बड़े दिमाग की छोटी खोपड़ी! - Naya India
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बड़े दिमाग की छोटी खोपड़ी!

कलियुग ने बुद्धि-ब्रेन को छोटा बनाया है। वह गुलामी में घिस कर छोटी हुई है। गुलामी और भक्ति से पराश्रित है (जो करना है ईश्वर और उनके अवतार को करना है)। गुलाम कितना सोच सकता है? भक्त कितना पौरूषवान हो सकता है? जब मेंढ़क कुएं की टर्र-टर्र में दुनिया, देश, समाज की सत्यता सोचने-विचारने की प्रवृत्ति लिए हुए नहीं है तो उसका दिमाग कैसे बढ़ेगा? कोऊ नृप हो हमें का हानी और विश्वगुरू की आत्ममुग्धता की वृत्ति में बुद्धि जब लगातार सोती हुई है तो ब्रेन अनिवार्यतः सिकुड़ेगा ही।

कलियुगी भारत-10: ‘चित्त’ से हैं 33 करोड़ देवी-देवता!

कलियुगी भारत-11: तथ्य है भारतीयों का मष्तिष्क, ब्रेन पश्चिमी-कॉकेशियन लोगों, फार-ईस्ट-चाइनीज-कोरियाई लोगों से छोटा है। भारतीयों का औसत ब्रेन आकार बाकी नस्लों से ऊंचाई, चौडाई, मोटाई सभी में छोटा है। यह तथ्य आईआईटी हैदराबाद द्वारा भारतीय ब्रेन एटलस के प्रोजेक्ट से है। ब्रेन एटलस न्यूरोसाइंस व कई बीमारियों के संदर्भ-इलाज की खातिर बनी है। इसके डाटा संग्रह में सबसे छोटा ब्रेन भारतीयों का है! इस जानकारी पर डार्विन की क्रमिक मानव विकास थ्योरी का सहारा लें। सिंद्धात अनुसार समय के साथ जीवधारियों का रूप-रंग, आकार-प्रकार, उनके अंग कम-ज्यादा उपयोग से बढ़ते-घिसते व खत्म होते हैं। तभी सवाल है कहीं इसी के चलते तो कलियुगी हिंदू का मष्तिष्क कम उपयोग से छोटा नहीं हुआ? जब कलियुगी अंधकार में हम हिंदू हजारों सालों से जी रहे हैं तो जाहिर है ब्रेन का इस्तेमाल कम है इसीलिए शायद सिकुड़ कर छोटा हुआ?

कलियुगी भारत-9: ‘चित्त’ की मनोवैज्ञानिक ऑटोप्सी में वक्त!

सोचें, ब्रेन-दिमाग के उपयोग के अर्थ पर। क्या फर्क है जानवर बनाम मनुष्य के ब्रेन में? मनुष्य दिमाग चेतनता, सूंघते-देखते-जानते हुए सत्य को खोजता हुआ आगे बढ़ता है जबकि जानवरों को बोध नहीं होता कि उनका जीना कैसा है। तो जानवर बिना ब्रेन के जैसे है वैसे जीते हुए हैं। ठीक विपरीत मनुष्य का दिमाग सत्य खोजते हुए, नया बनाते, रचते हुए होता है। जिंदगी बदलती जाती है। सो, दिमाग-ब्रेन के उपयोग का अर्थ जिंदादिली, सुपरसोनिक रफ्तार से सोच-विचार व फैसले हैं। ज्ञान-बुद्धि-सत्य का संग्रहण है। इस बात को मानव सभ्यता की घटनाओं से भी समझ सकते हैं। जाग्रत-ज्ञात इतिहास में ईसाई, इस्लाम, चाइनीज मतलब अलेक्जेंडर, ग्रीक-रोमन साम्राज्यों से लेकर चंगेज खान, तैमूर लंग, गोरी-गजनी-मुस्लिम हमलावरों, वैश्विक लड़ाइयों, क्रांति-प्रतिक्रांतियों, जागरण-पुनर्जागरण, औद्योगिक, पूंजीवादी, साम्यवादी, औपनिवेश साम्राज्य विस्तार, दोनों महायुद्ध और पिछले दो सौ सालों में दो दुनी चार, चार गुनी चालीस, चालीस गुना चार लाख की सुपर फास्ट रफ्तार से ज्ञान-विज्ञान में जो बढ़ोतरी है वह सब दिमाग-ब्रेन और उसके संकल्पों में जीत व सत्य खोज से है।

भारत कलियुगी-8: समाज का पोस्टमार्टम जरूरी या व्यक्ति का?

अपना मानना है ब्रेन तब दौड़ता और विकसित हुआ होता है जब स्वतंत्र-बेफिक्र हो। बुद्धि-दिमाग में जो नस्ल ज्यादा आजाद, उड़ती हुई, किलिंग इंस्टिंक्ट, बर्बर व जिंदादिली और लड़ाकू-कंपिटीटिव मगर मौलिक आचरण लिए हुए होती है उसका ब्रेन स्वाभाविक तौर पर बड़ा होगा। कहावत भी है ‘बिग ब्रेन’ मतलब बहुत बुद्धिमान! वैसा वक्त भरतवंशियों का सतयुग में था।

तभी फिर सतयुग बनाम कलियुग के खांचे में ब्रेन को रखें। यदि संसार के बुद्धिमना लोगों का मानना है कि हिंदुओं का मौलिक वैभव ऋग्वेद, उपनिषद् वक्त की सनातनी उपलब्धियां हैं जबकि इसके विपरीत 33 करोड़ देवी-देवताओं के मनोभावों वाला कलियुगी हिंदू अर्थहीन है तो इससे ब्रेन का क्या पता चलता है? … क्या यह नहीं कि कलियुगी हिंदू दिमाग उन विकारों का मारा है, जिससे बुद्धि छोटी, जड़ और सुषुप्त है।

भारत कलियुगी-7: कलियुग अपना पक्का, स्थायी!

याद करें कि पिछले दो हजार सालों में कलियुगी हिंदू दिमाग-ब्रेन कैसा जीता हुआ था? उसका दिमाग गुलामी, भय और भक्ति, झूठ, सपनों, मुंगेरीलाल ख्यालों या सतयुगी उपलब्धियों से चिपककर अंधकार में टाइमपास करता हुआ था। वह लकीर का फकीर था। गुलामी के दस तरह के बंधनों में था। तब उसके मष्तिष्क, ब्रेन के उपयोग की गुंजाइश कहां थी और अब भी कहां है!

कलियुग ने बुद्धि-ब्रेन को छोटा बनाया है। वह गुलामी में घिस कर छोटी हुई है। वह गुलामी और भक्ति से पराश्रित है (जो करना है ईश्वर और उनके अवतार को करना है)। गुलाम कितना सोच सकता है? भक्त कितना पौरूषवान हो सकता है? जब मेंढ़क कुएं की टर्र-टर्र में दुनिया, देश, समाज की सत्यता सोचने-विचारने की प्रवृत्ति लिए हुए नहीं है तो उसका दिमाग कैसे बढ़ेगा? कोऊ नृप हो हमें का हानी और विश्वगुरू की आत्ममुग्धता की वृत्ति में बुद्धि जब लगातार सोती हुई है तो ब्रेन अनिवार्यतः सिकुड़ेगा ही। हिंदू शरीर पुण्य-पाप की 84 लाख योनियों की यात्रा में पृथ्वी को जन्म-मृत्यु के दो प्लेटफॉर्मों की आवाजाही की नियति बनाए हुए है तो उसके ब्रेन के लिए करने को क्या है?

भारत कलियुगी- 6: सतयुग से कलियुग ट्रांसफर!

एक और बात। बुद्धि जहां आचरण और नियति में बंधी है वही एकांगी होने से भी छोटी है। कलियुगी हिंदू मष्तिष्क सिर्फ और सिर्फ निज जीवन, ‘मैं’, मेरे, अहम, अहंकार, अहम-केंद्रीकरण में जीता है। हिंदू शरीर के मष्तिष्क में जीवन अपने अहम-अहंकार, वर्ण-वर्ग जैसी असंख्य सीमाओं, छोटेपने से भी जकड़ा-छोटा है। इससे भी दिमाग-बुद्धि के तंतु सिकुडे हुए होंगे।

यह रोग कम गंभीर नहीं है। इससे कई दूसरी बीमारियां पैदा हुई हैं।

आचार्य रजनीश ने स्वकेंद्रित दिमाग को ‘ईगो-सेंटर्डनेस’ बताया है। उन्हीं के शब्दों में- एक-एक आदमी अपनी फिकर कर रहा है। उसमें कोई आदमी किसी दूसरे की फिकर में नहीं है।…हमारी पूरी फिलॉसफी, हमारा पूरा जीवन-दर्शन व्यक्ति को अहम-केंद्रित बनाने वाला है।…एक-एक व्यक्ति को अपना मोक्ष खोजना है, अपना स्वर्ग खोजना है। दूसरे व्यक्ति से लेना-देना क्या है।… तभी एक इंटररिलेटेडनेस, एक अंतर्संबंध हमारे भीतर विकसित नहीं हो सका।….एक-एक आदमी एक बंद खिड़कियों वाला मकान है; दूसरे आदमी तक न कोई खिड़की खुलती है, न कोई द्वार खुलता है। दूसरे से संबंधित होने का उपाय नहीं है।

भारत कलियुगी-5: खोखा शरीर, मरघट पर अटका!

इसका दुष्परिणाम है जो कलियुगी हिंदू दिमाग बिना समाज चेतना के है। बकौल आचार्य रजनीश- भारत में न कभी कोई समाज था, न है और न आगे कोई समाज की धारणा बन सकती है।….

गजब बात है यह। पर सोचें, सन् 2021 की महामारी में हिंदू कलियुगी जीवन का औसत व्यवहार कैसा दिखा? हर हिंदू अपनी चिंता में अपने स्वार्थ, निज सोच में जीता हुआ था या वह सामाजिकता-सामूहिकता-समाज का ख्याल करते हुए था? याद करें कैसी लावारिस मौतें-अंत्येष्टियां और कितनी तरह के झूठ में लगातार जीते हुए 140 करोड़ लोग? फिर वजह भले नेतृत्व के निज स्वार्थ, निज सोच-संस्कार या नागरिक का निज अंदाज।

भारत कलियुगी-4: शववाहिनी गंगा और बूढ़ा बरगद!

मैं और मेरी सोच, मेरा स्वार्थ, मेरा क्या, मेरे मौके के भंवर में लोगों ने महामारी में जो व्यवहार बनाया है उसमें समाज, देश की चिंता, वैज्ञानिकता, बुद्धि, गरिमा, चिंता क्या कहीं है? सर्वत्र छोटे दिमाग की अहम केंद्रित छोटी बुद्धि।…. तभी आचार्य रजनीश का यह सार लाख टके का है कि- भारत में इसलिए समाज की कोई धारणा, राष्ट्र की कोई धारणा विकसित नहीं हो सकती कभी भी। भारत कभी भी राष्ट्र न था और न है और न अभी पुराने आधारों पर राष्ट्र होने की संभावना है।

इस बात को समझने के लिए ‘राष्ट्र’ का सत्य अर्थ जानना होगा, जो कलियुगी छोटी बुद्धि के बूते की बात ही नहीं है और यदि होती तो महामारी के वक्त नागरिकों और राष्ट्र का आचरण क्या वह होता है जो दिख रहा है। राष्ट्र क्या ‘रामभरोसे’ होता?     

भारत कलियुगी-3: बैलगाड़ी से चंद्रयान…फिर भी गंगा शववाहिनी!

बहरहाल छोटी बुद्धि का आचरण सचमुच स्वसुरक्षा, भयाकुलता, गुलामी, भक्ति की जकड़नों में है। जीवन आचरण बिना विचार, बिना जिंदादिली के है। जब बिना जिंदादिली के आचरण होगा तो दिमाग-बुद्धि मुर्दनगी लिए हुए छोटी व कछुआई अस्तित्व लिए हुए होगी। सोचें, कछुआई अस्तित्व की लघु खोपड़ी और फुदकते खरगोश की भागती-बड़ी खोपड़ी पर।

लब्बोलुआब में शरीर के ‘चित्त’ की कसौटी में देखें तो मानस गुलाम और पराश्रित, अहंकार स्वकेंद्रित दंभ व मुंगेरी ख्याल लिए हुए और बुद्धि जड़ व अतीत में अटकी हुई तो दिमाग का इंजन या तो बंद रहेगा या घसीटता हुआ होगा। व्यक्तित्व, आचरण-विचार सब जब बिना खिड़की-दरवाजे के तो कैसे तो दिमाग उड़ेगा और कैसे नया आधार-विचार-विकास बनाएगा।

इसी में शायद पृथ्वी में सबसे छोटे ब्रेन की सच्चाई है।… पर इस सच्चाई का बोध हिंदू को नहीं क्योंकि कलियुग काला-अंधकार जो लिए हुए है। (जारी)

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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