बेबाक विचार | डा .वैदिक कॉलम

कोरोनाः भारत क्यों चूक गया ?

यह संतोष का विषय है कि भारत में कोरोना मरीजों के लिए नए-नए तात्कालिक अस्पताल दनादन खुल रहे हैं, ऑक्सीजन एक्सप्रेस रेलें चल पड़ी हैं, कई राज्यों ने मुफ्त टीके की घोषणा कर दी है, कुछ राज्यों में कोरोना का प्रकोप घटा भी है, ज्यादातर शहरों और गांवों में कुछ उदार सज्जनों ने जन-सेवा के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया है।

कोरोना का डर इतना फैल गया है कि लोगों ने अपने घरों से निकलना बंद कर दिया है। जहां-जहां तालाबंदी और कर्फ्यू नहीं लगा हुआ है, वहां भी बाजार और सड़कें सुनसान दिखाई दे रही हैं। लोगों के दिल में डर बैठ गया है। कुछ लोगों का कहना है कि मरने वालों की संख्या जितनी है, उसे घटाकर लगभग एक-चौथाई ही बताई जा रही है ताकि लोगों में हड़कंप न मच जाए। यह आशंका कितनी सच है, पता नहीं लेकिन श्मशान घाटों और कब्रिस्तानों के दृश्य देख-देखकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं।

टीवी चैनलों और कुछ अखबारों ने ऐसे दृश्यों को अपने रोजमर्रा के काम-काज का हिस्सा ही बना लिया है। असलियत तो यह है कि देश के कोने-कोने में इतने लोग संक्रमित हो रहे हैं और मर रहे हैं कि बहुत कम ऐसे लोग बचें होंगे, जिनके मित्र और रिश्तेदार इस विभीषिका के शिकार नहीं हुए होंगे। मौत का डर लगभग हर इंसान को सता रहा है। नेताओं की भी सिट्टी-पिट्टी गुम है, क्योंकि वे अपने चहेतों के लिए चिकित्सा और पलंगों का इंतजाम नहीं कर पा रहे हैं और डर के मारे घर से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं।

जो विपक्ष में हैं, वे सत्तारुढ़ नेताओं की टांग-खिंचाई से बिल्कुल नहीं चूक रहे। उनसे आप पूछें कि इस संकट के दौर में आपने जनता के भले के लिए क्या किया तो वे बगलें झांकने लगते हैं। देश के बड़े-बड़े सेठ लोग अपने खजानों पर अब भी कुंडली मारे बैठे हुए हैं। वे देख रहे हैं कि मरने वालों को चिता या कब्र में खाली हाथ लिटा दिया जाता है लेकिन अभी भी सांसारिकता से उनका मोह-भंग नहीं हुआ है। कई घरों के बुजुर्ग कोरोना-पीड़ित हैं, लेकिन उनके जवान बेटे, बेटियां और बहू भी उनके नजदीक तक जाने में डर रहे हैं।

कई अस्पताल मरीज़ों को चूसने से बाज़ नहीं आ रहे हैं। नकली इंजेक्शन और नुस्खे पकड़े जा रहे हैं। कई नेताओं ने अपने मोबाइल फोन बंद कर दिए हैं या बदल लिये है ताकि लोग उन्हें मदद के लिए मजबूर न करें। अभी तक किसी आदमी को दंडित नहीं किया गया है, जो कोरोना की दवाइयों, इंजेक्शनों और आक्सीजन यंत्रों की कालाबाजारी कर रहा हो।

इस महामारी ने सिद्ध किया कि भारत के नेता और जनता, दोनों ही जरुरत से ज्यादा भोले हैं। दोनों अपनी लापरवाही की सजा भुगत रहे हैं। दुनिया के हर प्रमुख राष्ट्र ने महामारी के दूसरे दौर से मुकाबले की तैयारी की है लेकिन भारत पता नहीं क्यों चूक गया ?

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नई दिल्ली | SC on 12Th Board:  देश के ज्यादातर राज्यों में 10वीं और 12वीं की परीक्षाएं स्थगित की जा चुकी इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट ने स्टेट बोर्ड ओर CBSE को यह निर्देश भी दिया है कि आने वाले 10 दिनों में परिणामों की घोषणा कर दी जाए. लेकिन अभी भी आंध्र प्रदेश अपनी परीक्षाओं को आयोजित करने को लेकर अड़ा हुआ है. अब आंध्र प्रदेश की जीत के आगे सुप्रीम कोर्ट में सख्त चेतावनी देते हुए कहा है कि अगर राज्य के एक भी बच्चे को कुछ भी हुआ तो उसकी सारी जिम्मेदारी राज्य सरकार की होगी. इसका खामियाजा भुगतने के लिए तैयार रहें. उसके साथ ही सर्वोच्च अदालत ने आंध्र प्रदेश की सरकार को किसी भी बच्चे के कोरोना संक्रमित होने और उसकी मौत पर एक करोड़ का मुआवजा तक चुकाने की बात कह डाली.

10 दिन के अंदर 31 जुलाई तक जारी करें परिणाम

SC on 12Th Board: सुप्रीम कोर्ट ने आंध्र प्रदेश की सरकार को यह साफ कर दिया कि जब तक बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं की जाती तब तक राज्यों में 12वीं बोर्ड की परीक्षा के लिए अनुमति नहीं देगा. इधर 12वीं के परिणामों में हो रही देरी को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सीबीएसई की तर्ज पर राज्य सरकार को बोर्ड के परिणामों की घोषणा करनी चाहिए. सभी स्टेट बोर्ड के ढीले रवैए पर एतराज जताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 10 दिनों के अंदर 31 जुलाई तक नतीजों की घोषणा कर दें.

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कोर्ट ने पूछा आंध्र सरकार से यह सवाल

Justice m khanwilkar और Dinesh Maheshwari की पीठ ने आंध्र प्रदेश की सरकार से यह जानने का प्रयास किया कि वह आखिर फिजिकल परीक्षा क्यों लेना चाहता है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब देश में कोरोना का नया खतरनाक वैरीअंट चल रहा है तो फिर बच्चों की जिंदगी से रिस्क क्यों लेना है. कोर्ट में आंध्र प्रदेश की सरकार को सख्त चेतावनी देते हुए कहा कि यदि परीक्षा के आयोजन से एक भी बच्चे की मौत होती है तो वह राज्य सरकार को एक करोड़ के मुआवजे का आदेश देगी.

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