मौसम का बदलना, वेनिस का डुबना

कई बार मुझे लगता है कि कहीं मैं पिछले जन्म में शुतुरमूर्ग तो नहीं था। वजह यह है कि दुनिया कि इस सबसे बड़ी उड़ न सकने वाली चिडि़या के बारे में कहा जाता है कि जब वह जंगल में तूफान आता देखती है तो रेत में गड्डा खोदकर अपना सिर छुपा लेती है। उसे लगता है कि मैं तूफान को नहीं देख पा रही हूं। अतः तूफान मुझे नहीं देख पाएगा या मेरा कुछ नहीं बिगड़ेगा।

मुझे भी कई बार ऐसा ही लगता है क्योंकि मैं मौसम में होने वाले बदलाव जैसे गर्मी, पानी के बढ़ते स्तर आदि के बारे में पढ़ता था तो मुझे लगता था कि जब तक ये बदलाव होंगे तब तक मैं जीवित नहीं रहूंगा और दुनिया से अलविदा हो चुका होगा। मगर अब यह सब गलत साबित हो रहा है। बादलों ने गरजना बंद कर दिया है। जबरदस्त गर्मी देखने को मिलती है व समुद्र में पानी इतनी तेजी से उठने लगा है कि उसके किनारे स्थित नगर डूबने लगे हैं।

हाल में दुनिया के सबसे संपन्न देशों में गिने जाने वाले इटली के वेनिस इलाके में ऐसा ही देखने को मिला। जोकि यूरोप में आता है। दुनिया में सबसे ज्यादा संख्या ईसाईयों की है जोकि ज्यादातर विकसित राष्ट्रो जैसे यूरोप, अमेरिका, आस्ट्रेलिया में रहते हैं। इटली की राजधानी स्थित वेटिकन सिटी वाला रोम तो इसाईयो का सबसे पवित्र धार्मिक स्थान है जहां ईसाईयो से जुड़ी तमाम वस्तुएं मौजूद हैं।

पहले तो बिहार में कहा जाता था कि रोम पोप का व बिहार गोप का। तब लालू यादव बिहार की सत्ता पर पूरी तरह से हावी थे। हाल ही में रोम के निकट इटली के वेनिस शहर में ज्वार के कारण वहां पानी के कारण रोजमर्रा की जिदंगी को अस्त-व्यस्त होते देखा। वेनिस वहां का बहुत सुंदर शहर है जोकि मूलतः नहरो का शहर माना जाता है। यह लोग एक जगह से दूसरी जगह तक जाने के लिए नावों के डोलो का इस्तेमाल करते हैं।

यह जगह समुद्र तल से नीचे है। अतः जब वहां के पानी में ज्वार आता है तो वह अक्सर शहर में घुस जाता है। यहां ईसाईयों का मशहूर ऐतिहासिक सेंट मार्क बैलीसिया गिरिजाघर भी स्थित हैं। वहां ज्वार को इटेलियन भाषा में एक्वा आल्टो बोला जाता है। हाल ही में जब ज्वार आया तो यहां की दुकाने, एतिहासिक गिरिजाघर, स्कूल, मकान पानी में डूब गए। कई जगह तो उनमें कई फूट तक पानी भर गया। होटल में ठहरे हुए पर्यटको को भारी दिककतो का सामना करना पड़ा।

मालूम हो कि रोम भी समुद्र तट से कुछ मीटर ही ऊंचा है व वहां भी ज्वार आने के कारण शहर में समुद्र का पानी भर जाना आम बात है। कहा जा रहा है कि 1966 के बाद वेनिस शहर में ज्वार भाटे के कारण होने वाली यह दूसरी सबसे बड़ी बरबादी थी। दरअसल वेनिस तो यहां के 118 छोटे द्वीपो में से एक है जोकि समुद्र तट से बहुत दूर अंपार पर स्थित है। शहर 400 पूलो द्वारा जुड़े हुए हैं व लोग आवाजाही के लिए नावों का इस्तेमाल करते हैं। पहले यह आस्ट्रीया के कब्जे में था व 1860 में रोम ने पुनः वेनिस को अपने कब्जे में लिया

कहते हैं कि समुद्रों में आवाजाही के कारण इस शहर को बहुत ज्यादा नुकसान पहुंचरहा है। जब मैं इस बरबादी के दृश्य देख रहा था तो मेरे मन में सबसे बड़ी चिंता इस बात की थी कि जब शहर का यह हाल है तो वहां की सीवर व्यवस्था का क्या हाल हुआ होगा। क्योंकि दुनिया के ज्यादातर शहरों में सीवर को नदियो में छोड़ दिया जाता है। पता चला कि वहां सीवर के गंदे पानी को साफ करने के बाद ही समुद्र में छोड़ा जाता है।

जब मैं श्रीनगर जाता था तब यह बात डल झील में तैरने वाले शिकारो के बारे में सोचता था। तब भी यही बताया गया था कि ज्यादातर गंदगी वहां पास स्थित झील में चली जाती है। अतः मैं कभी उनमें नहीं ठहरा। यहां संगमरमर और बेशकीमती लकड़ी की बनी इमारते पानी के कारण बरबाद हो गई हैं क्योंकि समुद्री पानी उन्हें बहुत ज्यादा नुकसान पहुंचाता है।

अब वहां लोग यह कहने लगे है कि वेनिस डूब रहा है। समुद्र के बढ़ते जल स्तर के कारण हर साल करीब 60 दिन इन ज्वार की लहरो के कारण वेनिस में बहुत नुकसान होता है व समुद्र का गंदा पानी पूरे शहर में भर जाने के कारण वहां की सीवर व्यवस्था भी काम करना बंद कर देती हैं। पिछले साल करीब 75 फीसदी शहर पानी में डूब गया व सुरक्षा के कारण ऐतिहासिक सेंट मार्क स्थल लोगों के लिए बंद करना पड़ा।

कहते हैं कि 1950 के दशक में यहां के उद्योगों ने वहां की जमीन से मीठे पानी को निकालकर उसका इस्तेमाल करना शुरू किया था। यह पानी शहर के नीचे भरा हुआ था। उसके निकाले जाने के कारण शहर का धीरे-धीरे नीचे जाना शुरू हो गया। हालांकि बाद में सरकार ने इस पर रोक लगा दी। वैज्ञानिको का कहना है कि नावों वाले इस शहर में तेजी से नावे चलाने के कारण जो लहरे उठती है वे भी उसके डेरो वाले तल को नुकसान पहुंचाता है।

अब इससे निपटने के लिए वहां प्रोजेक्ट मोसेज शुरू किया गया है ताकि इन द्वीपो में पानी के भरने पर रोक लगाई जा सके। मगर देरी व भ्रष्टाचार के कारण दिनों-दिन महंगा होता हुआ प्रोजेक्ट अभी तक शुरू नहीं हो पाया है। इनके जरिए बनाए अवरोध शहर के ज्वार भाटे के पानी के घुसने से रोकते हैं। खराब हालात रोम की भी है। आंकड़े बताते है पिछले सौ सालों में उसके करीब समुद्र का जल स्तर बढ़ गया है वहां भी शहर को बचाने के लिए उसे बैरिययों से घेरा जा रहा है। मेरी बात समझ में नहीं आती है कि द्वारका से लेकर रोम तक भगवान वाले शहर के बचाव में ईश्वर भी चिंता में नहीं होते है। पहले कृष्ण की नगरी द्वारका पानी में डूबी व अब ईसाईयत की प्रमुख नगरी वेटिकन पर भी संकट मंडरा रहा है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Shares