इस्लामी कलंक का सफाया

‘इस्लामिक स्टेट’ के सरगना अबू बकर अल-बगदादी की हत्या करके अमेरिका ने एक अमेरिकी महिला के साथ हुए बलात्कार और उसकी हत्या का बदला तो ले लिया लेकिन क्या इससे विश्व में फैला इस्लामी आतंकवाद खत्म हो जाएगा? उसामा बिन लादेन तो बगदादी से भी ज्यादा खतरनाक और कुख्यात था लेकिन उसका हत्या से क्या आतंकवाद में कोई कमी आई? इस्लाम के नाम पर चलनेवाले आतंकवाद को रोकने के लिए कुछ और भी बुनियादी कदम उठाने पड़ेंगे। सबसे पहले तो इस्लामी जगत को यह समझना होगा कि आतंकवाद इस्लाम का सबसे बड़ा कलंक है।

इस्लाम की जितनी बदनामी आतंकवाद के नाम पर हुई है, किसी अन्य मजहब या संप्रदाय की नहीं हुई है। आपके नाम में यदि कोई अरबी या फारसी का शब्द आ जाए, बस इतना ही काफी है। आप पर शक की निगाहें उठने लगती है। ऐसा क्यों है ? क्योंकि सारे दहशतगर्द अपने कुकर्म का औचित्य कुरान की आयातों के आधार पर ठहराते हैं। वे दावा करते हैं कि वे जिहादी है, वे ही सच्चे मुसलमान है। उन्हें जिहाद का क, ख, ग भी पता नहीं होता।

‘जिहादे-अकबर’ को माननेवाले के लिए काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह पर काबू करना बेहद जरुरी है। अपने आप को जिहादियों का खलीफा कहनेवाले इन बगदादी और उसामा- जैसे लोगों का चरित्र ऐसा रहा है कि जिसका चित्र सबके सामने खींचने में किसी को भी शर्म आएगी। जरुरी यह है कि पाकिस्तान इन तथाकथित जिहादियों की कड़ी भर्त्सना करे और उन्हें अपने देश से निकाल बाहर करे।

क्यों करे ? क्योंकि पाकिस्तान दुनिया का एक मात्र देश है, जो इस्लाम के नाम पर बना है। पाकिस्तान के बाद हम आशा करते हैं, सउदी अरब के युवराज मुहम्मद बिन सलमान से, जो अपने देश को इन गुमराह जिहादियों का जन्म स्थान न बनने दे। सउदी अरब ने अब तक इन आतंकवादियों को पाला-पोसा। वे अपने कारनामों से इस्लाम की ही जड़ें खोद रहे हैं।

इसी तरह अमेरिका ने भी अफगानिस्तान में रुस से लड़ने के लिए अल कायदा और आतंकवाद को पनपाया और सद्दाम हुसैन का खात्मा करके पश्चिम एशिया में इस्लामी स्टेट (आईएस) या दाएश को सींचा। नतीजा क्या हुआ ? हजारों लोग मारे गए, वे मुसलमान ही थे लेकिन आतंकवाद की यह आग यूरोप, अमेरिका और भारत को भी झुलसाए बिना नहीं रही। यह जरुरी है कि इस्लाम अपने इस कलंक को धोए वरना सारी दुनिया आतंकवाद के विरुद्ध एकजुट होते-होते कहीं इस्लाम के विरुद्ध ही मोर्चा खोलने पर मजबूर न हो जाए।

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