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सबकी आंखों पर पड़ा परदा!

गुजरात के मोरबी में पुल टूट कर गिरा तो एक्ट ऑफ गॉड और एक्ट ऑफ फ्रॉड का जुमला खूब हिट हुआ। लेकिन यह सिर्फ एक पुल का टूटना भर नहीं है। देश में पिछले सात आठ साल से एक एक कर हर पुल टूट रहा है। लोगों को आपस में जोड़ने वाला प्रेम, सम्मान और भाईचारे का पुल तो खैर टूटा ही है लेकिन साथ ही शिक्षा और स्वास्थ्य से लेकर रोजगार, काम-धंधे, आर्थिक सुरक्षा और देश की सुरक्षा के जितने पुल बने थे सब टूट रहे हैं। लोगों ने मोरबी में पुल टूटते देखा और उससे लोगों को मरते भी देखा लेकिन उसे लेकर भी यह स्थापित किया गया कि पुल पर गए लोगों की ही गलती थी, जो वे मर गए। सोचें, इससे पहले कोरोना में कैसे गंगा में बहती लावारिस लाशों से पल्ला झाड़ लिया गया था?  या गंगा किनारे दफनाए गए शवों और अस्पतालों के बाहर ऑक्सीजन की कमी से मरते लोगों की जिम्मेदारी से कैसे किनारा कर लिया गया था!

भारत के वैज्ञानिकों ने अपनी वैक्सीन बनाई या दुनिया का फॉर्मूला लेकर दशकों पुरानी लैब में वैक्सीन तैयार हुई तो उसका श्रेय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लिया और लोगों ने दिया। भारत के खिलाड़ी अपने निजी उद्यम से पदक जीत कर लाते हैं तो उसका श्रेय प्रधानमंत्री को जाता है लेकिन इलाज के अभाव में लाखों लोग मर जाते हैं तो उसकी जिम्मेदारी प्रधानमंत्री की नहीं बनती है! यह नया भारत है! पुलवामा में सीआरपीएफ के 40 जवान शहीद हो गए या गलवान घाटी में चीन के साथ झड़प में 20 जवान शहीद हो गए तो इसकी जिम्मेदारी किसी की नहीं है लेकिन ये जवान जब आतंकवादियों को मारते हैं तो कहा जाता है कि प्रधानमंत्री ने जवानों को गोली चलाने की खुली छूट दी है इसलिए आतंकवादी मारे जा रहे हैं।

उस नाते लगता है कि देश के लोग परमहंस हो गए हैं। उनको किसी बात से कोई मतलब नहीं है। उन्होंने एक नेता चुन दिया है और मान लिया है कि जो करना है उसे करना है और जो हो रहा है वह अच्छे के लिए हो रहा है। देश में इससे पहले अपने जीवन से जुड़ी मुश्किलों से भी ऐसी निर्लिप्तता पहले कभी देखने को नहीं मिली। महंगाई बढ़ रही है तो यह जुमला सुनने को मिल रहा है कि रसोई गैस का सिलिंडर 12 सौ की बजाय 12 हजार में खरीदना पड़े तब भी मोदी को वोट देंगे। सोचें, जब सिलिंडर चार सौ रुपए का था तब देश में इसे लेकर आंदोलन था और सरकार पलट गई थी। जिस नेता ने सिलिंडर की कीमत चार सौ रुपए से कम करने का वादा किया था उसने इसकी कीमत 12 सौ रुपए कर दी फिर भी लोग आंखों पर पड़े परदे के आर पार नहीं देख पा रहे हैं। पेट्रोल की कीमत 70 रुपए लीटर से कम करनी थी लेकिन वह एक सौ रुपए लीटर से ऊपर चली गई। डॉलर की कीमत 40 रुपए से नीचे लानी थी लेकिन वह 83 रुपए पहुंच गई। फिर भी लोगों की आंखों पर पट्टी बंधी है।

धर्म को अफीम कहा जाता है लेकिन इससे पहले इतिहास में शायद ही कभी किसी जगह लोकतांत्रिक और संसदीय प्रणाली वाले देश में धर्म का इस तरह से अफीम या परदे की तरह इस्तेमाल किया गया हो! धर्म की आड़ में सारी नाकामियां छिपा दी जा रही हैं। जब भी महंगाई का मुद्दा उठता है तो मंदिर ला दिया जाता है। जब भी बेरोजगारी का मामला उठता है तो काशी या महाकाल का कॉरिडोर आ जाता है। गरीबी की बात होती है तो केदारनाथ या अयोध्या में पूजा शुरू होती है। और कुछ नहीं होता है तो आबादी बढ़ने की बात करके मुसलमान का खतरा दिखाया जाता है। लोग कंगाली की बात करते हैं तो कहा जाता है कि शुक्र मनाओ की आरएसएस है नहीं तो आज मंदिर जाने की जगह नमाज पढ़ रहे होते!

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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