Narendra Modi Kishan andolan किसानों की जीत, लौटी कुछ जिंदादिली!
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किसानों की जीत, लौटी कुछ जिंदादिली!

Narendra Modi Kishan andolan

अब तक के नरेंद्र मोदी के राज की पहचान वाली क्या बातें क्या हैं? जवाब है नोटबंदी, अनुच्छेद 370 की समाप्ति, कोरोना महामारी और किसान आंदोलन! इन चार बातों में भी अनुच्छेद 370 की समाप्ति का श्रेय अमित शाह को है। यदि नरेंद्र मोदी में सूझ-बूझ होती तो पहले कार्यकाल में ही अनुच्छेद 370 खत्म हो सकता था मगर उन्होंने उलटे कश्मीरियत, मुफ्ती के साथ सरकार जैसे बलंडर किए। चाहें तो राममंदिर निर्माण के लिए नरेंद्र मोदी को श्रेय दें लेकिन असलियत में यह मसला विरासत का, हिंदू बल की प्राप्ति और मुद्दा है। मोदी राज की असल पहचान के काम वे हैं, जिसमें मोदी का निर्णय ब्रह्मका फैसला। जो मोदी कहें वहीं सच। मोदी इज इंडिया एंड इंडिया इज मोदी के राज में देश की खेती के कायाकल्प का नरेंद्र मोदी ने जो फैसला किया था वह गवर्नेंस का सबसे तगड़ा फैसला था। उस नाते नोटबंदी और किसान कानून एक जैसी तासीर के फैसले हैं। राजा ने सोचा और फटाक फरमान। Narendra Modi Kishan andolan

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याद करें कृषि बिल को राज्यसभा में कैसे पास कराया गया? वह संसदीय इतिहास को कलंकित करने वाली आजाद भारत की नंबर एक घटना थी। सोचें, किसान आंदोलन के आगे कैसी बाधाएं खड़ी की गईं? कैसे आंदोलन को लेकर खालिस्तानी प्रोपेगेंडा हुआ? देश-विदेश के सिख समुदाय को क्या-क्या नहीं सुनना पड़ा? कैसे हिंदू बनाम सिख वैमनस्य के बीज बोए गए? भारत के मीडिया ने किसान आंदोलन को बदनाम करने के लिए कैसे-कैसे हथकंडे अपनाए? सत्ता का अहंकार कितनी तरह से बोला-प्रकट हुआ और इस हद तक कि किसानों को गाड़ी से कुचलने का भी वाकया हुआ!

Kishan andolan farmer protest

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कल्पना कर सकते हैं कि प्रधानमंत्री मोदी को समझाने की कितनी कोशिशें हुई होंगी या कैबिनेट के मंत्रियों ने भी परोक्ष तौर पर ही सही उन्हें चेताया जरूर होगा। लेकिन जैसे नोटबंदी वैसे ही कृषि कानून। नोटबंदी पर वापिस लौटा नहीं जा सकता था पर कृषि कानून में वापसी मुमकिन थी तो ज्योंहि उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की जमीनी फीडबैक मोदी को पुख्ता समझ आई तो फटाक से कानून खत्म का ऐलान।

ऐसा वापिस बिना आगा-पीछा सोचे हुए हुआ। प्रधानमंत्री ने सोचा नहीं कि इसके बाद सरकार की धमक क्या बचेगी? नए श्रम सुधारों से लेकर नागरिकता कानून के तमाम मामले अब घसीटते हुए लटके रहेंगे। विपक्ष में जान लौट आई है तो जन आंदोलनों को अब हवा निश्चित मिलेगी। ताजा संसद सत्र ज्यादा हंगामे वाला होगा। अगले दो साल लगातार राजनीतिक हंगामों और चुनावी अनिश्चितता में गुजरेंगे। घटनाएं कतई सरकार के बस में नहीं होंगी और आर्थिकी व महामारी से वह गुल खिलेगा कि देश का नैरेटिव चाहे जितना नियंत्रित हो आगे जनता की तकलीफें, असलियत दबी-छुपी नहीं रहेगी।

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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