मुसीबत का अंत नहीं

भारत के बैंकिंग सेक्टर को लेकर जारी अविश्वास कोई जैसे कोई अंत नहीं है। वित्तीय संकट के घिरते बैंकों की सूची पिछले दो साल में लंबी होती गई है। ऐसी तमाम घटनाएं देश में गहराते आर्थिक संकट के संकेत हैं, साथ ही बैंकिंग के सेक्टर के विनियमन व्यवस्था को भी कठघरे में खड़ा करते हैं। पंजाब और महाराष्ट्र को-ऑपरेटिव बैंक और यस बैंक के बाद अब एक साल के अंदर तीसरा बैंक गहरे वित्तीय संकट का शिकार हुआ है। केंद्र सरकार और रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) ने अब आर्थिक संकट से गुजर रहे लक्ष्मी विलास बैंक पर प्रतिबंध लगाए हैं। आरबीआई ने बैंक का नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया है और बैंक को सिंगापुर के डीबीएस बैंक के साथ विलय का आदेश दिया है। आरबीआई की सलाह पर सरकार ने यह प्रतिबंध लगाया है कि बैंक के खाताधारक एक महीने में 25,000 रुपयों से ज्यादा नहीं निकाल सकते। मंगलवार को आरबीआई ने बैंक के बोर्ड का नियंत्रण अपने हाथों में ले लिया। केनरा बैंक के पूर्व नॉन-एग्जिक्यूटिव चेयरमैन टीएन मनोहरन को बैंक का एडमिनिस्ट्रेटर नियुक्त किया गया है।

गौरतलब है कि बीते कुछ सालों में इस बैंक की वित्तीय हालत खराब होती गई। एनपीए (यानी ऐसे लोन जिन्हें लोन लेने वालों ने वापस नहीं चुकाया) बढ़ता गया। नतीजतन, बैंक का घाटा भी बढ़ता गया। लगभग दो साल से बैंक खुद को बचाने की कोशिशें कर रहा था। मगर कामयाबी नहीं मिली, तो अब आरबीआई को हस्तक्षेप करना पड़ा है। यह पहली बार है जब रिजर्व बैंक ने किसी भारतीय बैंक को विदेशी मूल वाले किसी दूसरे बैंक के साथ विलय का आदेश दिया है। डीबीएस बैंक सिंगापुर का सबसे बड़ा बैंक है। भारत में उसकी एक स्थानीय इकाई है। इसके पहले लक्ष्मी विलास बैंक के बोर्ड ने इंडियाबुल्स हाउसिंग फाइनेंस कंपनी के साथ विलय का प्रस्ताव दिया था, जिसे आरबीआई ने ठुकरा दिया था। उसके बाद बैंक ने क्लिक्स कैपिटल लिमिटेड नामक कंपनी से भी विलय का प्रस्ताव रखा था, लेकिन आरबीआई ने उसे भी मंजूरी नहीं दी। अब सरकार और आरबीआई के हस्तक्षेप और प्रस्तावित विलय के बाद की संभावनाओं को लेकर स्वाभाविक है कि बैंक के खाताधारक और शेयरधारक दोनों चिंतित हैं। बहरहाल, असल समस्या देश की बिगड़ती आर्थिक हालत की है, जिससे एनपीए बढ़े हैं। इस कारण बैंक संकट में आए हैं। फिलहाल, इस दुर्दशा का कोई अंत नहीं दिखता।

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