इजराइल का नया पैंतरा - Naya India
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इजराइल का नया पैंतरा

इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू इस वक्त तहलका मचाए हुए हैं। उन्होंने चुपचाप सउदी अरब की यात्रा कर ली, जो पिछले 68 साल में किसी भी इजराइली नेता ने नहीं की। सच्चाई तो यह है कि सउदी अरब और इजराइल, दोनों ही अमेरिकापरस्त रहे हैं लेकिन दोनों में हमेशा 36 का आंकड़ा बना रहा है। सउदी अरब फिलिस्तीन की आजादी का सबसे बड़ा हिमायती और प्रवक्ता रहा है। हालांकि इजराइल की सउदी अरब के साथ वैसी लड़ाई नहीं हुई, जैसी मिस्र और जोर्डन के साथ हुई है लेकिन इजराइल के खिलाफ संपूर्ण इस्लामी जगत को खड़ा करने में सउदी अरब का बड़ा योगदान रहा है। इसीलिए जब इजराइली प्रधानमंत्री नेतन्याहू लाल समुद्र के पास स्थित इजराइल के नियोम में जाकर सउदी शासक मुहम्मद बिन सलमान और अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोंपियो से चुपचाप मिल लिये तो सारे अरब जगत में झनझनी फैल गई।

सउदी अरब के विदेश मंत्री ने तो अखबारों को कह दिया कि यह खबर ही झूठी है। सउदी युवराज सिर्फ पोंपियो से मिले हैं। लेकिन इजराइल के पत्रकारों ने साफ़-साफ़ तथ्य पेश करके बताया है कि नेतन्याहू कितने बजे किसके जहाज में बैठ कर किसके साथ उस शहर में गए थे। सउदी राज परिवार को यह डर लग रहा है कि दुनिया के इस्लामी देश उसकी अब टांग खिंचाई करेंगे।

कोई आश्चर्य नहीं कि ईरान और तुर्की अब सउदी अरब पर बरस पड़ें। वे सउदी अरब को अमेरिका के लिए बिकाऊ माल घोषित करने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे। वे यह शंका भी प्रकट करेंगे कि हाल ही में जैसे संयुक्त अरब अमारात (यू.ए.ई.) और बहरीन के साथ इजराइल के कूटनीतिक संबंध स्थापित हुए हैं, वैसे ही सउदी अरब के साथ भी होने वाले हैं।इस वक्त इजराइल के सिर्फ चार मुस्लिम देशों के साथ कूटनीतिक संबंध हैं- मिस्र, जोर्डन, यूएई और बहरीन लेकिन सउदी के साथ उसके यही संबंध हो गए तो मान लीजिए कि सारे मुस्लिम देश उसकी पकड़ में आ जाएंगे। इतना बड़ा पट-परिवर्तन अरब-जगत में अमेरिका के दबाव में तो हो ही रहा है, उसका मूल कारण ईरान ही है।

सबको लग रहा है कि अमेरिका का बाइडन-प्रशासन ईरान के प्रति ट्रंप-नीति को जरुर बदलेगा। उस स्थिति का सामना करने के लिए इजराइल और मुस्लिम देशों का एकजुट होना जरुरी है। ओबामा-काल में संपन्न हुआ ईरानी परमाणु-समझौता यदि फिर जीवित हो गया तो सबसे ज्यादा इजराइल डरेगा। इसीलिए इजराइल जरुरत से ज्यादा सक्रिय दिखाई पड़ रहा है।

By वेद प्रताप वैदिक

हिंदी के सबसे ज्यादा पढ़े जाने वाले पत्रकार। हिंदी के लिए आंदोलन करने और अंग्रेजी के मठों और गढ़ों में उसे उसका सम्मान दिलाने, स्थापित करने वाले वाले अग्रणी पत्रकार। लेखन और अनुभव इतना व्यापक कि विचार की हिंदी पत्रकारिता के पर्याय बन गए। कन्नड़ भाषी एचडी देवगौड़ा प्रधानमंत्री बने उन्हें भी हिंदी सिखाने की जिम्मेदारी डॉक्टर वैदिक ने निभाई। डॉक्टर वैदिक ने हिंदी को साहित्य, समाज और हिंदी पट्टी की राजनीति की भाषा से निकाल कर राजनय और कूटनीति की भाषा भी बनाई। ‘नई दुनिया’ इंदौर से पत्रकारिता की शुरुआत और फिर दिल्ली में ‘नवभारत टाइम्स’ से लेकर ‘भाषा’ के संपादक तक का बेमिसाल सफर।

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