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जापान में आबे का पद छोड़ना

जब मैं छोटा था तब जापान के बारे में मेरी धारणा अच्छी नहीं थी। इसकी वजह यह थी कि मेरे सगे चाचा व मामा जोकि ब्रिटिश सरकार के अधीन भारतीय सेना में रहते हुए जापान के खिलाफ अंग्रेजो की और से द्वितीय विश्वयुद्ध में लड़ने गए थे तो उन्हें वहां कैद कर लिया था। जब मैं गरमी की छुट्टियो में उनके यहां जाता तो वे लोग अपने युद्ध के दौरान हुए अनुभवों को बढ़-चढ़कर सुनाते थे कि उन पर जापानी सेना कितना अत्याचार करती थी, बताते थे।

जापानी सेना ने प्लास्टिक का एक गुब्बारा विकसित किया था जिन्हें कैदियो के तलवे के साथ बांध दिया जाता था। जब वे कैदियो की जोर से पिटाई करते तब जोरदार थप्पड़ से उनका शरीर एक और झुक जाता तो वह उस गुब्बारे के कारण दोबारा खड़ा हो जाता व वे लोग कई बार मारने लगते। उन्होंने अपने अत्याचारो की इंतहा कर दी थी। थोड़ी बहुत खबरें जापान पर अमेरिका द्वारा परमाणु बम गिराने के नतीजे की भी पढ़ी।  वहां के निर्दोष नागरिको का ऐसे मरना जापान के बारे में गलत राय बनवा गया।

जापानियों के बारे में मेरी धारणा तब ठीक हुई जब मुझे डाक से एक जापानी लड़की याशिको तकासिम का पत्र मिला जोकि मेरी तरह बनना चाहती थी। उससे पता चला कि उसे मेरा विवरण एक अमेरिकी पत्रिका में मिला था। हम दोनों की पत्र-मित्रता हो गई व हम लोग अपने-अपने देशों व संस्कृति के बारे में दूसरो को जानकारी देने लगे। इससे जापान के बारे में मेरी धारणा कुछ बदली।

हाल में जब जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे द्वारा त्यागपत्र देने की खबर पढ़ी तो तमाम पुरानी घटनाएं याद हो आई। मेरी एक पत्रकार मित्र भी जापान के उस अखबार में काम करती थी जोकि दुनिया का सबसे ज्यादा प्रसार संख्या वाला अखबार है। शिंजो आबे के इस्तीफे के बाद पता चला कि वे भारत खासतौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए कितने अहम थे। वास्तव में शिंजो आबे की जापान में वहीं स्थिति है जो कि हमारे देश में नेहरू गांधी परिवार की है।

उनके परिवार का वहां की सत्ता पर दशकों तक कब्जा रहा है। शिंजो आबे का जन्म 2 सितंबर 1954 को हुआ था। वह द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद जापान के सबसे युवा प्रधानमंत्री बने। वे 2012 से जापान के प्रधानंत्री व अपनी लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी एलडीपी के अध्यक्ष रहे। वे जापान के सबसे लंबी अवधि तक प्रधानमंत्री रहने वाले पहले व एकमात्र नेता हैं। वे महज 52 साल की उम्र में पहली बार जापान के सबसे युवा प्रधानमत्री बने थे।

उनके बाबा नोबुसुके किशी को एक समय चीन के अधिकृत वाले कोरिया व मानचुकोओ का आर्थिक राजा माना जाता था। उनके परबाबा विसफाउंट योशिमासा ओशिमा जापान की शाही सेना के जनरल थे। उनके बाबा नोबुसुके किशी 1957 से 1960 तक जापान के प्रधानमंत्री रहे। उनके पिता शिंतारो आबे 1982-86 तक जापान के विदेशमंत्री रहे। विश्वयुद्ध के दौरान आत्मघाती उड़ान भरने वाले कामाकाजी विमान के पायलट थे। मगर उनके प्रशिक्षण के दौरान ही युद्ध खत्म हो गया। आबे की मां योको किशी 1957 से 1960 तक जापान के प्रधानमंत्री रहे किशी की बेटी थी।

उनके परचाचा इसाकू सातो ने 1964 से 1972 के दौरान 2798 दिनों तक प्रधानमंत्री रहने का रिकार्ड बनाया था। आबे 2006 में पहली बार प्रधानमंत्री बने। मगर उसके अगले साल अपना स्वास्थ्य ठीक न होने के कारण पद से इस्तीफा दे दिया था। उसके बाद वे 2012 में पुनः प्रधानमंत्री बने और हाल में इस पद से अपना इस्तीफा देने तक लगातार प्रधानमंत्री बने रहे। वे 2006-07 से भारत आते रहे हैं। उन्होंने अपने पहले भारत दौरे के दौरान हमारी संसद को संबोधित किया था।

दौबारा प्रधानमंत्री बनने के बाद वे अब तक तीन बार भारत आए। उन्हें 2014 में गणतंत्र दिवस परेड का मुख्य अतिथि बनाया गया था। यह भारत व जापान के रिश्तो की अहमियत को दर्शाने वाला था। उन्हें अंतिम यूपीए सरकार ने आमंत्रित किया था। पहले उन्हें यूपीए नेता प्रधानमंत्री डा मनमोहन सिंह ने रिझाने की कोशिश की व फिर राजग के सत्ता में आने के बाद नए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का उनके प्रति लगाव कुछ कम नहीं हुआ। हालांकि भारत व जापान के बीच रिश्तो में मधुरता आनी 2001 से ही शुरू हो गई थी जबकि दोनों देश एक दूसरे के साथ अपने सहयोग के लिए तैयार हुए थे।

जब 2007 में आबे पहली बार भारत आए तो उनके द्वारा भारत-प्रशांत क्षेत्र मेलजोल एकीकरण का मुद्दा जोर पकड़ने लगा जोकि आगे चलकर भारत-जापान रिश्तो का आधार बना। जब वे दोबारा भारत आए तो दोनो देशो के रिश्ते और मजबूत हुए। जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने अपनी पहली द्विपद्वक्षीय वार्ता के लिए जापान को चुना व सितंबर 2014 में मोदी की जापान यात्रा के दौरान परमाणु ऊर्जा से लेकर समुद्री सुरक्षा व बुलेट ट्रेन सरीखे अहम मुद्दो पर बातचीत आगे बढ़ी।

उससे पहले भारत जापान-परमाणु संधि अधर में लटकी थी क्योंकि परमाणु अप्रसार संधि पर दस्तखत करने के कारण जापान भारत को शक की नजरों से देखता आया था। इसका कारण भारत के अमेरिका व फ्रांस की परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र वाली कंपनियों से बातचीत थी। सहूलियत मिली क्योंकि ज्यादा इसका मालिकाना हक जापानी कंपनियों के पास था। अतः उन पर दबाव बनाने में आबे ने विशेष भूमिका अदा की। जब आबे नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने पर भारत आए तो उन्होंने 2015 में शिंकानसेन प्रणाली पर वहां काम कर रही बुलेट ट्रेन 2022 तक भारत में शुरू करने की बात कही।

यह भी कहा कि चीन का प्रभाव कम करने के लिए भारत व जापान, श्रीलंका व मालद्वीप मिलकर परियोजनाएं शुरू करेंगे। आबे जी-7 के प्रभावशाली नेता थे व इस कारण भारत के लिए काफी महत्व के थे। उससे भारत की सामरिक, आर्थिक व राजनीति स्थिति पर काफी प्रभाव हुआ। दोनों के संबंध इतने बढ़े कि नरेंद्र मोदी की जापान यात्रा के दौरान आबे उन्हें अपने यशानाशी स्थित खानदानी घर ले गए, जहां वे अपने नेताओं को आमंत्रित नहीं करते हैं। अब देखना यह है कि उनके जाने के बाद आने वाले नए जापानी प्रधानमंत्री के साथ नरेंद्र मोदी व भारत के साथ कैसे संबंध रखेंगे।

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