कर्नाटक के सबक

कर्नाटक विधानसभा के उप चुनाव ने भाजपा को दक्षिण भारत का चौकीदार दुबारा बना ही दिया है, उसने महाराष्ट्र की गैर-कांग्रेसी सरकार के लिए खतरे की घंटी भी बजा दी है। कांग्रेस और जनता दल (से.) की गठबंधन सरकार जैसी चली, उसका पहला नतीजा तो यह हुआ कि वह लड़खड़ाती गिर पड़ी। अपने छोटे-से कार्यकाल में उस सरकार के आपसी दंगल की खबरें कन्नड़ लोगों के दिमाग पर छाई रहीं।

कुमारास्वामी (जनता दल) मुख्यमंत्री तो बन गए लेकिन कांग्रेस के नेता सिद्धारमैया ने उनका जीना मुश्किल कर दिया था। सार्वजनिक तौर पर आंसू बहानेवाले शायद देश के वे पहले मुख्यमंत्री थे। इसमें शक नहीं कि उन्होंने काफी लगन और उत्साह से काम किया लेकिन उन पर कांग्रेसी विधायकों के हमले भाजपाइयों से कहीं ज्यादा हुए।

कर्नाटक की जनता के मन पर इसका क्या प्रभाव पड़ा ? यही कि यह गठबंधन की सरकार निकम्मी है। कांग्रेस के विधायकों ने भी थोक में दल-बदल कर लिया। दल-बदलुओं को जनता अक्सर हरा देती है लेकिन इस उप-चुनाव में भाजपा के 15 विधायकों में से 13 जीत गए। ये जीते हुए विधायक कौन हैं ?

भाजपा के 13 विधायक ऐसे थे, जो पहले कांग्रेस या जनता दल में थे। इन विधायकों को कन्नड़ लोगों ने क्यों जिता दिया ? क्योंकि वे अपने प्रांत में स्थिर सरकार चाहते हैं। यदि ये सारे विधायक हार जाते या भाजपा के 6 विधायक भी नहीं जीतते तो येदियुरप्पा की सरकार अल्पमत में चली जाती और फिर या तो उसे जनता दल (से) गठबंधन करना पड़ता या कांग्रेस और जनता दल अपने मुर्दा गठबंधन को दुबारा जिंदा करते लेकिन कर्नाटक की जनता ने गहरे विवेक का परिचय दिया है।

अब भाजपा के पास 222 में से 117 सीटें हैं याने स्पष्ट बहुमत है। आशा है कि अब येदियुरप्पा पहली पारी से बेहतर सरकार चलाएंगे। अपने आप को विवादों और आरोपों से ऊपर रखेंगे और कर्नाटक में कुछ ऐसा कर दिखाएंगे कि दक्षिण के शेष तीनों प्रांतों में भी भाजपा-जैसी अखिल भारतीय पार्टी का मार्ग प्रशस्त होगा।

कर्नाटक की सफलता का असर महाराष्ट्र पर भी पड़े बिना नहीं रहेगा। कर्नाटक और महाराष्ट्र दोनों जगह भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी लेकिन उसे पहले सरकार बनाने का मौका नहीं मिला। यदि महाराष्ट्र में भी शिव सेना, राकांपा और कांग्रेस का गठबंधन बिखरेगा तो निश्चय ही भाजपा को वहां भी मौका मिल सकता है। इस अप्राकृतिक गठबंधन को कर्नाटक से कुछ सबक जरुर लेना होगा।

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