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राज्यों के लिए टैक्स घटाना आसान नहीं

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राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ कोरोना की स्थिति पर चर्चा के लिए बुलाई गई बैठक में प्रधानमंत्री ने एक बड़ा राजनीतिक दांव चला और विपक्षी पार्टियों को कठघरे में खड़ा करते हुए कहा कि उन्होंने केंद्र सरकार के उत्पाद शुल्क घटाने के बाद भी पेट्रोल और डीजल पर वैट कम नहीं करके नागरिकों के साथ अन्याय किया है। उन्होंने विपक्ष के शासन वाले कई राज्यों का नाम लिया और कहा कि इन्होंने स्थानीय कर नहीं घटाया, जिससे इन राज्यों में पेट्रोल और डीजल की कीमत बहुत ज्यादा है। उन्होंने राज्यों से वैट कम करने को भी कहा। हालांकि यह अलग चर्चा का विषय है कि किस राज्य ने टैक्स घटाया और किसने नहीं घटाया या किसने घटा दिया इसके बावजूद उसके यहां दोनों ईंधनों की कीमत देश में सबसे ज्यादा है। टैक्स कम करने वाले राज्यों में भी पेट्रोल पर 25 फीसदी से ज्यादा टैक्स लेने वाले सात में से पांच राज्य भाजपा शासित हैं और डीजल पर सबसे ज्यादा टैक्स वसूलने वाले तीन राज्यों में से एक भाजपा शासित है। सो, इस बहस में जाने की जरूरत नहीं है।

असली बात महंगाई की है और सबको पता है कि जब तक ईंधन के दाम कम नहीं होंगे तब तक किसी वस्तु की कीमत कम या स्थिर नहीं होने वाली है। दूसरी अहम बात यह है कि टैक्स चाहे केंद्र सरकार ले रही है या भाजपा-गैर भाजपा शासित राज्य ले रहे हैं, अंततः उसका भार तो आम लोगों पर ही पड़ रहा है। इसलिए आपस मे एक-दूसरे पर आरोप लगाने की बजाय सरकारों की साझा चिंता कीमतों को कम करने की होनी चाहिए। मुश्किल यह है कि राज्यों के पास कीमत कम करने की गुंजाइश बहुत कम है। उनके पास राजस्व के साधन कम हैं। जीएसटी लागू होने के बाद उनकी निर्भरता केंद्र के ऊपर बनी है लेकिन उसमें भी मुआवजा देने का प्रावधान इसी साल कम होने वाला है। इसकी भरपाई के लिए अगर जीएसटी कौंसिल में कर का स्लैब बदलने का प्रस्ताव आता है तो उसका ठीकरा भी राज्यों पर ही फूटेगा, जबकि टैक्स स्लैब बदल कर राजस्व वसूली बढ़ाई जाती है तो उसका बड़ा हिस्सा केंद्र के खाते में जाएगा।

जहां तक पेट्रोल और डीजल पर लगने वाले स्थानीय कर की बात है तो उसमें कटौती का सुझाव दे देना बहुत आसान है पर राज्यों के लिए वास्तव में कटौती करना बहुत मुश्किल है। इसका कारण यह है कि हर राज्य सरकार के कुल कर संग्रह में एक चौथाई से ज्यादा हिस्सा पेट्रोल और शराब का होता है। यहीं कारण है कि इन दोनों उत्पादों को जीएसटी में नहीं रखा गया है। राज्यों के मिलने वाले सौ रुपए के कर में पेट्रोलियम उत्पादों और शराब का हिस्सा 25 से 35 फीसदी होता है। केंद्रीय करों में से राज्यों को मिलने वाला हिस्सा 25 से 30 फीसदी है और बचा हुआ राजस्व राज्यों के अपने कर का होता है, जो जीएसटी में से उनको मिलता है। यह 40 से 50 फीसदी होता है। अगर जीएसटी की वसूली कम होती है या केंद्रीय करों की वसूली कम होती है तो राज्यों के सामने राजस्व का संकट पैदा होता है।

राज्यों के सामने दूसरी मुश्किल यह है कि केंद्र सरकार ने पेट्रोलियम उत्पादों पर लगने वाले उत्पाद शुल्क में बेसिक उत्पाद शुल्क बहुत कम कर दिया है। बेसिक उत्पाद शुल्क की जगह केंद्र ने विशेष उत्पाद शुल्क, अधिभार और उपकर बढ़ा दिया है। ध्यान रहे केंद्र सरकार सिर्फ बेसिक उत्पाद शुल्क में से ही राज्यों के साथ राजस्व का साझा करती है। तभी बेसिक उत्पाद शुल्क घटाने से इस राजस्व में राज्यों का हिस्सा कम होता गया है। इसे सिर्फ एक आंकड़े से समझा जा सकता है। वित्त वर्ष 2020-21 में पेट्रोल और डीजल पर उत्पाद शुल्क से केंद्र सरकार को 3.72 लाख करोड़ रुपए मिले लेकिन इसमें से राज्यों को सिर्फ 19,972 करोड़ रुपए मिले। यानी पेट्रोल-डीजल पर मिले कुल उत्पाद शुल्क का पांच फीसदी हिस्सा राज्यों को मिला। ऐसी स्थिति में अगर राज्य सरकारें पेट्रोल-डीजल पर स्थानीय कर कम करती हैं तो उनके सामने तत्काल राजस्व का बड़ा संकट खड़ा होगा।

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एक और अहम बात जिस पर ध्यान देने की जरूरत है वह ये है कि पेट्रोल और डीजल पर लिया जाने वाला राज्यों का वैट या स्थानीय कर ऐतिहासिक रूप से ज्यादा रहा है। राज्य अपनी जरूरत पूरी करने के लिए पहले से इन उत्पादों पर ज्यादा टैक्स लेते रहे हैं। लेकिन केंद्र सरकार कभी इतना ज्यादा टैक्स नहीं लेती थी, जितना अब लिया जा रहा है। मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए की सरकार के समय पेट्रोल पर 9.48 रुपया और डीजल पर 3.56 रुपया उत्पाद शुल्क लगता था, जो कोरोना महामारी के समय बढ़ कर पेट्रोल पर 32.90 रुपया और डीजल पर 31.80 रुपया हो गया था। पिछले साल नवंबर में केंद्र सरकार ने पेट्रोल पर पांच रुपया और डीजल पर 10 रुपया उत्पाद शुल्क कम किया। इसके बाद भी पेट्रोल पर 27.90 रुपया और डीजल पर 21.80 रुपया टैक्स केंद्र सरकार ले रही है। इसका मतलब है कि यूपीए सरकार के मुकाबले मोदी सरकार पेट्रोल पर तीन गुना और डीजल पर छह गुना ज्यादा कर ले रही है। जाहिर है केंद्र सरकार ने पेट्रोलियम उत्पादों पर कई गुना कर बढ़ा कर इसे सरकारी खजाना भरने का जरिया बनाया है। इसलिए राज्यों से पहले केंद्र को उत्पाद शुल्क में कमी करनी चाहिए। कम से कम महामारी के पहले वाली स्थिति भी केंद्र सरकार बहाल करे तो लोगों को बहुत राहत मिलेगी।

प्रधानमंत्री कह रहे हैं कि केंद्र सरकार ने नवंबर में पेट्रोल पर पांच रुपए और डीजल पर 10 रुपए की कटौती की। ध्यान रहे उसके बाद से केंद्र सरकार की पेट्रोलियम कंपनियों ने 137 दिन तक कीमतों में बढ़ोतरी नहीं की क्योंकि पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव चल रहे थे। चुनाव नतीजे आने के 12 दिन बाद 22 मार्च से कीमतें बढ़नी शुरू हुईं और अगले 16 दिन में सरकारी पेट्रोलियम मार्केटिंग कंपनियों ने पेट्रोल की कीमत में 12 रुपए और डीजल की कीमत में 10 रुपए की बढ़ोतरी कर दी। यानी केंद्र के कर घटाने से पेट्रोल पर पांच रुपए की राहत मिली और 12 रुपए का बोझ पड़ा। यह काम केंद्र सरकार ही कर सकती है, राज्यों की सरकारों को इसका अधिकार नहीं है। उनके पास ले-देकर वैट, बिक्री कर या स्थानीय कर है, जिसमें वे एक सीमा से ज्यादा कटौती नहीं कर सकते हैं। क्योंकि उनके पास इस कमी की भरपाई करने का दूसरा जरिया नहीं है।

By अजीत द्विवेदी

पत्रकारिता का 25 साल का सफर सिर्फ पढ़ने और लिखने में गुजरा। खबर के हर माध्यम का अनुभव। ‘जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से शुरू करके श्री हरिशंकर व्यास के संसर्ग में उनके हर प्रयोग का साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और अब ‘नया इंडिया’ के साथ। बीच में थोड़े समय ‘दैनिक भास्कर’ में सहायक संपादक और हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ शुरू करने वाली टीम में सहभागी।

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