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Wednesday, April 14, 2021
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जनता का पैसा और कार्वी कंपनी का खेल

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एक बहुत पुरानी कहावत है कि दूध का जला छाछ भी फूंक-फूंक कर पीता है। इसका सीधा सादा अर्थ है कि एक बार धोखा खाने के बाद इंसान बहुत होशियार व जागरूक हो जाता है। मेरा मानना है कि इस तरह ही शिक्षा देने वाली सारी कहावते आम साधारण इंसान के लिए बनाई गई हैं व सत्ता में बैठे लोगों खासतौर से उन लोगों का इससे कुछ लेना देना नही है जोकि इस हालात में हैं कि वे कहावत से सीख लेकर गलती सुधारने या उसे रोकने के लिए कोई कदम उठा सकें।

हाल के मामलें साबित करते हैं कि जो सरकार सत्ता में आने के पहले देश का धन लूट कर उसे गलत तरीके से अर्जित करने के बाद उसे विदेशी बैंको में जमा करने वाले लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने व उस पैसे को वापस लाने का वादा कर रही थी वह सत्ता में छह साल तक रहने के बाद एक भी पैसा वापस लाना तो दूर रहा देश के आम जनता का पैसा डकार कर बाहर भाग जाने वाले लोगों के खिलाफ कोई कार्रवाई तक नहीं कर सकी।

एक समय था जब बैंको पर लोगों का भरोसा नहीं था। यही हालात वित्तीय संस्थानों की थी तब लोग अपनी बचत को जमीन में या दीवार में गाड़ कर रखते थे। मगर देश के आजाद होने पर खासतौर पर बैंको का राष्ट्रीयकरण होने के बाद आम आदमी का बैंको में विश्वास बढ़ा और लोग उस पर भरोसा करते हुए पैसा जमा करवाने के साथ-साथ वित्तीय संस्थानो में पैसे का निवेश भी करने लगे ताकि वे अपने खून पसीने की कमाई गई राशि पर कुछ लाभ अर्जित कर सके।

मगर अब वहां से उनको छल हो रहा है। नवीनतम मामला कार्वी स्टॉक ब्रोकिंग प्राइवेट लिमिटेड का है। कुछ दिनों पहले सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया (सेबी) ने कार्वी नाम कंपनी पर नए ग्राहक बनाने व शेयरो की खरीद फरोख्त तक धंधा करने पर पूरी तरह से रोक लगाने के साथ ही इस कंपनी के निदेशको के खिलाफ कड़ी कार्रवाई किए जाने का ऐलान किया है।

नेशनल स्टॉक एक्सचेंज ने तो इस कंपनी केएसबीएल को डिफाल्टर घोषित करते हुए इसकी सदस्यता इसलिए समाप्त करने का फैसला किया क्योंकि यह कंपनी उसके नियम कानूनो का पालन नहीं कर रही थी। याद दिला दे कि 22 नवंबर 2019 को सेबी ने अपने निवेशको के शेयरो व डिबेंचरो के साथ हेरा-फेरी करने के आरोप में उसे यह काम करने से रोकने का फैसला किया था। यह कंपनी सरकारी नियम कानूनो का फायदा उठा रही थी। नियमानुसार जब भी व्यक्ति किसी कंपनी के शेयर खरीदता है तो उसे उन शेयरो के लिए खरीद फरोख्त का धंधा करने वाली सेबी की मान्यता संस्था में जमा कराकर डिमैट करवाना होता है।

ये शेयर एक तरह से मानों वहां लॉकर में रखे गए धन व जेवर की तरह के होते हैं। उसे इसी कंपनी के जरिए उन्हें बेचना पड़ता है व शेयर बेचने के बाद मिले धन को उसके बैंक खातों में भेजा जाता है व उसे किसी कंपनी के शेयर भी इन्हीं कंपनियों के जरिए खरीदने पड़ते हैं। सरकार को पता चला कि यह कंपनी लोगों के पैसे का इस्तेमाल अपने ग्राहको के शेयरो के जरिए अपनी जमीन जायदाद में खरीद फरोख्त करने वाली कंपनी कार्वी रियल्टी के लिए जमीन खरीदने के लिए कर रही थी।

आम ग्राहक को लगता था कि उसके शेयर या डिबेंचर वहां सुरक्षित है मगर उन्हें यह अपनी सहायक कंपनी के खाते में जमा करवा कर उसका निवेश कर रही थी। यह खुलासा होते ही सेबी ने अपना आदेश जारी करके इस कंपनी द्वारा काम करने पर रोक लगा दी थी। मजेदार बात तो यह है कि कार्वी ने सेबी की इस कार्रवाई के जवाब में अपनी ओर से कोई कार्रवाई न करते हुए न तो उसके आदेश को गलत बताते हुए चुनौती दी और न ही सरकार के किसी सवाल का कोई जवाब ही दिया।

उसने जवाब देने के लिए समय मांगते हुए बस इतना ही कहा कि वह अपने ग्राहको के शेयरो व डिबेंचरो को उनके खाते में वापस जमा करवा रही है। वह लोगों का पैसा वापस करने के लिए समय मांगती रही। तब सरकार का अनुमान था कि कार्वी ने अपने जमीन जायदाद के धंधे में अपने ग्राहको के 1096 करोड़ रुपए गैर-कानूनी तरीके से लगा दिए थे। हालांकि पिछले दिनों नेशनल स्टॉक एक्सचेंज बोर्ड ने यह खुलासा किया कि इस कंपनी ने अपने 2.35 लाख ग्राहको (निवेशको) के 2300 करोड़ रुपए वापस लौटा दिए है।

यहां यह ध्यान दिलाना जरूरी हो जाता है कि असली को टालना कहीं ज्यादा बड़ा हो सकता है क्योंकि महज एक साल के अंदर ही घोटाले की रकम दोगुने से ज्यादा हो गई। मालूल हो कि महज 5 लाख की पूंजी से 22 जनवरी 1993 को शुरू की गई इस निजी कंपनी की चुकता पूंजी 28.7 करोड़ हो गई हैं। इसके निदेशक रमेश चंद अरोडा, टीका राम खरे व सुमन अरोड़ा गुड़गांव के रहने वाले हैं। यह खुलासा होने के बाद उसके ग्राहक व निवेशक अपने शेयर व डिबेंचर वापस पाने के लिए कंपनी के दफ्तरो के चक्कर काट रहे हैं।

मैं भी उन लोगों में तब शामिल था जब देश में कुख्यात हर्षद मेहता शेयर घोटाला कांड हुआ था। तब शेयर बाजार के प्रति आम आदमी के मोह से प्रभावित होकर मैंने भी अपने एक मित्र के कहने पर इस कंपनी में खाता खोल दिया था। बाद में इस खाते के हवाले आयकर विभाग ने शेयरो की खरीद फरोख्त से होने वाली कमाई का ब्यौरा मांगते हुए मुझे नोटिस भेज दिया था। मेरे चार्टर्ड एकाउंटेंट ने बताया कि इस कंपनी ने मेरे खाते से 7.50 करोड़ रुपए के शेयर खरीदे थे। मेरे रिकार्ड व खरीद फरोख्त, हानि-लाभ का ब्यौरा देने के लिए कोई तैयार नहीं था। दिल्ली के दफ्तर वाले कहते कि हमने मद्रास स्थित मुख्यालय से जानकारी मांगी हैँ जबकि वहां से कोई जवाब नहीं आता।

इस खरीद फरोख्त से मुझे 35,000 रुपए का नुकसान हुआ था जबकि सच्चाई यह थी कि मैंने तो कुछ दशक पहले ही शेयर खरीदने के बाद उन्हें कभी बेचने का प्रयास तक नहीं किया था।

मेरे सीए ने कहा कि आज के बाद आप कभी इस धंधे में मत पड़ना। वहां मेरे कुछ लाख रुपए के शेयर थे उन्हें वापस लेने के लिए मुझे किसी और बैंक में खाता खोलने के साथ अपने जूते घिसने पड़ें। मेरे जैसे लाखों लोग परेशान हो गए जिनके पैसे फंसे थे वे धक्के खा रहे थे। सरकार अब भी यह दावा कर रही थी कि उनके पैसे वापस मिल जाएंगे। कब?यह कोई नहीं बताता है।

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