मोदीजी, ईश्वर के लिए सिख भावना से न खेलो, कृषि कानून खत्म करो!

मोदीजी, मुझे पता है आप किसी की नहीं सुनते मगर जरा याद करें इमरजेंसी के उस वक्त को जब आपने सरदार की वेशभूषा धारण कर अपने आपको भूमिगत रखा था। तब क्यों आपको सरदार रूप जंचा था? क्या इसलिए नहीं कि सिख याकि सरदार मतलब वीरता, सेवा और निर्भीकता का प्रतिरूप! ऐसा ही कोई भाव था, जिससे जवानी में आपने सिख रूप में संघर्ष की सोची! यदि मेरे ऐसे सोचने में तनिक भी सत्यता है तो फिर 26 जनवरी 2021 की तारीख का अर्थ बूझें और तुरंत उन कृषि कानूनों को खत्म करें, जिससे सिखों के घर-घर में, बच्चे-बच्चे में सिख-हिंदू अलगाव के बीज छितर रहे हैं। हां, मैं जानता हूं आपके लिए उत्तरोत्तर सत्ता वृद्धि सर्वोपरि है और देश-समाज में विभाजकता, फूट करो-राज करो राजनीतिक सफलता का बीज मंत्र है! बावजूद इसके आप जिस हिंदू धर्म, जिस आरएसएस के ध्वज को प्रणाम करते हैं और उसकी कसम खाते रहे हैं, उसके केसरिया-भगवा, हिंदू रंग का इतना तो ख्याल करें कि उन सिखों में वह अलगाव न बनवाएं जो खुद केसरिया निशान साहिब से खालसा शौर्य का जोश पाते हैं। आप और आपके अमित शाह से ले कर अजित डोवाल जैसे सलाहकारों को यह ध्यान रहे कि सिख गुरूओं ने केसरिया रंग को यदि शौर्य, बहादुरी, उद्यम का प्रेरणा स्त्रोत बनाया था तो वजह हिंदू सत्व-तत्व था। वे हिंदू सहोदरता, भाईचारा, हिंदू रक्षा-सुधार में जीते हुए थे। हिंदुओं की रक्षा के लिए सिख गुरूओं ने, सिखों ने, महाराज रणजीत सिंह ने केसरिया निशान साहिब के ध्वज के मान में अपने बेटे दीवार में चिनवाए। यही नहीं बाबा विश्वनाथ मंदिर के उस गुंबद पर रणजीत सिंह ने सोने की परत चढ़वाई, जिस पर केसरिया ध्वज फहराता है।

क्या यह सब सत्य नहीं है? और यदि है तो कृषि कानूनों की वह जिद्द क्यों, जिससे अलगाव बना है? क्या सोचा आपने कि लाल किले पर निशान साहिब का फहराया जाना किस भावना में हुआ? क्यों सिख नौजवानों ने शांतिपूर्ण आंदोलन की मर्यादा भंग की? क्यों 26 जनवरी 2021 को उन्होंने अपना शौर्य दिवस बना डाला? क्या वजह सत्ता का भावनाओं से खेलना, उन्हें घायल बनाना नहीं है? मोदीजी, आप जानते हैं कि इंसान जब भावनाओं में सुलगता है तो सुलगते-सुलगते लावा चरम पर ज्योंहि पहुंचा तो घर टूटते हैं, समाज टूटता है, देश टूटते हैं, साम्राज्य खत्म होते हैं। प्रसंग क्योंकि सिख है इसलिए इस सिलसिले की हकीकत ध्यान रहे कि औरंगजेब जैसा आतातायी बादशाह भी दीवार में बंदों को चिनवाने के बावजूद सिखों की बागी भावनाओं को तोड़ नहीं पाया था।

और हां, ऐसे इतिहास सत्य के वाकिये आजाद भारत के समसामयिक काल में भी हैं।

मोदीजी, याद कीजिए छह दिसंबर 1992 का दिन। क्या केसरिया ध्वज लिए हिंदू कारसेवकों ने बैरियर तोड़, गुंबदों पर चढ़ बाबरी मस्जिद का ध्वंस नहीं किया था? क्या तब शांतिपूर्ण समारोह का भाजपा, आरएसएस, आडवाणी, जोशी, उमा भारती विश्वास लिए हुए नहीं थे? मगर भावनाओं का ज्वार था, सुलगता-खदबदाता लावा था जो रोके न रूक सका और हिंदू भावना के विस्फोट का वह प्रतीक इतिहासजन्य दिन बना। मैं उस दिन भी अकेला यह सोचने वाला था कि शासक-सत्ता यदि भावनाओं को चुनौती देते हुए ऐसे हुंकारे मारेगा कि पुलिस-अर्द्धसैनिक बलों के चाक-चौबंद बंदोबस्तों से एक परिंदा पार नहीं हो सकता तो विस्फोट जब होगा तो सब कुछ धरा रह जाना है। आखिर भावनाओं से खेलना आग से खेलना है। निदान या तो लोकतंत्र की समझदारी, सबके समायोजन, सबको अधिकाधिक एडजस्ट करते हुए फैसले हैं या फिर तलवार की क्रूरता है। आजादी के बाद पंडित नेहरू का आइडिया ऑफ इंडिया, सेकुलरवाद की महाभूल थी जो बहुसंख्यक आबादी की भावनाओं, इतिहास की ग्रंथि को दरकिनार कर लोगों को नए डीएनए में ढालना चाहा। तभी वक्त की हवा में जब हिंदू जागा तो पल झपकते कारसेवकों ने बाबरी मस्जिद पर चढ़ इतिहास का अमिट फोटोशूट बनाया। तब पूरा भारत, पूरा मीडिया उस घटना की भर्त्सना करते हुए था। लेकिन मैं तब भी जनसत्ता में यह विश्लेषण लिखते हुए था कि भावनाओं की अनदेखी, उनको घायल बनाने का अंत परिणाम जब आता है तो ज्वालमुखी फूटता ही है। हिंदू को कितनी ही गाली दो, पर अयोध्या में जो हुआ है वह इतिहासजन्य है! उस वक्त भारत का सौभाग्य था जो समझदार प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव और उनके पीएमओ में राज्य मंत्री भुवनेश चतुर्वेदी सत्ता में थे, जिन्होने हिंदू भावना के विस्फोट का अर्थ बारीकी से बूझा और तमाम दबावों, कांग्रेस में लगभग विद्रोह के बावजूद वहां मस्जिद पुनर्निर्माण की घोषणा नहीं की, तंबू में रामलला मंदिर बनने दिया!

बहरहाल मैं भटक गया हूं। पते की बात है कि कृषि सुधार के अध्यादेश से लेकर 26 जनवरी 2021 की पूर्व संध्या तक भारत राष्ट्र-राज्य की सरकार ने अपने इस अहंकार को सिखों के घर-घर पहुंचाया है कि उनकी सुनवाई नहीं होगी। वे (आंदोलनकारी) चीन, पाकिस्तान के गुर्गे हैं। वे खालिस्तानी हैं। उन्हें दिल्ली नहीं घुसने नहीं दिया जाएगा (एक सामान्य मसले पर भी वैसा ही नैरेटिव, जैसे बाबरी मस्जिद के ध्वंस से पहले कांग्रेस-सेकुलर सरकारें कारसेवकों पर बनवाए हुए थी)। हर तरह से बदनाम करने का महाअभियान! नतीजतन लावा बनना था, खदबदाहट में मौका मिलते ही फूटना था। जैसे अयोध्या के वक्त सोचा गया कि फलां साजिश थी वैसे पिछले 24 घंटों से लाल किले पर निशान साहिब फहराए जाने को तूल देते हुए आपके भक्त लंगूरों ने अपने उस्तरों से दस तरह की थ्योरी चलाई है। आंदोलन के उग्रवादियों के टेकओवर करने आदि की बातें हैं लेकिन इन तमाम बातों का, ऐसे झूठे हल्ले का मतलब नहीं है।

तब मतलब क्या है? बहुत गंभीर व दीर्घकालीन है। लाल किले पर निशान साहिब के फहराने के बाद गोदी मीडिया ने जो हल्ला, प्रोपेगेंडा किया है और फिर सोशल मीडिया पर लंगूरों ने जो हल्ला मचाया (जैसे, दोस्तों हम देख रहे हैं कि कैसे आज गणतंत्र दिवस के दिन लाल किले पर हमला किया गया। वहां पर खालिस्तान का झंडा लहराया गया– कंगना) उससे उलटे 26 जनवरी 2021 का दिन सिख समुदाय के लिए यादगार बना है। ऐसी भाषा और ऐसे तेवर से लंगूर भक्त  किसान आंदोलन, सिख समुदाय पर इस कसम के साथ टूट पड़े हैं कि ‘जान चुके औकात तुम्हारी अब ये लिख कर धरवा लो और तुम्हारे बाप में है दम तो कानून बदलवा लो!’

मोदीजी, क्या ऐसा आप भी ठाने बैठे हैं? तब महाब्लंडर आपका, देश का, समाज-धर्म का होगा जो किसानों के बदनाम हो जाने के ख्याल में जोर-जबरदस्ती से कृषि कानूनों पर डटे रहने का प्रण बना। या यदि दिल्ली सीमा से जोर-जबरदस्ती आंदोलनकारी सिखों को लौटाया। अब यह ज्यादा जरूरी है कि ज्योंहि संसद बैठे कृषि कानून को खत्म करने या दो-तीन साल स्थगित करने का प्रस्ताव पेश कर उस पर संसद की मुहर लगवाएं!

न सोचें कि इससे सरकार की आन-बान-शान का भट्ठा बैठेगा। ऐसी आन-शान का मतलब नहीं है जो केसरिया निशान साहिब के बंदों में अलगाव बनवाए। इन बंदों, समुदाय की उपेक्षा, अनदेखी, जोर-जबरदस्ती का भविष्य में गंभीर, बहुत गंभीर परिणाम होगा। आप अपने आपको कितना ही चक्रवर्ती, महाबली मानें लेकिन आप और आपके अंबानी, अडानी को आज जिस निगाह से देखा जा रहा है उस पर विचार जरूर करें। 26 जनवरी 2021 का दिन आपके प्रायोजित नैरेटिव, भक्तों के हल्ला बोल में आप सफलता कैसी भी सोचें लेकिन दुनिया ने जाना-समझा है कि दिल्ली का राजपथ भले सैनिक ताकत से लकदक हो लेकिन प्रजा की भावनाओं के आगे वह फेल था, लाचार था। पूरा देश टीवी चैनल देखते हुए भक्तों और विरोधियों में बंटा हुआ था। तमाम तरह के मोदी विरोधियों-दुश्मनों के दिल-दिमाग में दिल्ली का माहौल अलग अर्थ लिए हुए था तो भक्त हिंदू अपना अलग अर्थ निकाले हुए थे। तभी दिल्ली का 26 जनवरी 2021 का दिन विभाजकता का नया मोड़ है। इससे भविष्य के असंख्य विषैले कांटे बनने हैं जिन पर जरूरत है गंभीरता से विचार की। अन्यथा तो मोदीजी आपने छह सालों में अपने राज से जो भारत दर्शन कराए हैं उसे नियति माने रहेंगे, आगे और भुगतते रहेंगे।

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