दिमाग, बुद्धि का आजादी बाद सूखा! - Naya India
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दिमाग, बुद्धि का आजादी बाद सूखा!

भारत के तीन मसले। एक, बलात्कार। दूसरा, आरोपियों को पुलिस द्वारा एनकाउंटर में मारना। तीसरा, सवा सौ करोड़ नागरिकों का दिमाग, उनका मनोविश्व! तीनों बातें भारत का आईना हैं। आजाद भारत के 72 साला सफर का आईना! हां, बलात्कार और बलात्कारियों का एनकाउंटर आईना है भारत का! इस आईने में क्या दिख रहा है? एक तरफ भूख, अपराध, बलात्कार, जघन्यता तो दूसरी और गुस्सा, प्रतिशोध, एनकाउंटर का तत्काल न्याय! पक्ष आरोपी हो या पीड़ित और उस पर सोचने वाले सवा सौ करोड़ लोग हों, सभी से निकला हुआ साझा, कॉमन, रेखांकित सवाल है कि क्या हम बुद्धि, विवेक, समझदारी लिए हुए हैं? नहीं, कतई नहीं। हम बिना दिमाग, बुद्धि के जी रहे हैं। बतौर नागरिक एक बलात्कारी, बतौर समाज व्यवस्था में उसकी पुलिस और अपने आपको बतौर राष्ट्र बनाने वाले भारत के हम लोग के तीनों फलक में किसी पर भी विचार करें, लोगों की भूख में विचार करें, लोगों के गुस्से में सोचें या राजनीतिक स्वार्थ, साजिश, प्रायोजन में मसले को समझें, सबमें आईना यह बताता मिलेगा मानो बिना सिर, बिना दिमाग के हमारा जीवन है!

दिमाग-बुद्धि मतलब सत्य, विवेक, समझदारी। ध्यान रहे, जिसकी यह क्षमता है वहीं इंसान है। हां, जीव जंतु-पशु और इंसान का फर्क दिमाग से है। इस पृथ्वी पर एक तरफ कोई साढ़े आठ लाख किस्म के पशु-जीव जंतु हैं तो दूसरी तरफ एक अकेला इंसान, मानव वह प्राणी है, जिसने अपने बुद्धि बल से पृथ्वी को अपना देवलोक बनाया है। इंसान का पृथ्वी को देवलोक बनाना दिमाग, बुद्धि, ज्ञान, नॉलेज से है। विभिन्न धर्मों ने इंसान में भले स्वर्ग की धारणा बना पृथ्वी को मृत्युलोक बताया हो लेकिन वह भी दिमाग का एक दर्शन था ताकि उससे इंसान को समझदार बनाते हुए देवलोक की व्यवस्था बने।

वैज्ञानिकता लिए बुनियादी सत्य होमो सेपियंस याकि आदि मानव का बुद्धि बल से सत्य खोजते हुए पृथ्वी पर इंसान की पताका वाला देवलोक है। दिमाग ने इंसान को बाकी प्राणियों से अलग बनाया है तो जो है उसका मूल दिमाग है। इंसानों के बीच में भी वे लोग (समाज, देश) असुर, पिछड़े, गुलाम हुए, जिनका परिस्थितियों के चलते बुद्धि विकास-विन्यास सीमित या पिछड़ा था। आज यदि यूरोप के स्वीडन, नार्वे से लेकर ब्रिटेन, फ्रांस, स्पेन की पट्टी में वहां के नागरिक देवलोक सा जीवन लिए हुए हैं और वहां गुस्सा भी यदि दिमाग का सत्यशोधन है तो वह मानव के बौद्धिक बल की चरम उपलब्धि का प्रमाण है!

आप सोच सकते हैं मैं दिमाग, बुद्धि पर फिजूल लिख रहा हूं। इसलिए कि हम सब जानते हैं। दुनिया की सर्वाधिक ट्रेंड मानव शक्ति, पढ़े-लिखे डिग्रीधारी हमारे पास हैं। हम नॉलेज और नॉलेज इकोनॉमी वाले हैं। हम विश्व गुरू हैं। हमें न बताए कोई दिमाग व बुद्धि का महत्व! हम सर्वज्ञ हैं, हमारे मोदीजी सवर्ज्ञ हैं। हमारा संविधान, हमारा तंत्र, हमारी मानव शक्ति सर्वज्ञता लिए हुए है!

तब भूख (सेक्स, धन, पावर) के बलात्कारी, लूट, क्रोनी पूंजीवादी, बेशर्म पावर राजनीति वाले रूप क्यों? तब टीवी चैनलों, सोशल मीडिया, व्हाट्सएप पर झूठ, मूर्खताओं की सुनामी क्यों? तब चौतरफा लाठियों (हाकिम-अफसर-जांच एजेंसियों-अदालत सत्तावान पार्टी-नेताओं) से डराने, धमकाने, जिंदादिली को मारने वाली बेलगाम प्रवृतियां कैसे? तब इंसानों के वैश्विक कंपीटिशन (नोबेल, ओलंपिक, मुक्त वैश्विक व्यापार, भू-राजनीति, पारदर्शिता, अनुसंधान-अविष्कार, वैश्विक पैमाने के विशाल प्रोजेक्ट, कला-साहित्य-संगीत में मौलिक सृजन-क्रिएटिविटी) में हम कैसे लगभग जीरो? तब 72 सालों में समाज, धर्म का भटक कर नैतिक-मूल्यविहीन, संस्कारविहीन होते हुए राष्ट्र-राज्य का कैसे इस मुकाम पर पहुंचना कि पुलिस आरोपियो का एनकाउंटर से तिया पांचा करे तो सवा सौ करोड़ लोग लाठी तंत्र पर, पुलिस वालों पर फूल बरसाएं!

सो, जान लें, गांठ बांध लें कि भारत के आईने में भीड़ मिलेगी, किस्म-किस्म के कुली-मेहनतकश मिलेंगे, लुटेरे मिलेंगे, हाकिम मिलेंगे, लठैत मिलेंगे, दलाल मिलेंगे, डिग्रियां लिए फौज मिलेगी, डॉक्टर-इंजीनियर-पेशेवर मिलेंगे लेकिन कोई दार्शनिक नहीं मिलेगा, विचारमना विद्वान नहीं मिलेगा, मौलिक सृजक-विचारक-अनुसंधानकर्ता नहीं मिलेगा। ऐसे राजनेता-नेतृत्वकर्ता नहीं मिलेंगे जो लिंकन, रूजवेल्ट, चर्चिल, द गॉल, देंग जैसे बौद्धिक-विजनरी निश्चयी हों, जिससे कौम भूखमुक्त बन सभ्यागत सभ्य लक्ष्यों के अश्वमेघ में जुटे।

मैं भटक रहा हूं। लेकिन जरा मोटे ही अंदाज में सोचें कि 1947 के बाद आजाद भारत में दार्शनिक, विचारमना मौलिक विद्वान, अनुसंधानकर्ता, सृजक, लेखक, समाज सुधारक और राजनेता में ऐसे कितने नाम आपकी याददाश्त में हैं, जिन्हें आप आजादी पूर्व के राजा राममोहन राय, दयानंद सरस्वती, रामकृष्ण-विवेकानंद, रामानुजम, महर्षि अरविंद, रमण, टैगोर, जेसी बोस, सीवी रमण, लाल-बाल-पाल,तिलक, गांधी, सावरकर, आंबेडकर, प्रेमचंद, शरतचंद्र के समतुल्य याद करते हों? नाम याद नहीं आएंगे और यदि कुछ आए भी तो उन नामों के दिमाग, बुद्धि का परिवेश, विचार मंथन का प्रारंभ काल 1947 पूर्व का मिलेगा! अंग्रेजों की संगत में बना मिलेगा!

मतलब आजादी ने भारत में टैगोर-अरविंद पैदा नहीं किए, गांधी-आंबेडकर-सावरकर-लोहिया-राजगोपालाचारी पैदा नहीं किए। दयानंद-विवेकानंद पैदा नहीं किए। रामनुजम-सीवी रमण पैदा नहीं किए। प्रेमचंद-शरतचंद-अज्ञेय पैदा नहीं किए। मतलब मौलिकता, रचनात्मकता, समाज सुधार, अनुसंधानकर्ता, गणितज्ञ यदि जब पैदा नहीं हैं तो सवा सौ करोड़ लोगों के दिमाग, बुद्धि का तब मतलब क्या है? एक और तथ्य जानें की 1947 के बाद जिन भारतीयों ने दिमाग-बुद्धि की प्रसिद्धि पाई उनका परिवेश देश नहीं विदेश था, फिर भले अमर्त्य सेन हों या हरगोविंद खुराना हों या चंद्रशेखरन या अभिजीत बनर्जी!

भला यह सब कैसे और क्यों?

और सोचें आजादी बाद के भारत के लोक व्यवहार में लोकप्रिय सुपरहिट चेहरे कौन-कौन से रहे? तो बॉलीवुड के नायक! आसाराम-राम-रहीम जैसे धर्मगुरू! राजीवगांधी-नरेंद्र मोदी, लालू-मुलायम-ओवैसी, चेतन भगत-प्रसून जोशी, अंबानी-अदानी, उमा भारती-प्रज्ञा आदि! हां, 1947 के बाद जन्म ले कर आजाद भारत की शिक्षा-दीक्षा से पैदा नाम की स्मृति में मुझे दिमाग पर जोर देना पड़ रहा है! सचमुच समाज-धर्म-राष्ट्र और लोग 72 वर्षों से जिस मानसिक अवस्था में रहे हैं या बुद्धि का जो सामूहिक विन्यास हुआ है उस पर जितना सोचेंगे तो समझ नहीं आएगा कि बुद्धि-दिमाग का कैसा भीषण अकाल है और हम उसे बूझे तक हुए नहीं!

यह कैसे-क्या है? एक तर्क है कि आजादी बाद दबी-पीड़ित-शोषित आबादी ऊपर उठी। सामाजिक उथलपुथल में मिट्टी का नीचे से ऊपर, ऊपर से नीचे होने की प्रक्रिया ने मानसिक विकास को मंद बनाया। लेकिन दुनिया में दूसरी जगह तो ऐसा नहीं हुआ। दक्षिण अफ्रिका में अश्वेत आबादी का दमन, गुलामी याकि अफ्रीका के देशों में जो दशा रही है उनमें आजादी के पंख के साथ यदि दिमाग-बुद्धि को भी पंख लगे हैं और दक्षिण अफ्रीका, चीन, पूर्वी यूरोपीय, आसियान देशों में उठाव तेजी से है तो हमारी बौद्धिकता का पैंदे में जाना क्यों? सचमुच बौद्धिक उर्वरता, ऊर्जा में भारत 1947 से पहले की दशा से आजादी के बाद के 72 सालों में असंख्य गुना गया गुजरा हुआ है।

इसके प्रमाण में फिर सोचें कि भारत का श्रेष्ठि वर्ग, नेहरू-आंबेडकर-मुखर्जी क्या 1950 की संविधान सभा में नागरिकों के इस मनोविज्ञान की कल्पना भी कर सकते थे कि एक वक्त आएगा जब भारत में बलात्कार ऐसे हुआ करेंगे और पुलिस आरोपी को एनकाउंटर कर मारेगी तो भारत के लोग उस पर वाह करेंगे! (जारी)

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