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दक्षिण में भाजपा मूर्तिया लगा कर वोट लेगी?

प्रधानमंत्री मोदी ने हाल में बेंगलूरू के टर्मिनल दो हवाई अड्डे पर नादप्रभु कैंपेगौड़ा की 108 फीट की मूर्ति का उद्घाटन किया। दुनिया भर में लगी सबसे उंची तांबे की मूर्ति हैं। उन्होंने 1537 में बेंगलुरु की स्थापना की थी व उनका वोकालिगा समुदाय में बहुत सम्मान किया जाता है। … उत्तर भाारत में भाजपा मंदिर-मस्जिद मुद्दों पर मतदाता को लुभाने में सफल रही है। देखना यह है कि मूर्तियां लगा कर भाजपा का दक्षिण में वोट बटोरने का मिशन सफल होता है या नहीं।  कर्नाटक में अगले साल विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं।

आमतौर पर हम अपने पूर्वजों को साल में एक बार श्राद्ध के दौरान ही याद करते हैं जबकि लोकतंत्र की यह खासियत है कि जो जातियां या समुदाय किसी राज्य में पर्याप्त संख्या में होते हैं उनके पूर्वजों को हम पांच साल में एक बार चुनाव के मौसम में याद कर लेते हैं। इसका प्रमाण है हाल में प्रधानमंत्री द्वारा बेंगलूरू के टर्मिनल दो हवाई अड्डे पर नादप्रभु कैंपेगौड़ा की 108 फीट की मूर्ति का उद्घाटन करना। कैंपा गौड़ा 16 वीं शताब्दि के एक सूबेदार थे। विजयनगर साम्राज्य के एक सूबे के सूबेदार। उन्होंने बेंगलुरु शहर की स्थापना में विशेष भूमिका अदा की। वह बहुत दूरदर्शी व योग्य शासक थे। उन्होंने बेंगलुरु के विकास के लिए वहां 1000 झीलों की स्थापना की थी ताकि वहां पीने के पानी व कृषि के लिए सिंचाई का प्रबंध किया जा सके।

आज बेंगलुरु देश की सिलीकान राजधानी बनने का खिताब हासिल कर चुका है। उनका नाम शहर में इतना जाना पहचाना है कि हवाई अड्डे से लेकर बस स्टैंड, मुख्य मेट्रो स्टेशन यहां तक की जानी मानी सड़कें तक उनके नाम पर है। इसकी एक खास वजह उनकी सोच से कहीं ज्यादा उनका प्रदेश की राजनीति में खास अहमियत रखने वाली वोकालिंगा जाति से होना है। प्रदेश की 224 विधानसभा सीटों में से 24 सीटों पर इनका खास प्रभाव है व प्रदेश के मतदाताओं में उनका हिस्सा 14 प्रतिशत है।

वहां के ये लोग उत्तर भारत के जाटों जैसे हैं। वे खेतिहर समुदाय से होने के साथ काफी पैसे वाले व अच्छे योद्धा भी है। वहां के जाने माने लिंगायत समुदाय के बाद प्रभाव के हिसाब से वोकालिगा दूसरे नंबर पर आते हैं। पिछले चुनावों में भारतीय जनता पार्टी का समर्थन करते आए है। यहां यह याद दिलाना जरुरी हो जाता है कि सितंबर 2019 में कर्नाटक के तत्कालीन मुख्यमंत्री बी एस येदीयुरप्पा ने उनकी मूर्ति की स्थापना का ऐलान किया था मगर कुछ समय बाद उन्हें अपनी कुर्सी छोड़नी पड़ गई और उनका वह वादा पूरा नहीं हुआ।

अब विधानसभा चुनाव पास आने लगे हैं तो उनके होने के छह माह पहले यह मांग पुनः जोर पकड़ने लगी। कुछ समय पहले उनकी मूर्ति स्थापित किए जाने की मांग को लेकर भी वहां प्रदर्शन किए जाने लगे थे। हालांकि कुछ जानकारों का कहना है कि प्रदर्शनों के पीछे असली वजह वोकालिगा समुदाय के एक नेता पर केंद्रीय जांच एजेंसियों द्वारा डाला गया छापा है। या

द दिला दे कि राज्य में अगले छह माह में विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं। अभी तक भाजपा राज्य की 224 में से आधी या उससे अधिक सीटें जीत कर अपनी सरकार नहीं बना सकी है। और वोकालिगा समुदाय के पूर्व प्रधानमंत्री एच डी देवगौड़ा की पार्टी जेडी (एस) व कांग्रेस का समर्थक माना जाता रहा है।

मूर्ति उदघाटन समारोह में पूर्व प्रधामनंत्री एच डी देवगौड़ा व पूर्व मुख्यमंत्री व कांग्रेस से भाजपा में शामिल एस एम कृष्णा को आमंत्रित नहीं किए जाने के मुद्दे पर भी विपक्ष मौजूदा सरकार को अपना निशाना बना रहा है। चुनाव के मद्देनजर प्रधानमंत्री ने बैंगलोर में वंदेमातरम एक्सप्रेस ट्रेन को भी हरी झंडी दिखाई। नादप्रभु की 108 फुट ऊंची मूर्ति किसी शहर की स्थापना करने वाले किसी व्यक्ति को दुनिया भर में लगी सबसे उंची तांबे की मूर्ति हैं। उन्होंने 1537 में बेंगलुरु की स्थापना की थी व उनका वोकालिगा समुदाय में बहुत सम्मान किया जाता है।

इस समुदाय का मैसूर व दक्षिणी कर्नाटक में बहुत असर है। मूर्ति का वजन 220 टन है। उसकी तलवार का ही वजन चार टन है। मूर्ति को जाने माने मूर्तिकार राम सुतार ने तैयार किया है। जिन्होंने गुजरात में लगाई जाने वाली दुनिया की सबसे ऊंची मूर्ति स्टच्यू आफ यूनिटी तैयार की। उन्होंने बेंगलुरु विधानसभा सौंध में लगाने के लिए महात्मा गांधी की मूर्ति भी बनाई थी। मूर्ति स्थापना पर 23 एकड़ का एक बहुत बड़ा पार्क भी बनाया गया है जिसकी लागत करीब 84 करोड़ रुपए आयी है।

कन्नड़ भाषा में वोकालिगा का मतलब खेत जोतने वाला होता है। मगर इस जाति के लोगों ने वहां राजनीति में गहराई तक अपना हल चलाया है। याद दिला दे कि सन् 1947 से लेकर आज तक कर्नाटक में 23 मुख्यमंत्री हुए हैं इनमें से वोकालिगा समुदाय के ज्यादा थे तो अन्य पिछड़ी जातियों के कम। महज दो ब्राम्हण सीएम हुए। सन्  1994 में तत्कालीन जनता दल की अभूतपूर्व विजय के पीछे वालिगा, कुरु व मुस्लिम वोटरों द्वारा उन्हें समर्थन दिया जाना था। उसके बाद आज तक कांग्रेस व भाजपा सभी इन दलों को लुभाने की कोशिश करते आए हैं। एम एस कृष्णा के पहले किसी भी मुख्यमंत्री ने कर्नाटक में पांच साल का कार्यकाल कभी पूरा नहीं किया। प्रदेश में शुरु से ही वोकालिगा व लिंगायत समुदायों के बीच वहां की सत्ता पर काबिज होने के लिए संघर्ष होता आया है। वोकालिगा को गौड़ा भी कहा जाता है। वोकालिगा व लियांगायत का कर्नाटक के ज्यादातर स्कूल, कालिज, इंजीनियर व मेडिकल कालिजों पर कब्जा हैं वे दोनों ही वर्ग काफी पैसे वाले हैं। अपने इंजीनियरिंग व मेडिकल कालेज में भरती के लिए मोटी कैपिटेशन फीस वसूल करते है। एच डी देवगौड़ा व एमएस कृष्णा भी इन्हीं समुदाय से है। अब भाजपा को लग रहा है कि एक महान वोककालिगा कैंपगौड़ा की मूर्ति का अनावरण करके वह उनके वोट हासिल करने में कामयाब हो जाएगी।

उत्तर भाारत में भाजपा मंदिर-मस्जिद मुद्दों पर मतदाता को लुभाने में सफल रही है। देखना यह है कि मूर्तियां लगा कर भाजपा का दक्षिण में वोट बटोरने का मिशन सफल होता है या नहीं।  कर्नाटक में अगले साल विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं। अब तक भाजपा कभी भी अपने बलबूते पर सरकार बना सकने में सफल नहीं हो पायी है। वोकालिगा समुदाय जनसंख्या के हिसाब से दूसरा सबसे बड़े समुदाय है। वहां भाजपा को सबसे ज्यादा कांग्रेसी नेता डी शिवकुमार से चुनौती मिलने की संभावना है। वे राज्य के एक जाने माने वोकालिगा नेता है। वे पुराने मैसूर इलाके से हैं। इस समुदाय के कुछ वर्ग खुद को पिछड़े वर्ग के कोटा में शामिल किए जाने की मांग करते आए हैं। इन राज्य में मठों का काफी प्रभाव है।

उधर लिंगायतों के पचसामली समुदाय द्वारा आरक्षण की मांग की गई है। तीसरे सबसे बड़े समुदाय कुरबा ने भी अनुसूचित जाति का दर्जा प्रदान कर आरक्षण दिए जाने की मांग कर दी है। देखना यह है कि चुनाव के मद्देनजर तमाम राजनीतिक दल इन तीनों जातियों को मनाने के लिए क्या कदम उठाते हैं। भाजपा के वरिष्ठ नेता व मंत्री के एस येदियुरप्पा इस आंदोलन में शामिल हो गए हैं। देखना यह है कि कर्नाटक की मूर्ति स्थापना करके छोड़ा गया जाति का उंट किस करवट बैठता है।

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