसकी बजाय न्यूज चैनल मुकरबा चौक, लाल किला और आईटीओ की फुटेज लेकर दिन भर यह दिखाते रहे कि किसान लड़ाई कर रहे हैं। इसमें भी इस बात का खास ध्यान रखा गया कि जहां पुलिस वाले किसानों की पिटाई कर रहे हैं वह फुटेज नहीं दिखाई जाए। न्यूज चैनलों के स्पष्ट पूर्वाग्रह के बावजूद हैरानी की बात है कि किसान आंदोलन के नेता और उनके प्रति हमदर्दी रखने वाले लोग शर्मिंदा होने लगे!

क्या वे न्यूज चैनलों से यह उम्मीद कर रहे थे कि वे उनके आंदोलन को ऐतिहासिक बताएंगे और वस्तुनिष्ठ तरीके से उसकी कवरेज करेंगे? दो महीने से ज्यादा समय से दिल्ली की कड़ाके की ठंड में शांतिपूर्ण आंदोलन कर रहे किसानों को न्यूज चैनलों ने पहले दिन से खालिस्तानी और चीन-पाकिस्तान समर्थक बता कर झूठा प्रचार किया हुआ है। इसलिए उनसे यह कतई उम्मीद नहीं की जा सकती थी कि वे किसानों के प्रति हमदर्दी का भाव दिखाएंगे या तटस्थ भाव से उनकी ट्रैक्टर रैली को कवर करेंगे। तभी टेलीविजन के बनाए छद्म, एकतरफा और झूठे विमर्श की वजह से किसान नेताओं का शर्मिंदा होना समझ से परे है। कोई 30 साल पहले भाजपा के तमाम दिग्गज नेताओं की मौजूदगी में एक भीड़ ने अयोध्या में विवादित ढांचा गिरा दिया था। क्या भाजपा का कोई नेता उसे लेकर आज तक शर्मिंदा हुआ? उलटे भाजपा के एक वरिष्ठ नेता और भारत सरकार के एक बड़े मंत्री ने पिछले ही हफ्ते कहा कि दिसंबर 1992 में एक ऐतिहासिक गलती को सुधार दिया गया था। यानी भाजपा को उस पर गर्व है। पर यहां किसान नेता शर्मिंदा हैं क्योंकि न्यूज चैनल वाले उनको शर्मिंदा होने के लिए कह रहे हैं!

कायदे से न्यूज चैनलों में बैठे एंकर और उनके विशेषज्ञों को शर्मिंदा होना चाहिए, जिन्होंने एक लोकतांत्रिक आंदोलन को बदनाम किया, जिन्होंने अपने निजी स्वार्थ में झूठी खबरें प्रचारित कीं, जिन्होंने आंदोलन कर रहे किसानों का राक्षसीकरण करने की सतत मुहिम चलाई और अपने अज्ञान में या जान बूझकर की गई साजिश के तहत ऐसी बातों को हवा दी, जो हर आंदोलन में आम होती हैं। न्यूज चैनलों की यह पक्षधरता इतनी स्पष्ट है कि हर आदमी उसे साफ देख सकता है। ज्यादा समय नहीं बीता जब दिल्ली में निर्भया कांड के बाद जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी के छात्रों ने आंदोलन शुरू किया था और जल्दी ही पूरी दिल्ली उसमें शामिल हो गई थी। तब आंदोलनकारी राष्ट्रपति भवन के दरवाजे तक पहुंच गए थे और राष्ट्रपति भवन का लोहे का विशाल गेट उखाड़ने की कोशिश की थी। हजारों की संख्या में आंदोलनकारी तब कई दिन तक इंडिया गेट घेर कर बैठे रहे थे और तब के गृह मंत्री ने आंदोलनकारियों को माओवादी बता दिया था तो सारे न्यूज चैनल उनके पीछे पड़ गए थे। तब हर चैनल ने उस आंदोलन को आम लोगों का महान आंदोलन बताते हुए उसका समर्थन किया था, यहां तक कि राष्ट्रपति भवन की गेट गिराने की कोशिश का भी!

उसके थोड़े ही दिन पहले अन्ना हजारे ने दिल्ली में भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन किया था और भारतीय मीडिया ने खुल कर उस आंदोलन का समर्थन किया था। अन्ना और निर्भया के समय हुए आंदोलन की कवरेज की तुलना अभी चल रहे किसान आंदोलन या उन्नाव-हाथरस बलात्कार कांड की कवरेज से करें तो 2011-12 और 2020-21 की मीडिया का फर्क दिखाई देता है। जो मीडिया आठ-दस साल पहले जनहित में सरकार को कठघरे में खड़ा करने के लिए व्याकुल रहता था वही आज जनहित को ताक पर रख कर सरकार के समर्थन का ऐसा नंगा नाच कर रहा है, जिसकी मिसाल मुश्किल है।

न्यूज चैनलों ने किस तरह झूठा विमर्श खड़ा किया, इसे दो घटनाओं की कवरेज से समझा जा सकता है। पहली घटना सिंघु बॉर्डर से निकली ट्रैक्टर रैली की कवरेज की है। किसान नेताओं ने कहा कि पुलिस ने जिस रूट से रैली निकालने की इजाजत दी थी उस रूट पर भी बैरिकेड लगा दिए थे। चैनलों ने यह बात बताने की बजाय यह दिखाना शुरू किया कि किसान बैरिकेड हटा रहे हैं और पुलिस के साथ उनकी झड़प हो रही है। इसके बाद काफी देर तक सिर्फ यही दिखाया जाता रहा, जब तक कि लाल किले पर निशान साहिब और किसान यूनियन का झंडा फहराने की फुटेज नहीं आ गई। लाल किले पर झंडा फहराने की फुटेज आई तो देश के सबसे बड़े मीडिया समूह के चैनल ‘टाइम्स नाऊ’ के स्टार एंकर राहुल शिवशंकर ने बताया कि किसानों ने तिरंगा झंडा उतार कर उसकी जगह खालिस्तानी झंडा फहरा दिया है। वैसे चैनल में बैठे सारे एंकर ही किसानों से नाराज थे, पर शिवशंकर कुछ ज्यादा ही नाराज हो गए। उन्होंने इस बात की पुष्टि करने की जरूत नहीं समझी कि सचमुच किसी ने तिरंगा उतार कर झंडा फहराया है या खाली पड़ी पोल पर अपना झंडा बांध दिया है। दूसरे, उनको खुद यह जानकारी नहीं थी कि लाल किले पर 15 अगस्त को छोड़ कर हमेशा एक ही झंडा लहराता है और मंगलवार को किसी किसान ने उस झंडे को हाथ नहीं लगाया था। उलटे किसानों ने उस झंडे को सलामी दी थी और राष्ट्र गान भी गाया था। लेकिन राहुल शिवशंकर चीख-चीख कर किसानों को कोसते रहे कि उनकी हिम्मत कैसे हुई तिरंगे को हाथ लगाने की!

इसके बाद ही यह विमर्श बना कि किसानों ने लाल किले पर निशान साहिब और किसान यूनियन का झंडा फहरा कर अक्षम्य अपराध किया है। हालांकि ऐसा है नहीं। क्योंकि भारत सरकार को खुद ही लाल किले के सम्मान की कोई खास चिंता नहीं है और उसने इसे रख-रखाव के नाम पर डालमिया समूह को सौंपा हुआ है। अब जबरदस्ती सबको इसके सम्मान की चिंता हो रही है। यह वैसा ही है जैसे आप अपने घर के बुजुर्ग को पेट भरने के लिए मंदिर की सीढ़ियों पर बैठा दें और उसके बाद उनके सम्मान की चिंता करें! न्यूज चैनलों ने दिन में 12 बजे से लेकर एक बजे तक यानी एक घंटे की फुटेज लेकर देर रात तक शो बनाए और किसान आंदोलन के बारे में एक अधूरी और गलत धारणा बनाने में लोगों की मदद की।

सारे चैनल सिर्फ यह दिखाते रहे कि ट्रैक्टर परेड और कुछ नहीं ‘गुंडागर्दी’ है, ‘उपद्रव’ है, ‘अराजकता’ है और एक तरह का ‘आंतकवाद’ है। चैनलों ने इस ट्रैक्टर परेड को ‘दिल्ली हिंसा’ का नाम दे दिया। अखबारों में यह खबर आई कि गणतंत्र दिवस की परेड में शामिल होने आए संस्कृतिकर्मियों को पुलिस ने निकाला। यह खबर ऐसे दी गई है, जैसे किसानों ने उनको घेर लिया था और उन्हें नुकसान पहुंचाने वाले थे, तब तक पुलिस ने बचा लिया। हकीकत में इस बार गणतंत्र दिवस की परेड लाल किले तक आई भी नहीं थी। इस बार परेड का रास्ता बदल कर उसे नेशनल स्टेडियम भेजा गया था, जहां कोई आंदोलन नहीं हो रहा था।

इसी तरह ट्रैक्टर परेड के दौरान हुई कथित हिंसा की सारी खबरें एकपक्षीय थीं। वस्तुनिष्ठ तरीके से खबर बताएं तो कहा जाएगा कि पुलिस और आंदोलनकारियों के बीच झड़प हुई। लेकिन अफसोस की बात है कि न्यूज चैनल इस झड़प में पुलिस का पक्ष लेते हुए बता रहे थे कि किसान ‘दंगाई’ हैं और ‘उपद्रव’ कर रहे हैं, जबकि पुलिस बेचारी है, जो थोड़ा ‘बलप्रयोग’ कर रही है। एक सौ पुलिसकर्मी घायल हुए यह खबर हर जगह है, लेकिन कितने सौ किसान घायल हुए इसका पता लगाना किसी ने जरूरी नहीं समझा क्योंकि किसान अपनी चोट, अपना घाव लेकर घर चले गए और पुलिसकर्मी अस्पताल में भरती हो गए। क्या इस तरह से खबर दिखाई जाती है? क्या न्यूज चैनलों के रिपोर्टर्स और एंकर्स ने इससे पहले कभी आंदोलन नहीं देखा? क्या पुराने आंदोलनों की तरह किसानों ने कहीं तोड़-फोड़ की? किसी की दुकान लूटी? राह चलते लोगों पर हमले किए? लाल किले को कोई नुकसान पहुंचाया? कहीं महिलाओं से छेड़छाड़ की खबर आई? किसी की निजी संपत्ति पर हमला हुआ? किसानों ने सिर्फ उन बसों को नुकसान पहुंचाया, जो उनका रास्ता रोकने के लिए खड़ी की गई थीं और उन्हीं बैरिकेड्स को हटाए, जिनके पास पुलिस ने बड़ी बड़ी कीलें लगा कर पटरे बिछा रखे थे। किसानों ने तलवारें ले रखी थीं और पुलिस पर हमला किया यह सबने दिखाया पर पुलिस ने आंसू गैस के गोले छोड़े, पानी की बौछार की और लाठी चलाई यह खबर सबने गायब कर दी। ऐसा करके न्यूज चैनलों ने अपनी ही बची-खुची प्रतिष्ठा गंवाई है। अपने अज्ञान, अपने स्वार्थ और सरकार के प्रति अपनी निष्ठा साबित करने के चक्कर में चैनलों ने भारतीय लोकतंत्र की एक ऐतिहासिक घटना को एक बड़ी आपराधिक वारदात में बदल दिया।

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