फिर प्याज की वही महंगाई

प्या‍ज का भाव कई जगहों पर 100 रुपये किलो तक पहुंच गया है। खासकर महाराष्ट्र की कुछ मंडियों में प्याज का थोक भाव 100 रुपये के आसपास पहुंच गया है। अनुमान है कि यह भाव अगली खेप आने तक ऐसा ही बना रहेगा। उत्तर भारत भी में प्याज का थोक भाव काफी ज्यादा है। दिल्ली की आजादपुर मंडी में प्याज का थोक भाव 35 से 60 रुपये प्रति किलो है, जो कि प्याज की क्वालिटी पर निर्भर करता है। अगर खुदरा बाजार की बात करें, तो प्याज 60 से लेकर 100 रुपये किलो तक बिक रहा है। दक्षिण भारत के शहरों में भी प्याज की कीमत खुदरा बाजार में 100 रुपये प्रति किलो है। इसकी वजह यह बताया गया है कि मॉनसून के बाद हुई भारी बारिश ने मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में प्याज की फसलों को बर्बाद कर दिया। दिल्ली को प्याज का बड़ा हिस्सा गुजरात, महाराष्ट्र और कर्नाटक से आता है। दूसरी ओर दिल्ली आने वाला प्याज का एक हिस्सा आस-पास के शहरों को भी जाता है। एक अनुमान के मुताबिक दिल्ली में रोजाना दो हजार टन प्याज की खपत होती है। आस-पास के शहरों के व्यापारियों के दिल्ली से माल उठाने की वजह से मांग रोजाना 2,200 से लेकर 2,400 टन पहुंच जाती है। फिलहाल जो फसल दिल्ली आ रही है, वह राजस्थान की है।

बहरहाल, गौरतलब यह है कि इस महंगाई का किसानों को कोई फायदा नहीं मिला है। किसानों के मुताबिक प्याज की फसल एक बार किसानों के घर से निकल जाती है, तो इसकी कीमतें बढ़ने लगती हैं। यानी पूरा खेल बिचौलियों का है। नतीजतन, उपभोक्ता भी परेशान है और उत्पादक भी। यह कहानी अब बहुत पुरानी हो चुकी है। यानी सरकारें बदलती हैं, लेकिन बिचौलियों के वर्चस्व पर कोई फर्क नहीं पड़ता। किसानों की पुरानी मांग है कि सरकार उत्पादक के लिए न्यूनतम मूल्य तय करे और उपभोक्ता के लिए अधिकतम मूल्य तय करें। मांग यह है कि अगर तय कीमत से कम पर कोई उत्पादक से खरीदे, तो उसे सजा हो। कोई ग्राहक को ज्यादा कीमत पर बेचे, तो भी सजा हो। लेकिन सरकारों ने इस मांग पर ध्यान नहीं दिया है। दरअसल, किसानों की दूसरी समस्याओं पर भी ध्यान नहीं दिया गया है। किसानों की एक बड़ी समस्या भंडारण की है। किसानों के पास भंडारण की क्षमता और सुविधा नहीं है। मगर इन बुनियादी समस्याओं की फिक्र किसी को नहीं है। नतीजतन, बार-बार प्याज की महंगाई का दौर आता है और सभी अपने को असहाय महसूस करते हैं।

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