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टकराव से रास्ता नहीं निकलेगा

उच्च न्यायपालिका में जजों की नियुक्ति को लेकर सरकार और न्यायपालिका के बीच जो गतिरोध बना है और टकराव शुरू हुआ है उससे क्या यह माना जाए कि अब ये मामला निर्णायक दौर में पहुंच गया है? यह सवाल इसलिए है क्योंकि उच्च अदालतों और सर्वोच्च अदालत में जजों की नियुक्ति का कॉलेजियम सिस्टम जब से बना है तभी से सरकार और सर्वोच्च अदालत में टकराव चलता रहा है। लेकिन इससे पहले कभी किसी कानून मंत्री ने ऐसे दो टूक अंदाज में अदालत को जवाब नहीं दिया था, जैसा किरेन रिजीजू ने दिया है। इससे पहले कभी टकराव में ऐसी निरंतरता भी नहीं रही है और न कभी सुप्रीम कोर्ट की कॉलेजियम की इतनी सिफारिशें एक साथ लौटाई गई हैं। सरकार ने एक साथ 19 सिफारिशें लौटा दी हैं, जिनमें 10 सिफारिशें तो ऐसी हैं, जो दोबारा भेजी गई थीं। सुप्रीम कोर्ट ने सेकेंड जज केस में 1993 में जो फैसला दिया था और जिसके आधार पर कॉलेजियम बना था, उसके मुताबिक दोबारा भेजी गई सिफारिश को मानने के लिए सरकार बाध्य है लेकिन सरकार ने ऐसी 10 सिफारिशें सुप्रीम कोर्ट को वापस भेज दी हैं।

देश के कानून मंत्री किरेन रिजीजू ने जजों की नियुक्ति के कॉलेजियम सिस्टम की आलोचना करते हुए इसे भारतीय संविधान के लिए ‘एलियन’ जैसी चीज कहा और पूछा कि संविधान के किस अनुच्छेद में इसका प्रावधान किया गया है। इतना ही नहीं उन्होंने यह भी कहा कि अगर न्यायपालिका को लगता है कि सरकार उसकी सिफारिशों को लटका कर रखती है तो वह सरकार को नाम मत भेजे, खुद नियुक्ति करे और सब कुछ खुद करे। कानून मंत्री की इस टिप्पणी से नाराज सुप्रीम कोर्ट के दो जजों- जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस अभय ओका की बेंच ने कहा कि बहुत उच्च स्तर से यह बात कही गई है, ऐसा नहीं होना चाहिए। यह सही है कि कॉलेजियम सिस्टम का संविधान में जिक्र नहीं है और संविधान सभा की बहस में जजों को नियुक्ति के अधिकार देने के सुझाव को खारिज करके यह अधिकार कार्यपालिका को दिया गया था। लेकिन पिछले करीब 30 साल से कॉलेजियम सिस्टम देश में लागू है।

सो, अब लाइन खींच गई है। एक तरफ सरकार है, जो सर्वोच्च अदालत की ओर से जजों की नियुक्ति के लिए भेजी गई सिफारिशों को वापस लौटा रहा है और कॉलेजियम सिस्टम को ‘एलियन’ बता कर उसे संविधान विरूद्ध साबित कर रही है। दूसरी ओर सुप्रीम कोर्ट के लिए नियुक्ति की यह व्यवस्था ऐसा पवित्र प्रावधान है, जिस पर सवाल नहीं उठाया जा सकता है। ध्यान रहे केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार आने के बाद इस व्यवस्था को बदलने का एक सुविचारित प्रयास हुआ था। राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग यानी एनजेएसी का बिल 2015 में संसद से पास किया गया था, जिसमें उच्च अदालतों में जजों की नियुक्ति के लिए पांच लोगों का आयोग बनाने का प्रावधान था। इसमें सुप्रीम कोर्ट के दो जज, देश के कानून मंत्री और सरकार की ओर से नामित दो प्रख्यात नागरिकों या कानूनविदों को रखने का प्रावधान था। परंतु एक साल बाद 2016 में सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संविधान पीठ ने इसे खारिज कर दिया। उसके बाद सरकार ने दोबारा इसकी विधायी पहल नहीं की।

तभी पहला सवाल सरकार की मंशा और उसके प्रयासों पर उठ रहा है। भले संविधान में कॉलेजियम सिस्टम का प्रावधान नहीं है लेकिन देश में जजों की नियुक्ति का कॉलेजियम सिस्टम लागू है। यह ‘लॉ ऑफ द लैंड’ है कि नियुक्ति सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की कॉलेजियम की सिफारिश पर होगी। केंद्र की मौजूदा सरकार ने भी इसे स्वीकार किया है तभी आठ साल से नियुक्ति की यह प्रक्रिया जारी है। इसलिए अचानक ऐसा नहीं हो सकता है कि सरकार यह कानून न माने। दूसरा पहलू यह है कि अगर कॉलेजियम सिस्टम असंवैधानिक है तो उसके जरिए हुई तमाम नियुक्तियां असंवैधानिक हो जाएंगी और इस काम में केंद्र की सरकार भी बराबर की भागीदार मानी जाएगी क्योंकि अंतिम तौर पर नियुक्ति उसकी मंजूरी और राष्ट्रपति के वारंट से ही होती है। ध्यान रहे सरकार को कानून बदलने और नया कानून बनाने का अधिकार है। इससे पहले कितनी बार सरकारों ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों को पलटने के लिए कानून बनाए हैं। लेकिन यह नहीं हो सकता है कि जब तक कानून लागू है तब तक सरकार उसका पालन न करे। अगर सरकार ही किसी कानून का पालन नहीं करेगी तो लोगों से कैसे उम्मीद की जा सकती है कि वे कानून का पालन करें? इसलिए कॉलेजियम सिस्टम पर सवाल उठाना अपनी जगह है लेकिन जब तक वह सिस्टम सरकार बदलती नहीं है तब तक उसे उसका पालन करना चाहिए।

सरकार की मंशा पर सवाल इसलिए भी उठ रहे हैं क्योंकि संवैधानिक संस्थाओं को लेकर उसका पिछला रिकॉर्ड बहुत अच्छा नहीं है। तमाम संवैधानिक व वैधानिक संस्थाओं में नियुक्तियों के सिस्टम के साथ छेड़छाड़ हुई है। ऐसे लोग नियुक्त किए गए हैं या ऐसे लोगों को सेवा विस्तार दिया गया है, जिनसे संस्थाओं पर सवाल उठे हैं। संवैधानिक व वैधानिक संस्थाएं भी सरकार के अधीनस्थ विभागों की तरह काम करती दिख रही हैं। इसलिए जब उच्च न्यायपालिका में नियुक्तियों के सिस्टम को लेकर केंद्र सरकार ने टकराव का रास्ता अख्तियार किया तो उस सिस्टम की तमाम खामियों के बावजूद सरकार के प्रयासों पर भी सवाल उठे हैं।

अब दूसरा सवाल जजों की नियुक्ति के कॉलेजियम सिस्टम को लेकर है। सचमुच दुनिया के किसी देश में ऐसा सिस्टम नहीं होगा कि जज ही जज को नियुक्त करें। इस लिहाज से यह अजीब सी चीज लगती है। हालांकि इससे कोई इनकार नहीं कर सकता है कि सेकेंड जज केस में कॉलेजियम सिस्टम बनाए जाने से पहले सरकारों द्वारा जजों की नियुक्ति का सिस्टम बहुत खराब था। सरकारें अपने पसंदीदा लोगों को जज नियुक्त करती थीं। उनकी नियुक्ति में कई बार वरिष्ठता के मान्य सिद्धांत का पालन नहीं होता था। प्रमोशन और तबादलों में भी सरकारें मनमानी करती थीं। आज भी अगर फिर नियुक्ति सरकार के हाथ में चली जाए तो फिर वैसा ही होगा। लेकिन अफसोस की बात है कि इस खतरे से बचने के लिए कॉलेजियम का जो सिस्टम अख्तियार किया गया वह पूरी तरह से अस्पष्ट और अपारदर्शी है। किसी को पता नहीं चलता है कि किस आधार पर किसी वकील को जज बनाने या किसी जज को प्रमोशन देकर उच्च अदालत या सर्वोच्च अदालत में जज बनाने की सिफारिश की गई है। यह भी पता नहीं चलता है कि सरकार किस आधार पर सिफारिशों को मंजूर या नामंजूर करती है। सब कुछ बेहद गोपनीय रखा जाता है। किसी उदार, लोकतांत्रिक देश में नियुक्तियों की प्रक्रिया का इस तरह से अपारदर्शी होना ठीक नहीं है।

इसलिए यह सिस्टम बदलना चाहिए। लेकिन सवाल है कि इसकी जगह कौन सा सिस्टम हो? ध्यान रहे भारतीय जनता पार्टी के नेता हर साल इमरजेंसी की बरसी के मौके पर इंदिरा गांधी सरकार की आलोचना करते हुए बताते हैं कि कैसे कई वरिष्ठ जजों को दरकिनार करके उन्होंने जस्टिस अजित नाथ रे को चीफ जस्टिस बनाया था। आज भी इस बात की गारंटी नहीं दी जा सकती है कि न्यायिक नियुक्तियां सरकार के हाथ में चली जाएं तो वैसा नहीं होगा, जैसा इंदिरा गांधी के समय हुआ था। सो, एक संतुलित व्यवस्था की जरूरत है, जो सिफारिश, जांच और मंजूरी के मामले में पूरी तरह से स्पष्ट व पारदर्शी हो और जिसमें न्यायपालिका या सरकार में से किसी का वर्चस्व न हो। ऐसा सिस्टम न्यायपालिका और कार्यपालिका के टकराव से नहीं बनेगा, बल्कि दोनों के बीच सार्थक संवाद से बनेगा, जिसमें विपक्ष को भी शामिल किया जाना चाहिए।

By अजीत द्विवेदी

पत्रकारिता का 25 साल का सफर सिर्फ पढ़ने और लिखने में गुजरा। खबर के हर माध्यम का अनुभव। ‘जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से शुरू करके श्री हरिशंकर व्यास के संसर्ग में उनके हर प्रयोग का साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और अब ‘नया इंडिया’ के साथ। बीच में थोड़े समय ‘दैनिक भास्कर’ में सहायक संपादक और हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ शुरू करने वाली टीम में सहभागी।

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