संदेह का साया कैसे छंटेगा?

अर्थशास्त्री सीपी चंद्रशेखर का इस्तीफा दिखाता है कि भारत की सांख्यिकीय प्रणाली की विश्वसनीयता को लेकर चिंताएं अभी भी जस की तस हैं। विशेषज्ञों के बीच ये राय पहले ही बन चुकी है कि सरकार की सांख्यिकीय प्रणाली की विश्वसनीयता अपने सबसे निचले स्तर पर है। मगर ऐसा नहीं है कि विश्वसनीयता बहाल नहीं की जा सकती। अगर विशेषज्ञों ऐसा करने की स्वतंत्रता दी जाए, ये काम हो सकता है। लेकिन समस्या यही है कि सरकार की मंशा को लेकर विशेषज्ञ आश्वस्त नहीं हैं। गौरतलब है कि नई दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में छात्रों और शिक्षकों पर हमले के एक ही दिन बाद विश्वविद्यालय के जाने-माने प्रोफेसर सीपी चंद्रशेखर ने इस्तीफा दे दिया। अर्थशास्त्री प्रणब सेन की अध्यक्षता में आर्थिक आंकड़ों की स्थायी समिति का गठन केंद्र सरकार ने सरकारी आंकड़ों की गुणवत्ता सुधारने के लिए पिछले महीने किया था। चंद्रशेखर ने समिति की पहली बैठक से ठीक पहले इस्तीफा दे दिया। उन्होंने कहा है कि जेएनयू में मौजूदा हालात की वजह से बैठक में शामिल होने में वो असमर्थ थे। उन्होंने अपने इस्तीफे में लिखा कि उन्हें नहीं लगता कि मौजूदा हालात में समिति सांख्यिकीय प्रणाली की विश्वसनीयता बहाल कर पाएगी। उनके इस्तीफे ने उन्हीं सवालों को फिर से खड़ा कर दिया, जिनकी छाया में इस समिति का गठन हुआ था। आंकड़ों के प्रति मोदी सरकार के पूरे दृष्टिकोण की 2015 से ही आलोचना हो रही है। 2015 में मोदी सरकार ने सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का हिसाब लगाने के लिए आधार वर्ष को 2004-05 से बदल कर 2011-12 कर दिया था। ऐसा करने से उनकी पूर्ववर्ती यूपीए सरकार के कार्यकाल के दौरान का जीडीपी का अनुमान गिर गया। पिछली जीडीपी सीरीज भारतीय रिजर्व बैंक के कराए कंपनियों के सर्वे पर बनती थी, जब कि नई सीरीज केंद्रीय कॉर्पोरेट कार्य मंत्रालय के पंजीकृत कंपनियों के ‘एमसीए-21’ डेटाबेस पर आधारित थी। इस डेटाबेस का कभी कोई परीक्षण नहीं हुआ और अर्थशास्त्रियों ने शुरू से ही इसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठाया था। मीडिया रिपोर्टों से सामने आया कि ‘एमसीए-21’ डेटाबेस में शामिल कंपनियों एक तिहाई से भी ज्यादा कंपनियों का या तो पता नहीं है, या उन्हें गलत तरीके से वर्गीकृत किया गया है। इसके अलावा कई सर्वे रिपोर्टों को दबा कर रखने या लीक होने के बाद उन्हें अस्वीकार कर देने का आरोप भी सरकार पर लगे। अब चंद्रशेखर के इस्तीफे से उपरोक्त कारणों से संदिग्ध हुए आंकड़ों पर से संदेह का साया छंटने की संभावना अभी भी कमजोर है।

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