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कहां ढूंढने जाओगे हमारे कातिल…

दुनिया की सबसे समर्थ और सक्षम पुलिस फोर्स ब्रिटेन की स्कॉटलैंड यार्ड पुलिस मानी जाती है। उसके बाद दिल्ली पुलिस का नंबर आता है। पर दुनिया की दूसरी सबसे सक्षम पुलिस फोर्स पांच जनवरी को देश के सबसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में घुस कर गुंडागर्दी करने वाले 40-50 लोगों में से अभी तक यानी तीन हफ्ते बाद तक एक भी आदमी को नहीं पकड़ सकी है। कई दिन की जांच के बाद बड़ी मुश्किल से दिल्ली पुलिस ने आठ-नौ संदिग्धों की फोटो जारी की तो उसमें नकाबपोश गुंडों के हमले का शिकार हुई विश्वविद्याल छात्र संघ की अध्यक्ष आइशी घोष की भी फोटो थी। तभी राहत इंदौरी का यह शेर याद आया- अब कहां ढूंढने जाओगे हमारे कातिल, आप तो कत्ल का इलजाम हमीं पर रख दो।

ऐसा लग रहा है कि पुलिस मारपीट का इलजाम उन्हीं लोगों पर रखने जा रही है, जो लोग पिटे हैं, पीड़ित हैं, घायल हैं। गुंडों को खोजने की बजाय पुलिस गुंडों की हिंसा का शिकार हुए छात्रों और शिक्षकों के पीछे पड़ी है। नकाबपोश गुंडों को इकट्ठा करने वालों की पहचान सार्वजनिक हो गई है। उनके बनाए व्हाट्सएप ग्रुप की जानकारी सार्वजनिक हो गई है। एक न्यूज चैनल के स्टिंग ऑपरेशन में एक छात्र ने खुद स्वीकार किया है कि उसने हिंसा की है और उसने बाहर से लोगों को इकट्ठा किया।

पर यह बात पुलिस को पता नहीं लग रही है या जिनका पता लग गया है वे ऐसे लोग हैं, जिन पर दिल्ली की पुलिस हाथ नहीं डाल सकती है। मीर ने कहा था- जाने न जाने गुल ही न जाने, बाग तो सारे जाने हैं। जेएनयू कैंपस में घुस कर किन लोगों ने छात्रों और शिक्षकों पर हमला किया यह पुलिस को छोड़ कर बाकी सब लोग जानते हैं।

पांच जनवरी को हुई हिंसा में विश्वविद्यालय प्रशासन की क्या भूमिका थी, इस बारे में भी कोई जांच नहीं हो रही है। उलटे विश्वविद्यालय प्रशासन ने पांच जनवरी की शाम को हुई भयावह हिंसा की बजाय चार जनवरी को छात्र संघ के पदाधिकारियों की ओर से हुए प्रदर्शन पर ज्यादा ध्यान दिया है। प्रशासन ने आरोप लगाया कि छात्र संघ के पदाधिकारियों ने नए सत्र का रजिस्ट्रेशन रोकने के लिए सर्वर रूम में तोड़फोड़ की।

पुलिस ने आनन-फानन में प्रशासन की ओर से दिए गए नामों को मुकदमे में शामिल कर लिया और उनके खिलाफ जांच भी शुरू कर दी। हालांकि अब पता चल रहा है कि सर्वर रूम में कोई तोड़-फोड़ नहीं हुई थी और सर्वर बिल्कुल ठीक तरीके से काम कर रहे हैं। प्रशासन की भूमिका की इसके अलावा भी कई पहलुओं से जांच की जरूरत है। यह भी पता चला है कि विश्वविद्यालय कैंपस और उसके आसपास लगी स्ट्रीट लाइट्स हमले के समय जान बूझकर बंद की गई थीं। इसकी भी जांच होनी चाहिए कि आखिर पहले सूचना देने के बावजूद प्रशासन ने पुलिस को क्यों नहीं बुलाया और पुलिस आई तो उसे गेट पर ही क्यों रोक कर रखा गया।

जेएनयू प्रकरण से सवाल उठा है कि इस पूरे मामले में दिल्ली पुलिस की नाकामी साबित हुई है या उसका पक्षपात साबित हुआ है? यह भी सोचने वाली बात है कि निकम्मी पुलिस ज्यादा खराब है या पक्षपातपूर्ण बरताव करने वाली पुलिस ज्यादा खराब और खतरनाक है? यह कहने में कोई हिचक नहीं है कि कम से कम जेएनयू कैंपस में हुए हमले के मामले में पुलिस के निकम्मेपन से ज्यादा उसका पक्षपात जाहिर हुआ है।

चाहे उसने जिसके कहने पर भेदभाव वाला रवैया अख्तियार किया हो पर हकीकत यहीं है कि पुलिस ने जान बूझकर मामले को दूसरा मोड़ दिया है। नकाबपोश गुंडों को पहचान कर उन्हें गिरफ्तार करने की बजाय पुलिस छात्र नेताओं को जान बूझकर परेशान कर रही है। इसी पुलिस ने तीन साल पहले इसी कैंपस में हुए एक कथित कार्यक्रम के सिलसिले में तब के छात्र संघ अध्यक्ष सहित कई लोगों को गिरफ्तार कर लिया था। वह भी पुलिस का पक्षपात ही था।

असल में पुलिस एक वैचारिक लड़ाई में जाने अनजाने एक पक्ष बन रही है। वह एक वैचारिक पक्ष के हाथ का हथियार बन कर दूसरे पक्ष पर कार्रवाई कर रही है। यह सब जानते हैं कि जेएनयू शुरू से वैचारिक रूप से वामपंथ की ओर झुकाव वाला संस्थान रहा है। तभी केंद्र में दक्षिणपंथी पार्टी के पूर्ण बहुमत से सत्ता में आने के बाद से ही जेएनयू में टकराव, उत्पात और हिंसा शुरू हो गई। दक्षिणपंथी छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के संगठन विस्तार के अधिकार से किसी को इनकार नहीं हो सकता है। उसे समान रूप से यूनिवर्सिटी कैंपस में अपनी राजनीतिक गतिविधियां चलाने की अनुमति होनी चाहिए।

पर इसका यह कतई मतलब नहीं हो सकता है कि उसकी वैचारिक विरोधी संगठन को पुलिस या प्रशासन के दम पर खत्म किया जाएगा। आखिर सबको समान मौका देना ही तो लोकतंत्र का बुनियादी सिद्धांत है। इसी लोकतांत्रिक प्रक्रिया से गुजर कर तो आज केंद्र में भाजपा की सरकार बनी है या दिल्ली यूनिवर्सिटी सहित देश के अनेक विश्वविद्यालयों में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने दबदबा बनाया है। फिर जेएनयू के मामले में ही ऐसा क्यों किया जा रहा है। क्यों वहां के छात्र संगठनों या उनकी ताकत को खत्म करने का प्रयास हो रहा है?

असल में जेएनयू छात्र संघ या वहां सक्रिय वामपंथी छात्र संगठनों की सक्रियता का दायरा कैंपस के बाहर तक है और उसके प्रतिरोध के विषयों में सिर्फ कैंपस की राजनीति नहीं है, बल्कि देश और दुनिया की राजनीति भी है। यह यूनिक कैरेक्टर देश के किसी और छात्र संघ का नहीं है। देश के ज्यादातर छात्र संघ सिर्फ कैंपस तक की राजनीति में दखल रखते हैं। पर जेएनयू का दायरा कैंपस से बाहर तक है और इसका विस्तार बहुत बड़ा है। तभी वहां का छात्र संघ केंद्र की भाजपा सरकार की नीतियों के सबसे मुखर प्रतिरोध का प्रतीक बन गया।

छात्रावास और मेस की फीस बढ़ोतरी को भी छात्रों ने भाजपा की शिक्षा विरोधी नीतियों से जोड़ दिया और अपने आंदोलन को देश भर के छात्र और युवाओं को आंदोलन में तब्दील कर दिया। इससे सरकार ज्यादा आहत हुई है। सरकार में बैठे लोगों के पुराने पूर्वग्रह तो हैं ही नए आंदोलन ने उसे और उकसा दिया। तभी पुलिस के सहारे गुंडों की बजाय छात्र नेताओं को सबक सिखाने की कार्रवाई चल रही है।

By अजीत द्विवेदी

पत्रकारिता का 25 साल का सफर सिर्फ पढ़ने और लिखने में गुजरा। खबर के हर माध्यम का अनुभव। ‘जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से शुरू करके श्री हरिशंकर व्यास के संसर्ग में उनके हर प्रयोग का साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और अब ‘नया इंडिया’ के साथ। बीच में थोड़े समय ‘दैनिक भास्कर’ में सहायक संपादक और हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ शुरू करने वाली टीम में सहभागी।

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