देर आए पर दुरुस्त नहीं!

भारत में सब कुछ बहुत धीरे धीरे और ठहरे हुए अंदाज में होता है। कोरोना वायरस के मामले में भी ऐसा ही हो रहा है। भारत में वायरस देर से आया और धीरे धीरे आया। वायरस फैल भी धीरे धीरे रहा है। सरकार ने मेडिकल सुविधाएं भी मंथर गति से ही जुटाईं। मजदूरों का पलायन शुरू हुआ तो उस पर राजनीति भी देर से शुरू हुई और सुप्रीम कोर्ट का फैसला भी देर से आया। कानूनी भाषा में ‘जस्टिस डिलेड इज जस्टिस डिनाइड’ कहा जाता है। यानी देर से मिला न्याय, न्याय नहीं मिलने के बराबर होता है। मजदूरों के मामले में भी कमोबेश ऐसा ही हुआ है।जब पहली बार मजदूरों का पलायन शुरू हुआ और सुप्रीम कोर्ट में यह मामला पहुंचा तो 31 मार्च की सुनवाई में सर्वोच्च अदालत ने सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता की यह बात मान ली कि अब सड़कों पर कोई मजदूर पैदल नहीं चल रहा है। दूसरी बार सुप्रीम कोर्ट में मामला मई में आया। आठ मई को जब महाराष्ट्र के औरंगाबाद में 16 मजदूर ट्रेन की पटरियों पर कट गए तब एक जनहित याचिका दायर की गई।

इस पर सुनवाई करते हुए सर्वोच्च अदालत ने कहा कि किसी को पैदल चलने या कहीं जाने-आने से नहीं रोका जा सकता है। फिर अचानक अदालत ने मई के आखिरी हफ्ते में संज्ञान ले लिया और 28 मई को आदेश दिया कि श्रमिक स्पेशल ट्रेनों में मजदूरों से किराया नहीं लिया जाए। अदालत ने यह भी कहा कि ट्रेनें जहां से शुरू होंगी वहां की राज्य सरकार मजदूरों के खाने-पीने का बंदोबस्त करेगी और रास्ते में उनकी देखरेख की जिम्मेदारी रेलवे की होगी।

अदालत ने जिस दिन यह फैसला सुनाया उस दिन तक श्रमिक स्पेशल ट्रेनों से करीब 50 लाख मजदूरों को उनके घर तक पहुंचाया जा चुका था। सोचें, 50 लाख लोग इन ट्रेनों से और इसके अलावा लाखों लोग पैदल चल कर, ट्रकों में भेड़-बकरियों की तरह ठूंस कर या साइकिल, दोपहिया, तिपहिया से अपने गांव चले गए थे। इन लाखों लोगों को अदालत के फैसले का क्या फायदा मिला? उनके साथ तो अन्याय ही हुआ न!

ये लाखों लोग अपना सब कुछ गवां कर लौटे हैं। श्रमिक स्पेशल ट्रेनों की टिकट खरीदने के लिए लोगों ने दलालों को कई गुना ज्यादा पैसे दिए। किसी ने पत्नी के गहने बेचे तो किसी ने सूदखोर महाजन से पैसे लेकर टिकट खरीदे। जो पैदल चले उनकी दुर्दशा की कहानियां इतिहास की सबसे हृदयविदारक कहानियों के तौर पर दर्ज की गई हैं। इन सब लोगों का क्या कसूर था, जो इन्हें इतना कष्ट झेलना पड़ा? अदालतें रेटरोस्पेक्टिव इफेक्ट के फैसले देती रही हैं यानी ऐसे फैसले, जो पीछे की किसी तारीख से लागू होते हैं। क्या देश की सबसे बड़ी अदालत यह फैसला नहीं दे सकती है कि जो 50 लाख लोग श्रमिक स्पेशल ट्रेनों से या दूसरे लाखों लोग जो किसी अन्य साधन से अपने घर लौटे हैं, उनके खर्च की भरपाई की जाए? यह कोई मुश्किल काम भी नहीं होगा क्योंकि ज्यादातर लोगों को उनके गृह राज्य में क्वरैंटाइन किया गया, इसलिए उनका डाटा राज्य सरकारों के पास है। इससे उनकी तकलीफें तो कम नहीं होंगी और न उनके तकलीफदेह अनुभव की डरावनी यादें खत्म हो जाएंगी पर उनके जख्मों के ऊपर थोड़ा मरहम तो लगेगा!

आजादी के बाद के सबसे भयावह और मार्मिक विस्थापन के क्रम में पांच सौ लोग सड़कों पर मरे हैं और श्रमिक स्पेशल ट्रेनों में 80 लोगों के मरने की खबर है। देश की सर्वोच्च अदालत इन गरीब लोगों के बेसहारा परिजनों को आर्थिक राहत तो दिला सकती है। आखिर जब संविधान ने कानून के समक्ष सबको बराबर बनाया है तो न्याय में भी सबको बराबर हिस्सा मिलना चाहिए। अदालत यह हिस्सा सुनिश्चित करा सकती है। सड़कों पर पैदल चले लाखों लोगों और इस कष्टसाध्य यात्रा में मर गए सैकड़ों लोगों की तकलीफों और मृत्यु का बोझ देश के हर नागरिक के सीने पर है, जिसमें अदालतें भी शामिल हैं। उस बोझ को कुछ कम करने का प्रयास होना चाहिए। इसके साथ ही अदालत से यह गुजारिश भी की जानी चाहिए कि वह इस मामले में जिम्मेदारी तय करे। आज दशकों पुराने मामलों की फाइलें अदालतों में खुल रही हैं तो मजदूरों पर हुए अत्याचार का मामला तो दो महीने पुराना है। इसकी फाइल अदालत में खुलनी चाहिए और मजदूरों पर अमानवीय अत्याचार के दोषियों की पहचान कर उन पर कार्रवाई होनी चाहिए।

सर्वोच्च अदालत का फैसला ऐसे समय में आया है, जब केंद्र सरकार ने यातायात के सारे साधन खोल दिए हैं और राज्यों की सीमाएं भी खोल दी गई हैं। अब श्रमिक स्पेशल ट्रेनों के अलावा कई तरह की स्पेशल ट्रेनें चल रही हैं। एक जून से दो सौ नई ट्रेनें चालू हो गई हैं। टिकटों की बुकिंग भी पहले की तरह शुरू हो गई है यानी ऑनलाइन, काउंटर से या एजेंट के जरिए जैसे चाहें वैसे टिकट बुक करा सकते हैं। सो, सुप्रीम कोर्ट के फैसले का फायदा बहुत छोटे से वर्ग को मिलने वाला है। उसमें भी यह ध्यान रखना होगा कि कहीं सरकार दूसरी ट्रेनों की संख्या बढ़ाते-बढ़ाते श्रमिक स्पेशल ट्रेनों की संख्या घटा न दे। अब चूंकि रेगुलर ट्रेनें चालू हो गई हैं इसलिए बहुत से कामगार और मजदूर भी श्रमिक स्पशेल ट्रेनों का इंतजार नहीं करेंगे। श्रमिक स्पेशल ट्रेनों को जाने-अनजाने में भारतीय रेलवे ने पटरी पर दौड़ते ताबूत में तब्दील कर दिया है। इनकी 24 घंटे की यात्रा 72 घंटे या उससे ज्यादा समय में पूरी हो रही है। इसलिए भी हो सकता है कि बहुत लोग इसकी बजाय रेगुलर ट्रेन में सफर करना पसंद करें।

जो हो अब श्रमिक स्पेशल ट्रेनें चल रहीं हैं, राष्ट्रीय राजधानी से राज्यों की राजधानी को जोड़ने वाली विशेष ट्रेनें चल रही हैं, दो सौ अन्य स्पेशल ट्रेनें शुरू हो गई हैं, विमान सेवा भी शुरू हो गई है और राज्यों की सीमाएं भी खुल गई हैं। सो, अब मजदूरों, कामगारों के साथ साथ मध्य वर्ग के पेशेवरों का भी पलायन होगा। यह तय मानें कि एक बार सब अपने घर जाना चाहेंगे। सरकार चाहे जितना लॉकडाउन हटा ले और सारे कामकाज शुरू करे, लोगों को रोकना मुश्किल है क्योंकि एक तो कोरोना वायरस का डर है और ऊपर से आर्थिक तबाही ने उनका जीवन बहुत कठिन बना दिया है। उम्मीद करनी चाहिए कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद उनकी यात्रा सुखद रहेगी!

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