जनेवि: पार्टियों का मोहरा न बनें

जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में छात्रों के बीच कल जो मार-पीट हुई, उसकी निंदा कौन नहीं कर रहा है? क्या कांग्रेस, क्या कम्युनिस्ट, क्या आप पार्टी और क्या भाजपा- सभी पार्टियां उसकी निंदा कर रही हैं। कल रात टीवी चैनलों पर जब मैंने वह शर्मनाक दृश्य देखा तो कुछ पार्टियों के शीर्ष नेताओं को मैंने फोन किए। उनका जोर इस बात पर ज्यादा था कि ‘हमारे छात्रों’ पर ‘उनके छात्रों’ ने हमला किया। पहले उन्होंने किया, हमारों ने बाद में किया। लेकिन टीवी चैनलों पर सारा दृश्य देखने के बाद यह तो स्पष्ट हो जाता है कि हमले की पहल किसने की। यह और भी शर्म की बात है कि हमलावर लड़कों ने अपने मुंह ढक रखे थे। यह उनके कायर होने का अकाट्य प्रमाण है।

जाहिर है कि छात्र संघ की सभा में शुल्क-वृद्धि के विरुद्ध आंदोलन करनेवाले छात्र एवं छात्राओं को मारा-पीटा, घायल किया गया। निहत्थे लोगों पर डंडों और सरियों से प्रहार किया गया। दर्जनों नौजवान अस्पताल पहुंच गए। इन तथाकथित वामपंथी छात्रों ने कोई चूड़ियां तो पहन नहीं रखी थीं। उन्होंने भी जवाबी हमले किए। जाहिर है कि यह हमला दक्षिणपंथियों या भाजपा और विद्यार्थी परिषद के लोगों ने ही किया होगा?

उनमें से अभी तक एक भी अपराधी नहीं पकड़ा गया है, यह अपने आप में उपरोक्त अनुमान को पुष्ट करता है। यह इतना मूर्खतापूर्ण और घटिया काम हुआ है कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह जैसे लोग इसकी इजाजत नहीं दे सकते। बिना प्रमाण इसके लिए उन्हें दोषी ठहराना ठीक नहीं है लेकिन इस षड़यंत्र के कारण देश के राष्ट्रवादी तबकों को नीचा देखना पड़ रहा है।

मैं खुद जनेवि के पहले पीएच.डी. स्नातकों में रहा हूं। जिन लोगों ने भी यह षड़यंत्र किया है, उन्हें कठोरतम दंड दिया जाना चाहिए इसके अलावा, सरकार और विरोधियों के सामने मैं एक नया प्रस्ताव रख रहा हूं। देश के सभी विश्वविद्यालय में ऐसे छात्र-संगठनों पर प्रतिबंध क्यों नहीं लगाया जाता, जिनका नाभि-नाल संबंध किसी भी राजनीतिक दल से हो।

मैं आज से 63 साल पहले गिरफ्तार हुआ था और मेरे साथ जनसंघ, कांग्रेस, समाजवादी और कम्युनिस्ट छात्र भी गिरफ्तार होते रहे और उनमें से कुछ बाद में केंद्र और राज्यों में मंत्री भी बने लेकिन उन सबकी आज अलग-अलग पार्टियां होते हुए भी उनमें वही पुराना प्रेम-भाव और संवाद आज तक बना हुआ है। ऐसा इसलिए हुआ है, क्योंकि उन दिनों हम लोग पार्टीविहीन छात्र संगठन चलाया करते थे या यों कहें कि सर्वदलीय छात्र संगठन चलाते थे। छात्र-नेता पार्टियों के मोहरे नहीं होते थे। यही सच्चा और स्वस्थ लोकतंत्र है।

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