संघवाद के खिलाफ मोर्चा - Naya India
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संघवाद के खिलाफ मोर्चा

ऐसा लगता है कि केंद्र सरकार लगातार राज्यों के खिलाफ नए-नए मोर्चे खेलते जा रही है। ताजा घटना वैसी है, जैसा केंद्र ने पिछले साल छत्तीसगढ़ के झीरमा घाटी कांड के मामले में किया था। तब उसने एकतरफा ढंग से इस मामले की जांच एनआईए को सौंप दी थी। अब ऐसा ही महाराष्ट्र के मामले में हुआ है। महाराष्ट्र की शिवसेना-एनसीपी-कांग्रेस सरकार ने भीमा-कोरेगांव हिंसा मामले के आरोपियों के खिलाफ आरोप पत्र की समीक्षा के लिए की एक बैठक की। उसके एक दिन बाद केंद्रीय गृह मंत्रालय ने मामले की जांच राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) को सौंप दी। केंद्रीय गृह मंत्रालय के इस फैसले के बाद महाराष्ट्र की शिवसेना-एनसीपी-कांग्रेस सरकार और केंद्र सरकार में विवाद पैदा हो गया है, जो लाजिमी ही है। 31 दिसंबर, 2017 को पुणे में एल्गार परिषद की बैठक में लोगों को कथित रूप से उकसाने के लिए नौ अधिकार सामाजिक कार्यकर्ताओं और वकीलों को महाराष्ट्र पुलिस ने 2018 में गिरफ्तार किया था। पुलिस ने दावा किया था कि कार्यकर्ताओं और वकीलों ने लोगों को उकसाया, जिससे अगले दिन भीमा कोरेगांव में हिंसा हुई। महाराष्ट्र सरकार ने ने संकेत दिए थे कि अगर पुणे पुलिस आरोपों को साबित करने में विफल रही, तो मामला एक विशेष जांच दल (एसआईटी) को सौंपा जा सकता है। एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार ने भी महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को एक पत्र लिखा था, जिसमें आरोप लगाया गया था कि पिछली भाजपा सरकार ने आरोपियों को फंसाने की साजिश रची थी। इसलिए मामले की समीक्षा आवश्यकता है। उधर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे  ने एनसीपी के एक प्रतिनिधिमंडल को आश्वस्त करते हुए कहा कि भीमा कोरेगांव हिंसा मामले में दलित कार्यकर्ताओं के खिलाफ दायर आपराधिक मामलों को जल्द से जल्द वापस लिया जाएगा। केंद्र सरकार के इस फैसले से संघवाद और एनआईए अधिनियम पर बहस बढ़ने की संभावना है। सवाल यह है कि क्या यह अधिनियम संविधान के संघीय ढांचे का उल्लंघन करता है। गौरतलब है कि कांग्रेस नेतृत्व वाली छत्तीसगढ़ सरकार ने एनआईए अधिनियम की संवैधानिकता को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी है। एल्गार परिषद मामले से ही पुणे पुलिस ने ‘शहरी नक्सल’ शब्द का इस्तेमाल किया था। पुलिस ने कहा था कि उन्हें गिरफ्तार आरोपियों में से एक,दिल्ली स्थित कार्यकर्ता रोना विल्सन का एक पत्र मिला है जिसमें कथित तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या की साजिश की ओर इशारा किया गया था। लेकिन ये मामला संदिग्ध रहा है, जिसमें संदेह और गहरा गया है।

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